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मृत्यु- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता  ‘Death’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मृत्यु!

अरी मृत्यु, तुम ही तो हो मेरे जीवन की अंतिम पूर्ति,
मृत्यु, मेरी  मृत्य, आओ मेरे कान में फुसफुसाओ!

दिन प्रतिदिन मेरा ध्यान तुम पर ही लगा रहा है;
तुम्हारे लिए ही मैंने जीवन के सुखों और कष्टों को भोगा है|

जो कुछ भी मैं हूँ, जो मेरे पास है, जिसकी मैंने आशा की है, और मेरा समूचा प्रेम
हमेशा गोपनीयता की गहराई में, तुम्हारी ओर ही बढ़ता रहा है|

मुझ पर तुम्हारा एक अंतिम दृष्टिपात  
और मेरा जीवन हमेशा के लिए तुम्हारा हो जाएगा|

फूल गूँथे जा चुके हैं
और दूल्हे के लिए पुष्पमाला तैयार है|

विवाह के बाद दुल्हन अपना घर छोड़ देगी,
और रात्रि के एकांत में वह अपने स्वामी से मिलेगी|

-रवींद्रनाथ ठाकुर
 

   और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 Death

O thou the last fulfilment of life,
Death, my death, come and whisper to me!

Day after day I have kept watch for thee;
for thee have I borne the joys and pangs of life.

All that I am, that I have, that I hope and all my love
have ever flowed towards thee in depth of secrecy.

One final glance from thine eyes
and my life will be ever thine own.

The flowers have been woven
and the garland is ready for the bridegroom.

After the wedding the bride shall leave her home
and meet her lord alone in the solitude of night.



  -Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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काल-बली बोला मैंने तुझसे बहुतेरे देखे हैं!

आज एक अनुभव शेयर कर रहा हूँ और उस बहाने से जो कुछ बातें मन में आईं, उनके बारे में बात करूंगा। एक बात का खयाल कई बार आता है, बहुत से ऐसे मित्र हैं जो दफ्तर में मेरे साथ थे, मुझसे उम्र में कम थे, मुझसे काफी बाद रिटायर हुए, लेकिन ऊपर जाने का टिकट उनका कट चुका है और मैं अभी तक यहीं हूँ। यह तो दुनिया की व्यवस्था है- ‘कोई पहले तो कोई बाद में जाने वाला!’ हम यह सब होता हुए देखते रहते हैं, जब नज़दीक में कुछ होता है तब ज्यादा संवेदना के साथ उसको महसूस करने की गुंजाइश रहती है।

 

 

मैं आज बात करना चाहूंगा अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु के बारे में, मेरे इस संबंधी का अभी हाल ही में स्वर्गवास हुआ है। जिस दिन उनकी तेरहवीं हुई उसके 2 दिन बाद ही उनका जन्मदिन आया और यदि वे जीवित रहे होते तो तब वे 50 वर्ष के हुए होते। मेरे इस संबंधी के पास कोई उच्च डिग्री अथवा विशेषज्ञता नहीं थी, परंतु अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में अच्छा नाम कमाया, उनके मित्रों की कमी नहीं थी, वे आस्तिक भी बहुत थे, नियमित रूप से पूजा-पाठ किया करते थे और अपने कार्य-क्षेत्र में हुए अनुभव के बल पर उन्होंने हाल ही में अपना व्यवसाय शुरू किया था और ईश्वर की दया से व्यवसाय बहुत सही गति से आगे बढ़ रहा था।

मेरे इस दिवंगत संबंधी का एक बेटा है, जो अभी तक ज़िंदगी के झमेलों से दूर संगीत की दुनिया में अपना भाग्य आज़माने में लगा था, कई बार मुंबई हो आया था संगीत कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए। अब इस कहानी को ज्यादा लंबा नहीं करूंगा, अचानक मेरे इस संबंधी को पेट में तकलीफ हुई, पहले भी शायद ऐसी तकलीफ पहले भी कुछ बार हुई थी, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया था। इस बार की यह तकलीफ उनकी आखिरी रही और अचानक उनकी पत्नी और बेटा, जिसने अभी तक दुनियादारी के बारे में कुछ सोचा ही नहीं था, उन पर सारा बोझ पड़ गया, अब व्यवसाय की बारीकियां उनको समझनी होंगी और हाँ समय तो सब कुछ सिखा ही देता है।

यहाँ फिर से मैं दोहराना चाहता हूँ कि मेरे इस संबंधी ने संघर्ष करते हुए अच्छा-खासा बिज़नस प्रारंभ कर लिया था, भविष्य बहुत उज्ज्वल था, लेकिन इसी बीच यह हादसा, जीवन का अचानक अंत और ऐसे में एक कमी जिसके बारे में मेरे मन में बार-बार प्रश्न उठ रहा था, और पता करने पर यह मालूम हुआ कि मेरे इस संबंधी ने जीवन-बीमा नहीं कराया था, असमय मृत्यु की स्थिति में यह सबसे बड़ा सहारा होता है परिवार के लिए, लेकिन यहीं मेरा यह संबंधी चूक गया, बताया गया कि वह इस संबंध में बात कर रहा था, लेकिन असमय मृत्यु ने इसका अवसर ही नहीं दिया और उसकी मृत्यु के बाद परिवार के लिए जो बहुत बड़ा सहारा हो सकता था, वह उनको नहीं मिल पाया।

मैं इसलिए सभी मित्रों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगा कि जीवन और मौत तो इंसान के हाथ में नहीं होता लेकिन यदि इंसान अच्छी राशि का बीमा करा ले तो असमय मृत्यु की स्थिति में यह बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।

मुझे सोम ठाकुर जी की हिंदी गज़ल का एक शेर याद आ रहा है, जो उन्होंने बड़े संदर्भ में लिखा था, लेकिन यहाँ भी तो वह लागू होता है-

कोई दीवाना जब होंठों तक अमृत घट ले आया,
काल बली बोला मैंने, तुझसे बहुतेरे देखे हैं।

आज यही याद आया और मैंने महसूस किया कि बीमा एक अच्छा निवेश तो नहीं है, लेकिन अगर अचानक मृत्यु आ जाए तो इससे अधिक सहायक कुछ नहीं है।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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