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Remembering My Teachers

Next week we would be observing ‘Teachers day’ in India on the occasion of birthday of our Ex President and great scholar Late Sarvapalli Radhakrishnan JI. On this occasion I am also remembering some incidents connected with my teachers. These incidents I have also mentioned in my earlier blog posts, when I covered the major incidents of my life.


Let me mention once again that in my initial years I lived and studied in Shahdara, and my first school was Sanatan Dharm Pathshala and later Babu Ram Government Model School, both located near my house in Bhola Nath Nagar, Shahdara.


I remember very few teachers of the second school, where I completed my studies up to higher secondary level. One was Mr. Manohar Lal, the Hindi teacher, who was a good orator, normally he conducted the morning assembly and the stage programs. He often wore a Nehru jacket and displayed a rose flower on that. I was a very shy student, good at studies but never a topper.

I remember it happened only once that I presented a poem before the whole school from the stage, it was a great experience that time, though in the later part of my service life I had great romance with the ‘mike’ and conducted big public programs.


There was one drawing teacher when I was in 9th standard I think, he often asked me to sing before the class, when he came to know that I sang film songs very well, specially those sung by my favorite singer late Mukesh Ji.


There were three English teachers whom I remember. One was a Sardar Ji, a good teacher no doubt, but that time it was the first time that I saw a Sardar Ji in teaching profession and that too teaching English. Till then I had seen Sardar jI people in different kind of professions. However it was my impression that time only.


One of our English teachers was Mr. O.P. Sharma was quite fat and he often said- ‘If I give you my pant, it would serve you as a tent’. He also told us that Dev Anand the actor was his nephew. One incident that I remember is when Mr. O.P. Sharma came to our class in arrangement, means when the concerned teacher for that period was not available. He asked us to write an essay on the topic-‘If I were a Mali (Gardener).

All the students wrote and read out their essays. He kept commenting after every one or two sentences. On my turn I was also expecting such interjections, so I myself stopped at regular intervals but he asked me to continue and finally clapped for me. I had presented the Mali in my essay like a caring parent, who takes care of his wards. His final comment on my submission was ‘You are a freelancer’. That time I didn’t know the meaning of this word also.


After a day or two Mr. Sharma came to our class and asked whether I have a copy of the essay that I had written. I told him that I had written it on a rough page and then thrown in the dustbin.


Another English teacher whom I appreciated a lot was Mr. Harish Chandra Goswami, he loved me a lot and a very sincere and kind teacher. It was perhaps due to such devoted teachers that our government school had the word ‘Model’ included in its name ‘Model Higher Secondary School’, however after I finished my studies at Babu Ram School, Mr. Goswami caught a student copying in the exams and that cruel fellow stabbed the teacher and killed him. The word ‘Model’ then disappeared from the name of our school.


There could be many incidents connected with my school life, however this was something that instantly came to my mind.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Share one unforgettable and your favorite personal moment with your teacher. #teachersday

Thanks for reading.


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मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएंगे।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी।

 

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

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देवों के देव महादेव!

मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट में यह उल्लेख किया है की लॉक डाउन प्रारंभ होने के बाद हमने हॉटस्टार पर धार्मिक सीरियल – ‘देवों के देव महादेव’ देखना प्रारंभ किया था और अभी तक हम इसे देख रहे हैं| हर रोज हम 4-5 एपिसोड तो देख ही लेते हैं, और ऐसा लगता है की अभी भी इसका 20% भाग देखना बाकी है|

 

महादेव जिनको आदि-देव कहा जाता है और उनके साथ आदि-शक्ति जगदंबा पार्वती| वास्तव में कैलाश में बसने वाले महादेव – त्रिदेव के दिव्य सदस्य ऐसे हैं कि जिनके चमत्कारों का वर्णन करना बहुत कठिन है| महादेव और जगत जननी, अनेक बार अनेक रूपों में मिलते हैं| बम भोले कहे जाने वाले महादेव कभी बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं और जब रुष्ट हो जाते हैं तब त्रिदेव और सारे देवता उनको मनाने में लग जाते हैं| सभी लोग जब श्रेष्ठ वस्तुओं, सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हैं तब महादेव दुनिया के कल्याण के लिए विषपान करते हैं, और देवता लोग अमृत पाकर खुशी मनाते हैं|

देवताओं पर जब संकट आता है, तब वे महादेव की शरण में आते हैं और बाद में उनको भूल जाते हैं, अहंकार में डूब जाते हैं| इन्द्र के अहंकारी स्वभाव के अनेक उदाहरण इस कथा में आते हैं| तुलसीदास जी ने देवताओं के बारे में लिखा है-

