जहाँ पहुँचे कामयाब आए!

‘फ़ैज़’ थी राह सर-ब-सर मंज़िल,
हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी!

लिपट गया तिरा दीवाना गरचे मंज़िल से,
उड़ी उड़ी सी है ये ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मुमकिन है उड़ानों से बनाए रखना!

शायरी ख़्वाब दिखाएगी कई बार मगर,
दोस्ती ग़म के फ़सानों से बनाए रखना|

आशियाँ दिल में रहे आसमान आँखों में,
यूँ भी मुमकिन है उड़ानों से बनाए रखना|

बालस्वरूप राही

राहों के पत्थर बोलते हैं!

तेरे हमराह मंज़िल तक चलेंगे,
मेरी राहों के पत्थर बोलते हैं|

राजेश रेड्डी

मेरा रहबर लेके आया है!

न मंज़िल है न मंज़िल की है कोई दूर तक उम्मीद,
ये किस रस्ते पे मुझको मेरा रहबर लेके आया है|

राजेश रेड्डी

ये डगर कुछ और ही है!

आपके रस्ते हैं आसाँ आपकी मंजिल क़रीब,
ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं|

राजेश रेड्डी

मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी!

यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी,
वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी|

अहमद फ़राज़

मंज़िल गुमान में रखना!

सफ़र को जब भी किसी दास्तान में रखना,
क़दम यकीन में, मंज़िल गुमान में रखना |

निदा फ़ाज़ली

आपके भी दिल ने बात की!

राहों से जितने प्यार से मंज़िल ने बात की,
यूँ दिल से मेरे आपके भी दिल ने बात की|

कुँअर बेचैन

मुँह मत लगाया करो!

चांद सूरज कहाँ, अपनी मंज़िल कहाँ,
ऐसे वैसों को मुँह मत लगाया करो|

राहत इन्दौरी