सृजन का शब्द !

लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है श्रेष्ठ कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंध एवं संस्मरण लेखक और धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता| भारती जी ने इन सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता–

आरम्भ में केवल शब्द था
किन्तु उसकी सार्थकता थी श्रुति बनने में
कि वह किसी से कहा जाय
मौन को टूटना अनिवार्य था
शब्द का कहा जाना था
ताकि प्रलय का अराजक तिमिर
व्यवस्थित उजियाले में
रूपान्तरित हो

ताकि रेगिस्तान
गुलाबों की क्यारी बन जाय
शब्द का कहा जाना अनिवार्य था।
आदम की पसलियों के घाव से
इवा के मुक्त अस्तित्व की प्रतिष्ठा के लिए
शब्द को कहा जाना था


चूँकि सत्य सदा सत्य है
आज भी अनिवार्य है
अतः आज के लिए भी शब्द है
और उसे कहा जाना अनिवार्य है।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

अवशिष्ट !

आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ |

लीजिए आज प्रस्तुत है, जीवन पर एक अलग प्रकार की दृष्टि डालने वाला स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत –

दुख आया
घुट घुटकर
मन-मन मैं खीज गया|

सुख आया
लुट लुटकर
कन कन मैं छीज गया|

क्या केवल
इतनी पूँजी के बल
मैंने जीवन को ललकारा था|

वह मैं नहीं था, शायद वह
कोई और था
उसने तो प्यार किया, रीत गया, टूट गया
पीछे मैं छूट गया
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

कौन कहता है कि कविता मर गई?

धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल की गई थी|

कविता लेखन के साथ ही, गंभीर रचनाकारों को हमेशा यह चिंता बनी रहती है कि विपरीत परिस्थितियों के कारण कहीं कविता मर न जाए, लेकिन परिस्थिति जैसी भी हों, कविता का स्वरूप बदलेगा, वह और धारदार बनेगी लेकिन मरेगी नहीं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता –

लादकर ये आज किसका शव चले?
और इस छतनार बरगद के तले,
किस अभागन का जनाजा है रुका
बैठ इसके पाँयते, गर्दन झुका,
कौन कहता है कि कविता मर गई?

मर गई कविता,
नहीं तुमने सुना?
हाँ, वही कविता
कि जिसकी आग से
सूरज बना
धरती जमी
बरसात लहराई
और जिसकी गोद में बेहोश पुरवाई
पँखुरियों पर थमी?


वही कविता
विष्णुपद से जो निकल
और ब्रह्मा के कमण्डल से उबल
बादलों की तहों को झकझोरती
चाँदनी के रजत फूल बटोरती
शम्भु के कैलाश पर्वत को हिला
उतर आई आदमी की जमीं पर,
चल पड़ी फिर मुस्कुराती
शस्य-श्यामल फूल, फल, फ़सल खिलाती,
स्वर्ग से पाताल तक
जो एक धारा बन बही
पर न आख़िर एक दिन वह भी रही!
मर गई कविता वही

एक तुलसी-पत्र ‘औ’
दो बून्द गँगाजल बिना,
मर गई कविता, नहीं तुमने सुना?


भूख ने उसकी जवानी तोड़ दी,
उस अभागिन की अछूती माँग का सिन्दूर
मर गया बनकर तपेदिक का मरीज़
‘औ’ सितारों से कहीं मासूम सन्तानें,
माँगने को भीख हैं मजबूर,
या पटरियों के किनारे से उठा
बेचते है,
अधजले
कोयले.

(याद आती है मुझे
भागवत की वह बड़ी मशहूर बात
जबकि ब्रज की एक गोपी
बेचने को दही निकली,
औ’ कन्हैया की रसीली याद में
बिसर कर सुध-बुध
बन गई थी ख़ुद दही.
और ये मासूम बच्चे भी,
बेचने जो कोयले निकले
बन गए ख़ुद कोयले
श्याम की माया)

और अब ये कोयले भी हैं अनाथ

क्योंकि उनका भी सहारा चल बसा !
भूख ने उसकी जवानी तोड़ दी !
यूँ बड़ी ही नेक थी कविता
मगर धनहीन थी, कमजोर थी
और बेचारी ग़रीबिन मर गई !

मर गई कविता?
जवानी मर गई?
मर गया सूरज सितारे मर गए,
मर गए, सौन्दर्य सारे मर गए?
सृष्टि के प्रारम्भ से चलती हुई
प्यार की हर साँस पर पलती हुई
आदमीयत की कहानी मर गई?


झूठ है यह !
आदमी इतना नहीं कमज़ोर है !
पलक के जल और माथे के पसीने से
सींचता आया सदा जो स्वर्ग की भी नींव
ये परिस्थितियाँ बना देंगी उसे निर्जीव !

