न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था!

न वो आँख ही तेरी आँख थी, न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था,
दिले मुन्तज़िर तो है किसलिए, तेरा जागना उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

अपने-आप को तन्हा किया न जाए!

हम हैं तेरा ख़याल है तेरा जमाल है,
इक पल भी अपने-आप को तन्हा किया न जाए|

जाँ निसार अख़्तर

ख्वाब भी मर जाते हैं!

अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नजर आते हैं,
मुझको मालूम ना था ख्वाब भी मर जाते हैं|

अहमद फ़राज़

पर ये दुकानें खोले कौन!

सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर के श्मशान गया,
दिल की दुकानें बंद पड़ी हैं, पर ये दुकानें खोले कौन|

राही मासूम रज़ा

आकाश के तारे न देख!

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

दुष्यंत कुमार

महक जाते हैं चाँद-सितारे भी!

उस रात महक जाते हैं चाँद-सितारे भी,
मैं नींद में ख़्वाबों को जिस रात बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी

तन है केवल, प्राण कहाँ हैं !

हमारी हिन्दी फिल्मों के लिए असंख्य लोकप्रिय गीत लिखने वाले, जनकवि शैलेन्द्र जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी ने जो कुछ भी लिखा उसमें उनकी अलग छाप दिखाई देती है| आज की इस कविता में भी कुछ ऐसे गहन भाव हैं जो अभिव्यक्त करते हैं कि जीवन में अभाव कैसे-कैसे हो सकते हैं

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेन्द्र जी की यह कविता-


पूछ रहे हो क्या अभाव है
तन है केवल, प्राण कहाँ हैं ?

डूबा-डूबा सा अन्तर है
यह बिखरी-सी भाव लहर है,
अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिन
मेरे जीवन के गान कहाँ हैं ?

मेरी अभिलाषाएँ अनगिन
पूरी होंगी ? यही है कठिन,
जो ख़ुद ही पूरी हो जाएँ —
ऐसे ये अरमान कहाँ हैं ?

लाख परायों से परिचित है,
मेल-मोहब्बत का अभिनय है,
जिनके बिन जग सूना-सूना
मन के वे मेहमान कहाँ हैं ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ख़्वाब मेयारी रखो!

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ायम रहे,
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो|

राहत इन्दौरी

मिल जाना क्या, न मिलना क्या!

उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्या
ख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’