ये खाई नहीं जाने वाली!

एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में,
मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

कमज़र्फ ने छलक के मुझे!

तआल्लुकात में कैसे दरार पड़ती है,
दिखा दिया किसी कमज़र्फ ने छलक के मुझे|

राहत इन्दौरी

चहचहाती बुलबुलों पर—

दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक,
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक|

कुंवर बेचैन