उस भोर तक जाती तो है!

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

दुष्यंत कुमार

बोझ अँधियारों का है मौला खैर!

सर पर बोझ अँधियारों का है मौला खैर,
और सफ़र कोहसारों का है मौला खैर|

राहत इन्दौरी

कौन सियाही घोल रहा था!

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में,
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की|

क़तील शिफ़ाई

चराग़ जलाने इधर न आएगा!

‘वसीम’ अपने अँधेरों का ख़ुद इलाज करो,
कोई चराग़ जलाने इधर न आएगा।

वसीम बरेलवी

ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो!

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची,
ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची|

राहत इन्दौरी

दीप ही दीप धर गया कोई!

मैं अमावस की रात था, मुझमें,
दीप ही दीप धर गया कोई|

सूर्यभानु गुप्त

चिराग़ाँ हर एक घर के लिए!

कहां तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए,
कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए|

दुष्यंत कुमार

लक्षण सुबह के हैं!

मानो न मानो तुम ’उदय’ लक्षण सुबह के हैं,
चमकीला तारा कोई नहीं आसमान में।

उदय प्रताप सिंह