रिश्ता था जब सराब के साथ!

तो फिर बताओ समंदर सदा को क्यूँ सुनते,
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ|

शहरयार

फिर भी उधर जाता हूँ मैं!

जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है,
जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं|

राजेश रेड्डी

अपने आपको छलना जारी है!

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए,
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है|

राजेश रेड्डी

सहरा भी है समुंदर भी!

ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी,
वो मेरी तिश्ना-लबी किसके नाम करता है।

वसीम बरेलवी

रस्ता हरा भरा कर दे!

ये रेत्ज़ार कहीं ख़त्म ही नहीं होता,
ज़रा सी दूर तो रस्ता हरा भरा कर दे|

राना सहरी

समुंदर नज़र आया होगा!

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे,
हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा|

कैफ़ी आज़मी

जब अपनी प्यास के–

जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं,
नदी में बांध के पत्थर उतर गया हूँ मैं|

सूर्यभानु गुप्त