किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने!

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में,
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने|

साहिर लुधियानवी

हसरतों का मेरी शुमार नहीं!

तेरी रंजिश की इंतिहा मालूम,
हसरतों का मेरी शुमार नहीं|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अश्के-रवां में खो गए!

हसरतें जितनी भी थीं सब आह बनके उड़ गईं,
ख़्वाब जितने भी थे सब अश्के-रवां में खो गए|

राजेश रेड्डी

हम चराग़ों की तरह!

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं,
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं|

क़तील शिफ़ाई

मुड़ मुड़ के देखती है अभी!

ज़िन्दगी कू-ए-ना-मुरादी से,
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी|

अहमद फ़राज़

जैसा कहते हो सब वैसा वैसा होगा!

मेरे कुछ पल मुझको दे दो बाकी सारे दिन लोगो,
तुम जैसा जैसा कहते हो सब वैसा वैसा होगा|

जावेद अख़्तर

रोती है मेरे दिल पर!

अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे,
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे,
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई|

अली सरदार जाफ़री

प्यास के क्षण मांगता हूँ!

आज मैं श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी गिनती हिन्दी के श्रेष्ठ कवियों में होती है| आपने बहुत से सुंदर गीतों और ग़ज़लों की सौगात हमें दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत जिसमें कवि ने कुछ अलग ही तरह की अभिलाषा अपने लिए की है –

बांट दो सारा समंदर तृप्ति के अभिलाषकों में,
मैं अंगारे से दहकते प्यास के क्षण माँगता हूँ|

दूर तक फैली हुई अम्लान कमलों की कतारें,
किन्तु छोटा है बहुत मधुपात्र रस लोभी भ्रमर का,
रिक्त हो पाती भला कब कामनाओं की सुराही,
टूट जाता है चिटख कर किन्तु हर प्याला उमर का,

बाँट दो मधुपर्क सारा इन सफल आराधकों में,
देवता मैं तो कठिन उपवास के क्षण माँगता हूँ|

वह नहीं धनवान जिसके पास भारी संपदा है,
वह धनी है, जो कि धन के सामने झुकता नहीं है,
प्यास चाहे ओंठ पर सारे मरुस्थल ला बिछाये,
देखकर गागर पराई, किन्तु जो रुकता नहीं है,

बांट दो सम्पूर्ण वैभव तुम कला के साधकों में,
किन्तु मैं अपने लिये सन्यास के क्षण माँगता हूँ|


जिस तरफ भी देखिये, सहमा हुआ वातावरण है,
आदमी के वास्ते दुष्प्राप्य छाया की शरण है,
दफ़्तरों में मेज पर माथा झुकाये बीतता दिन,
शाम को ढाँके हुए लाचारगी का आवरण है|

व्यस्तता सारी लुटा दो इन सुयश के ग्राहकों में,
मैं सृजन के वास्ते अवकाश के क्षण माँगता हूँ|

जिन्दगी में कुछ अधूरा ही रहे, यह भी उचित है,
मैं दुखों की बाँह में यों ही तड़पना चाहता हूँ,
रात भर कौंधे नयन में, जो मुझे सोने नहीं दे,
सत्य सारे बेच कर वह एक सपना चाहता हूँ|

बांट दो उपलब्धियाँ तुम सृष्टि के अभिभावकों में,
मैं पसीने से धुले अभ्यास के क्षण माँगता हूँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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थीं सजी हसरतें दूकानों पर!

थीं सजी हसरतें दूकानों पर,
ज़िन्दगी के अजीब मेले थे|

जावेद अख़्तर