प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!

आज एक बार फिर से में प्रसिद्ध कवि, कथाकार, गीतकार, संस्मरण लेखक और धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने उल्लेख किया भारती जी ने साहित्य की प्रत्येक विधा में और पत्रकारिता एवं संपादन में भी अपना अमूल्य योगदान दिया था|

उनकी कुछ पंक्तियाँ जो मुझको अक्सर याद आती हैं, वे हैं-

सूनी सड़कों पर ये आवारा पाँव,
माथे पर टूटे नक्षत्रों की छाँव
कब तक, आखिर कब तक|

चिंतित पेशानी पर अस्त-व्यस्त बाल
पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण भूचाल
कब तक, आखिर कब तक|


लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता –

उत्तर नहीं हूँ
मैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!

नये-नये शब्दों में तुमने
जो पूछा है बार-बार
पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!

तुमने गढ़ा है मुझे
किन्तु प्रतिमा की तरह स्थापित नहीं किया
या
फूल की तरह
मुझको बहा नहीं दिया
प्रश्न की तरह मुझको रह-रह दोहराया है
नयी-नयी स्थितियों में मुझको तराशा है
सहज बनाया है
गहरा बनाया है
प्रश्न की तरह मुझको
अर्पित कर डाला है
सबके प्रति
दान हूँ तुम्हारा मैं
जिसको तुमने अपनी अंजलि में बाँधा नहीं
दे डाला!
उत्तर नहीं हूँ मैं

प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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