आए देव सदा स्वारथी, बात करहीं जनु परमारथी|

महादेव के यशस्वी पुत्र- कार्तिकेय, जो देवताओं के सेनापति थे, गणेश जी, जिनको उनके श्रेष्ठ गुणों और बुद्धिमत्ता के कारण- प्रथम पूज्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ| इनकी पुत्री – अशोक सुंदरी, जिनके पति नहुष देवराज इन्द्र का आसन भी प्राप्त कर लेते हैं लेकिन अपने अहंकार के कारण एक ऋषी से श्राप पाकर सर्प बन जाते हैं|

ऐसे अनेक पौराणिक पात्र हैं जिनकी कथाएँ इस विराट सीरियल के माध्यम से जानने को मिलती हैं| कुछ पात्र हैं- महादेव की ही ऊर्जा से उत्पन्न – जलंधर और अंधक, जलंधर तो त्रिलोकाधिपति भी बन जाते हैं, इनके अलावा बाणासुर जो महादेव के आशीष से ही महाबली बनता है और फिर सबके लिए खतरा बन जाता है|

ऐसा लगता है कि असुर लोग पहले शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए ही तपस्या करते हैं और फिर उन देवों के लिए भी खतरा बन जाते हैं, जिनसे वे वरदान प्राप्त कराते हैं| कुछ ऋषी तो ऐसा लगता है कि हमेशा श्राप देने के लिए ही तैयार रहते हैं, लेकिन कहा जाता है कि उनके श्राप भी दुनिया के कल्याण के लिए ही होते हैं|
तुलसीदास जी ने महादेव और माता पार्वती के बारे में लिखा है-

भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ

वास्तव में माता भवानी के मन में अपार श्रद्धा है, लेकिन वैसा अडिग विश्वास नहीं है, जैसा महादेव के मन में है, शायद यही कारण है कि वे जब श्रीराम को सीता जी की खोज में वन में भटकते हुए देखते हैं, तब वे सीता माता का वेष बदलकर उनकी परीक्षा लेने चली जाती हैं| श्रीराम उनको तुरंत पहचान कर प्रणाम करते हैं और इसके बाद महादेव उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं, क्योंकि उन्होंने सीता का रूप धरा था, जिनको महादेव अपनी माता का दर्जा देते हैं|

ऐसे अनेक पौराणिक प्रसंग इस सीरियल में आते हैं, जिनको देखना और जानना सभी के लिए अच्छा होगा| जब यह सीरियल प्रसारित हुआ था तब शायद एक वर्ष से अधिक तक प्रसारित हुआ था, हमने इसको लॉक डाउन की अवधि में देखा है और आशा है कि जल्द ही इसे पूरा कर लेंगे|

एक त्रुटि मुझे इस सीरियल में, काल-क्रम की दृष्टि से लगी, शायद सीरियल निर्माताओं तक मेरी बात पहुँच पाए| सीरियल में यह दिखाया कि आदि शक्ति पहले जन्म में सती के रूप में श्रीराम जी की परीक्षा लेती हैं और बाद में पार्वती के रूप में पुनः महादेव से मिलती हैं| लेकिन फिर पार्वती के रूप में उनके अवतार के बाद ही श्रीराम का जन्म दिखाया गया है और वे सीता जी को विवाह के लिए आशीर्वाद भी देती हैं|

इस सीरियल में प्रसंग तो इतने हैं कि उनको लिखते ही जा सकते हैं, लेकिन मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि यह सीरियल देखने लायक है| एक बात और मेरी 6 वर्ष की पोती भी यह सीरियल नियमित रूप से देखती है और कभी-कभी ऐसी भाषा बोलती है- ‘आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा दायित्व है’|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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तव मूरति विधु उर बसहि, सोई स्यामता आभास!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

आज गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग याद कर लेते हैं। आजकल नियोजक अपने कर्मचारियों का चयन करते समय तथा बाद में अनेक अवसरों पर उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण करते हैं।

श्रीराम जी को लंका पर चढ़ाई करनी थी और उससे पहले एक प्रकार से उन्होंने अपने साथियों की मनोवैज्ञानिक परीक्षा ली। इससे यह मालूम होता है कि कौन श्रीराम जी के प्रति, किस हद तक समर्पित था।

चंद्रमा को देखकर श्रीराम जी ने पूछा कि चंद्रमा में जो यह कालापन दिखाई देता है, ये किसलिए है ( कह प्रभु ससि महुं मेचकताई),
प्रभु के इस प्रश्न के उत्तर में सभी लोग, अपनी मानसिक स्थिति, अपनी कुंठाओं आदि का प्रदर्शन करने लगे-