झूठ है यह !
फिर उठेगा वह
और सूरज की मिलेगी रोशनी
सितारों की जगमगाहट मिलेगी !
कफ़न में लिपटे हुए सौन्दर्य को
फिर किरन की नरम आहट मिलेगी !
फिर उठेगा वह,
और बिखरे हुए सारे स्वर समेट
पोंछ उनसे ख़ून,
फिर बुनेगा नई कविता का वितान
नए मनु के नए युग का जगमगाता गान !


भूख, ख़ूँरेज़ी, ग़रीबी हो मगर
आदमी के सृजन की ताक़त
इन सबों की शक्ति के ऊपर
और कविता सृजन कीआवाज़ है.
फिर उभरकर कहेगी कविता
“क्या हुआ दुनिया अगर मरघट बनी,
अभी मेरी आख़िरी आवाज़ बाक़ी है,
हो चुकी हैवानियत की इन्तेहा,
आदमीयत का अभी आगाज़ बाकी है !
लो तुम्हें मैं फिर नया विश्वास देती हूँ,
नया इतिहास देती हूँ !

कौन कहता है कि कविता मर गई?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

सपना है अभी भी!

हिन्दी साहित्य की प्रत्येक विधा में अद्वितीय लेखन करने वाले, भले ही वह उपन्यास, कहानी और निबंध लेखन हो तथा हिन्दी कविता के गीत, नवगीत और अगीत सभी क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ने वाले और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज उनकी एक और कविता शेयर कर रहा हूँ|

जीवन में मनुष्य का ध्येय, उसका संकल्प और सपना ही उसे सब कुछ करने को प्रेरित करता है| लीजिए प्रस्तुत है इसी को प्रभावी अभिव्यक्ति देती स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता –



क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!

तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!

तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो

और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है – दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी


इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

ठंडा लोहा – धर्मवीर भारती

एक बार फिर से आज मैं स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| धर्मवीर भारती जी हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यास एवं कहानी लेखक, निबंध लेखक, कवि और गीतकार के अलावा धर्मयुग के जाने-माने संपादक थे| आज मैं भारती जी की एक प्रसिद्ध रचना ‘ठंडा लोहा’ शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है धर्मवीर भारती जी जी की यह कविता –

ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!
मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा!

मेरी स्वप्न भरी पलकों पर
मेरे गीत भरे होठों पर
मेरी दर्द भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब
एक पर्त ठंडे लोहे की
मैं जम कर लोहा बन जाऊँ –
हार मान लूँ –
यही शर्त ठंडे लोहे की


ओ मेरी आत्मा की संगिनी!
तुम्हें समर्पित मेरी सांस सांस थी, लेकिन
मेरी सासों में यम के तीखे नेजे सा
कौन अड़ा है?
ठंडा लोहा!
मेरे और तुम्हारे भोले निश्चल विश्वासों को
कुचलने कौन खड़ा है ?
ठंडा लोहा!

ओ मेरी आत्मा की संगिनी!
अगर जिंदगी की कारा में
कभी छटपटाकर मुझको आवाज़ लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे धीरे निगल चुका है
इस बस्ती में दीप जलाने वाला नहीं बचा है

सूरज और सितारे ठंडे
राहें सूनी
विवश हवाएं
शीश झुकाए खड़ी मौन हैं
बचा कौन है?
ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

टूटा पहिया!

मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !



क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !



अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !


मैं रथ का टूटा पहिया हूँ|


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

                         ******

रथ का टूटा हुआ पहिया!

धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे और गद्य और पद्य की सभी विधाओं- कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत आदि-आदि में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ|

भारती जी ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर एक खंडकाव्य- अंधायुग भी लिखा था| आज की इस कविता में भी महाभारत का संदर्भ दिया गया है| वास्तव में जीवन में कभी ऐसे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनको हम अक्सर महत्व नहीं देते|


आइए स्वाभिमान से भारी इस कविता का आनंद लेते हैं-



मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !


अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

मैं क्या जिया ?

आज डॉ धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भारती जी ने कविता, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान किया था| उनकी कुछ रचनाएँ- सूरज का सातवाँ घोडा, अंधा युग, ठंडा लोहा, ठेले पर हिमालय, सात गीत वर्ष आदि काफी प्रसिद्ध रहीं| वे साप्ताहिक पत्रिका- धर्मयुग के यशस्वी संपादक भी रहे|

 

लीजिए प्रस्तुत है भारती जी की यह रचना-

 

 

 

मैं क्या जिया ?
मुझको जीवन ने जिया –
बूँद-बूँद कर पिया, मुझको
पीकर पथ पर ख़ाली प्याले-सा छोड़ दिया|

 

मैं क्या जला?
मुझको अग्नि ने छला –
मैं कब पूरा गला, मुझको
थोड़ी-सी आँच दिखा दुर्बल मोमबत्ती-सा मोड़ दिया|

 

देखो मुझे
हाय मैं हूँ वह सूर्य
जिसे भरी दोपहर में
अँधियारे ने तोड़ दिया !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

******