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जिस दिन अपने जूड़े में ,उसने कुछ फूल सजाये थे!

लीजिए एक बार फिर से जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल का आनंद लेते हैं| जैसा कि आप जानते ही हैं क़तील साहब भारतीय उपमहाद्वीप के एक महान शायर थे और अनेक प्रसिद्ध गायकों ने उनकी ग़ज़लों आदि को अपना स्वर दिया है|

यह भी क़तील साहब की अलग किस्म की ग़ज़ल है, हमारे इरादे कुछ और होते हैं, लेकिन होता वही है जो होना होता है, लीजिए इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे,
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे|

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात,
प्यार की बातें करते करते उस के नैन भर आये थे|

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की,
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे|

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में,
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे|


कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू,
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे|

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को,
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे|


रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”,
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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किसी के जाने पर!

उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर है, किसी के जाने की ज़िद को लेकर, शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा-

 

 

अभी आए, अभी बैठे, अभी दामन सँभाला है,
तुम्हारी जाऊँ, जाऊँ ने हमारा दम निकाला है|

 

एक और फिल्मी गीत की पंक्ति हैं-

चले जाना ज़रा ठहरो, किसी का दम निकलता है,
ये मंज़र देखकर जाना|

पता नहीं क्यों, मेरे मन में इस विषय पर लिखने की बात बिजली के जाने के प्रसंग से आई| आजकल बंगलौर में हूँ, जहां हमारी सोसायटी में तो दिन में 20-25 बार बिजली जाती है| इस विषय में चकाचक ‘बनारसी’ की एक हास्य गजल की पंक्तियाँ थीं-

डरती नहीं हुक्काम से बिजली चली गई
बिजली थी जब कहा था अस्सलाम वालेकुम,
वालेकुम अस्सलाम पे बिजली चली गई|

एक गीत फिल्म- कन्हैया का है, मुकेश जी की आवाज़ में, जिसमे राजकपूर एक लुढ़क रही दारू की बोतल को पुकारते हुए गाते हैं, लेकिन लोग उसे नायिका से जोड़ लेते हैं| गीत है-

रुक जा ओ जाने वाली, रुक जा
मैं तो राही तेरी मंज़िल का|
देखा भी नहीं तुझको, सूरत भी न पहचानी,
तू आ के चली छम से, ज्यों धूप के दिन पानी!

जाने के इस तरह बहुत से उदाहरण हैं, जैसे ‘शाम’ अचानक चली जाती है| मीना कुमारी जी की पंक्तियाँ हैं शायद-

ढूंढते रह जाएंगे, साहिल पे क़दमों के निशां,
रात के गहरे समंदर में उतार जाएगी शाम|

जाने के बारे में ही तो यह गीत है-

तेरा जाना, दिल के अरमानों का लुट जाना,
कोई देखे, बनके तक़दीरों का लुट जाना|

एक शेर और याद आ रहा है, वसीम बरेलवी साहब का-

वो मेरे सामने ही गया और मैं, 
रास्ते की तरह देखता रह गया|

 

वैसे जाने के बाद भी आने की उम्मीद तो लगी ही रहती है, और जाने वाले लौटकर भी कभी आते हैं| लेकिन ऐसा भी तो लगता है न –

 

तेरे जाने में, और आने में,
हमने सदियों का फासला देखा|

 

और जैसा हम जानते हैं, एक जाना तो ऐसा भी होता है, जिसके बाद वापसी नहीं होती-

 

दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

 

जाने है वो कौन नगरिया, आए-जाए खत न खबरिया!
आएँ जब-जब उनकी यादें, आएँ होठों पर फरियादें,
जाके फिर न आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

गीत, गजल तो बहुत होंगे, किसी के जाने को लेकर और इस विषय पर कई आलेख लिखे जा सकते हैं, परंतु अंत में स्वर्गीय किशन सरोज जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जो लाजवाब हैं-

तुम गए क्या, जग हुआ अंधा कुआं,
रेल छूटी, रह गया केवल धुआँ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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