कोई सुबह को कोई जाये शाम!

रुके नहीं कोई यहाँ नामी हो कि अनाम,
कोई जाये सुबह् को कोई जाये शाम|

गोपाल दास नीरज

मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार!

करें मिलावट फिर न क्यों व्यापारी व्यापार,
जबकि मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार|

गोपाल दास नीरज

घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार!

दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार,
तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार|

गोपाल दास नीरज

हम पर किया यूँ छुप-छुप कर वार!

टी.वी.ने हम पर किया यूँ छुप-छुप कर वार,
संस्कृति सब घायल हुई बिना तीर-तलवार|

गोपाल दास नीरज

सपना झरना नींद का!

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना, खोना, खोजना, साँसों का इतिहास|

निदा फाज़ली