सुग्रीव ने कहा कि चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई दे रही है। इसमें उसकी यह कुंठा दिखती है कि उसका उत्तराधिकारी बाली का पुत्र अंगद होगा, उसका अपना पुत्र नहीं।

किसी ने कहा कि यह चंद्रमा के कर्मों का फल है, राहू ने चंद्रमा को एक बार ऐसा चांटा मारा था, जिसकी छाप आज तक दिखाई देती है और चंद्रमा को हमेशा उसके दुष्कर्म की याद दिलाता रहेगा। तभी कोई बोला कि चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड था, उसका घमंड दूर करने के लिए, उसके हृदय में छेद करके, उसकी कुछ सुंदरता कामदेव की पत्नी, रति को दे दी गई। इसीलिए तो कहते हैं कि घमंड नहीं करना चाहिए!

 

कोऊ कह जब विधि रति मुख कीन्हा,
सार भाग ससि कर हर लीन्हा।
छिद्र सो प्रकट इंदु उर माहीं।
तेहि मह देखिअ नभ परछाहीं।

 

सामान्यतः लोगों का यह स्वभाव होता है कि वे अपनी ही न्यूनताओं, कुंठाओं से घिरे रहते हैं और दूसरे लोगों से अक्सर बिना कारण द्वेष और नफरत करते हैं।

लोगों के विचारों की इस रौ में श्रीराम जी अपना मत भी जोड़ देते हैं- वे कहते हैं कि विष, चंद्रमा का प्रिय भाई है, (क्योंकि दोनों की उत्पत्ति समुद्र मंथन से मानी जाती है), और चंद्रमा ने अपने प्रिय भाई को अपने हृदय में स्थान दिया हुआ है, और श्रीराम जी कहते हैं कि चंद्रमा अपनी विषयुक्त किरणें फैलाकर मुझ जैसे विरही नर-नारियों को जलाता रहता है।

सभी ने अपने विचार रखे, बल्कि ऐसा होता है कि अपने नकारात्मक विचार रखने के लिए लोग तत्पर रहते हैं, हनुमान जी कुछ नहीं बोले, प्रभु को हनुमान जी से पूछना पड़ा कि आप भी तो अपनी राय बताइये। इस पर हनुमान जी ने कहा-

कहि मारुतसुत सुनहु प्रभु, ससि तुम्हार प्रिय दास,
तव मूरति विधु उर बसहि, सोई स्यामता आभास।

हनुमान जी प्रभु से कहते हैं कि चंद्रमा आपका प्रिय दास है और आपकी छवि चंद्रमा के हृदय में बसी है, उसी का श्याम आभास होता है। हनुमान जी प्रभु के प्रति समर्पित हैं और उनको दूसरे लोग भी अपने जैसे ही लगते हैं।

प्रभु यह उत्तर सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। हम कह सकते हैं कि हनुमान जी के हृदय में सिर्फ प्रेम था, किसी से नफरत नहीं, क्योंकि उनके हृदय में प्रभु राम बसे थे। वे तो धरती पर ही प्रभु के काम के लिए आए थे।

इसे प्रभु द्वारा किया गया मनोवैज्ञानिक परीक्षण कह सकते हैं और इसमें परम सफल तो हनुमान जी ही हैैं।

नमस्कार।

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ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र कोई भीड़ से – किशन सरोज

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई।

कल ही मैंने प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत शेयर किया था, आज मन हो रहा है कि उनका एक और गीत शेयर कर लूं। प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह, किशन सरोज जी का एक और गीत प्रस्तुत है-

 

 

बाँह फैलाए खड़े,
निरुपाय, तट के वृक्ष हम
ओ नदी! दो चार पल, ठहरो हमारे पास भी ।

 

चाँद को छाती लगा
फिर सो गया नीलाभ जल
जागता मन के अंधेरों में
घिरा निर्जन महल
और इस निर्जन महल के
एक सूने कक्ष हम
ओ भटकते जुगनुओ ! उतरो हमारे पास भी ।

 

मोह में आकाश के
हम जुड़ न पाए नीड़ से
ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र
कोई भीड़ से
अश्रु की उजड़ी सभा के,
अनसुने अध्यक्ष हम
ओ कमल की पंखुरी! बिखरो हमारे पास भी ।

 

लेखनी को हम बनाए
गीतवंती बाँसुरी
ढूंढते परमाणुओं की
धुंध में अलकापुरी
अग्नि-घाटी में भटकते,
एक शापित यक्ष हम
ओ जलदकेशी प्रिये! सँवरो हमारे पास भी ।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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