महताब मत देखा करो!

आशिक़ी में ‘मीर’ जैसे ख़्वाब मत देखा करो,
बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो|

अहमद फ़राज़

बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में!

ख़राब सदियों की बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में,
अब इन बे-अंत ख़लाओं में ख़्वाब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

चार किताबें पढ़ कर ये भी-

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें|

अहमद फ़राज़

ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!

नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है,
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं|

राहत इन्दौरी

ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने!

उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है,
कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने|

साहिर लुधियानवी

फिर सपने सजाने चाहिएँ!

रोज़ इन आँखों के सपने टूट जाते हैं तो क्या,
रोज़ इन आँखों में फिर सपने सजाने चाहिएँ|

राजेश रेड्डी

न कभी टूट कर, बिखरे कोई!

जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा,
इस तरह से, न कभी टूट कर, बिखरे कोई|

परवीन शाकिर

मुमकिन है उड़ानों से बनाए रखना!

शायरी ख़्वाब दिखाएगी कई बार मगर,
दोस्ती ग़म के फ़सानों से बनाए रखना|

आशियाँ दिल में रहे आसमान आँखों में,
यूँ भी मुमकिन है उड़ानों से बनाए रखना|

बालस्वरूप राही