ख्वाबों का मसअला भी है!

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी,
हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है|

राहत इन्दौरी

हैं बहुत छोटे!

मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी के बहुत से गीत मैंने पहले शेयर किए हैं| बहुत ही सरल स्वभाव वाले और अत्यंत सृजनशील रचनाकार थे डॉक्टर बेचैन जी, मुझे भी उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत-


जिंदगी की लाश
ढकने के लिए
गीत के जितने कफ़न हैं
हैं बहुत छोटे ।

रात की
प्रतिमा
सुधाकर ने छुई,
पीर यह
फिर से
सितारों सी हुई,
आँख का आकाश
ढकने के लिए
प्रीत के जितने सपन हैं
हैं बहुत छोटे।


खोज में हो
जो
लरजती छाँव की,
दर्द
पगडंडी नहीं
उस गाँव की,
पीर का उपहास
ढकने के लिए
अश्रु के जितने रतन हैं
हैं बहुत छोटे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चंदन वन डूब गया 4

दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,
हंसने वालों में रहकर मुस्काना होगा,
घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,
रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया।

किशन सरोज

चंदन वन डूब गया 3

सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,
काहे का रोना जो बीती सो बात गई,
मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,
एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।

किशन सरोज

बिखर जाएगा, फिर रात का रंग!

तुम नहीं आओगे जब, फिर भी तो तुम आओगे,
ज़ुल्‍फ़ दर ज़ुल्‍फ़ बिखर जाएगा, फिर रात का रंग,
शब–ए–तन्‍हाई में भी लुत्‍फ़–ए–मुलाक़ात का रंग|

अली सरदार जाफरी

ख़्वाब!

आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं|

जां निसार अख़्तर

खामोशी पहचाने कौन 3

जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन ।

निदा फाज़ली

कब तक प्रतीक्षारत रहें!

आज काफी समय बाद मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, जिनका स्नेह पाने का भी अवसर मुझे मिला था|

यह रचना कवि सम्मेलनी रचनाओं से बिल्कुल अलग है और सामान्य जन के सपनों और अभिलाषाओं की बात करती है, जिनको राजनीति सिर्फ छलावा देती है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी की यह रचना-

युग हुए संघर्ष करते
वर्ष को नव वर्ष करते
और कब तक हम प्रतीक्षारत रहें ?

धैर्य की अंधी गुफ़ा में
प्रतिध्वनित हो
लौट आईं
कल्पवृक्षी प्रार्थनाएँ,
श्वेत-वसना राज सत्ता
के महल में
गुम हुईं
जन्मों-जली सम्भावनाएँ|

अब निराशा के नगर में
पाशविक अंधियार-घर में
और कब तक दीप शरणागत रहें ?

मुठ्ठियाँ भींचे हुए
झण्डे उठाए
भीड़ बनकर रह गए हम
राजपथ की,
रक्त से बुझती मशालों
को जलाकर,
आहटें लेते रहे हम
सूर्य-रथ की

थक गए नारे लगाते
व्यर्थ ही ताली बजाते
और कब तक स्वप्न क्षत-विक्षत रहें ?

हारकर पहुँचे
इसी परिणाम पर हम,
धर्म कोई भी
न रोटी से बड़ा है,
काव्य-सर्जन हो
कि भीषण युद्ध कोई
आदमी हर बार
ख़ुद से ही लड़ा है

देह में पारा मचलता
पर न कोई बाण चलता
और कब तक धनुर्धर जड़वत रहें ?

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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