ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते!

जागने पर भी नहीं आँख से गिरतीं किर्चें,
इस तरह ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते|

गुलज़ार

मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही!

कौन था तू कि फिर न देखा तुझे,
मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही|

मुनीर नियाज़ी

शबनम फूल के प्यालों में!

यूँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम,
जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में|

बशीर बद्र

ताबीर करके देखते हैं!

कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही,
अगर वो ख़्वाब है ताबीर करके देखते हैं|

अहमद फ़राज़

नींद टूटी तो फिर नहीं आई!

नींद टूटी तो फिर नहीं आई,
क्या बताएँ कि ख़्वाब क्या देखा !

नक़्श लायलपुरी

ये जो ज़िन्दगी की किताब है!

ये जो ज़िन्दगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है|
कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब* है|

वेदना*

राजेश रेड्डी

अधूरा दिखाई पड़ता है!

न कोई ख़्वाब न कोई ख़लिश न कोई ख़ुमार,
ये आदमी तो अधूरा दिखाई पड़ता है|

जाँ निसार अख़्तर

फिर दर्द कोई बोने का!

जो फ़स्ल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो,
कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का|

जावेद अख़्तर

घर जलने का मंज़र लेके आया है!

बसा था शहर में बसने का इक सपना जिन आँखों में,
वो उन आँखों मे घर जलने का मंज़र लेके आया है|

राजेश रेड्डी

वो बात भी थी अफ़साना क्या!

उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है।
उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या॥

इब्ने इंशा