उस भोर तक जाती तो है!

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

दुष्यंत कुमार

सवेरा दिखाई पड़ता है!

उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है,
मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है|

जाँ निसार अख़्तर

कट-कट के सहर तक पहुँची!

तुम तो सूरज के पुजारी हो तुम्हे क्या मालूम,
रात किस हाल में कट-कट के सहर तक पहुँची|

राहत इन्दौरी

ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो!

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची,
ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची|

राहत इन्दौरी