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कविता मेरी मधुशाला- हरिवंश राय बच्चन

आज मन है कि स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी के प्रसिद्ध काव्य – मधुशाला के कुछ छंद आपके साथ शेयर करूँ| ख़ैयाम की रुबाइयों के आधार पर रचित इस काव्य को जब बच्चन जी काव्य मंचों पर प्रस्तुत करते थे तो श्रोता समुदाय झूम उठता था|

 

 

बच्चन जी का यह काव्य अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था| बच्चन जी ने इससे जुड़ी एक घटना का उल्लेख भी अपनी जीवनी में किया है| हुआ यूं था कि बच्चन जी का काव्यपाठ सुनने के बाद एक श्रोता, जो रेल में यात्रा कर रहा था, वह मधुशाला की पंक्तियाँ दोहराते हुए गाड़ी के नीचे आकर मर गया था| इस पर बच्चन जी ने लिखा था कि मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी यह रचना पलायन के लिए प्रेरक बन जाएगी|

लीजिए प्रस्तुत हैं इस काव्य के कुछ छंद-

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।

 

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।

 

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।

 

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।

 

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।

 

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।

 

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दूर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।

 

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।

 

मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।

 

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।

 

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।

 

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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लंदन फिर से छूटा जाय!

यह आलेख भी मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इसको थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ।
डेढ़ महीने के प्रवास के बाद कल सुबह लंदन छोड़ देंगे। कल दोपहर की फ्लाइट यहाँ से है, सो सुबह ही घर छोड़ देंगे, हाँ उस समय जब भारत में दोपहर होती है। फिर कुछ दिन बंगलौर में रुककर, अगले सप्ताह गोवा पहुंचेंगे।

 

 

बहुत लंबे समय तक यमुना मैया के पास, दिल्ली में यमुना पार- शाहदरा में रहे, एक वर्ष समुद्र के आकर्षण वाली नगरी मुंबई में रहे, अब गोवा में रहते हैं, जो समुद्र और अनेक आकर्षक ‘बीच’ होने के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन लंदन का अनुभव एकदम अलग था, जहाँ घर से थोड़ा दूर ही समुद्र जैसी लगने वाली नदी ‘थेम्स’ बहती है, पिछले वर्ष जिस मकान में थे वहाँ तो घर को छूते हुए ही बहती थी, अब नए घर के बगल से नहर बहती है, जिसके पार ‘कैनरी व्हार्फ’ के अंडरग्राउंड और ओवरग्राउंड दोनो स्टेशन हैं, एक ‘जुबिली लाइन’ का और दूसरा ‘डीएलआर’ लाइन का।

 

 

दिन भर पहले रंग-बिरंगे आकर्षक शिप और बोट घर से ही देखने को मिलते थे, जो एक अलग ही अनुभव था। इस बार हर कुछ ही सेकंड बाद ‘डीएलआर’ लाइन की ट्रेन सामने से जाती हुई दिखाई देती हैं। दुनिया के दूसरे छोर पर आकर यहाँ के स्थानों और अलग रंग, सभ्यता और संस्कृति वाले लोगों के बीच समय बिताने, एक दूसरी ही दुनिया को देखने का अवसर मिला। कुछ लोगों की रुचि स्थानों में अधिक होती है, मेरी मनुष्यों में भी समान रूप से रुचि है, हालांकि यहाँ अधिक लोगों से बातचीत का अवसर तो नहीं मिला।

 

 

शाम को जब 6 से 7 बजे तक वॉक के लिए जाता हूँ, इस बार मेरा ‘वॉक’ का ठिकाना ‘कैनरी व्हार्फ रिवर फ्रंट’ है, नदी किनारे यह आकर्षक स्थान विकसित किया गया है, जहाँ क्रूज़ आदि से लोग आते-जाते हैं और हाँ बड़ी संख्या में लोग यहाँ वॉक, साइक्लिंग और कुदरत का आनंद लेने के लिए भी आते हैं, शाम के समय यहाँ सूर्यास्त का सुंदर दृश्य देखने को मिलता है, जैसा गोवा में ‘मीरामार बीच’ पर भी मैं देखता हूँ।

 

 

एक और गतिविधि जो यहाँ बहुत सामान्य है, वह है ‘बार’ की रौनक, मैं जब ‘कैनरी व्हार्फ’ स्टेशन के सामने से होकर गुज़रता हूँ, और जब ‘रिवर फ्रंट’ पहुंचता हूँ वहाँ भी, मदिरालय में पीने वालों की इतनी भीड़ होती है, कि वे विशाल ‘बार’ के भीतर नहीं समा पाते और काफी संख्या में उनको बाहर खड़े होकर ही पीनी पड़ती है, ऐसा लगता है कि जैसे शराब मुफ्त में बंट रही हो, मदिरालय के सामने से गुज़रने में थोड़ी दिक्कत होती है, लेकिन मैंने किसी को पीकर बहकते हुए तो नहीं देखा। भारत में तो बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि पीकर बहके नहीं, तो पैसा बेकार ही खर्च किया!

 

 

इससे पहले दुबई और यूएई के प्रांतों तथा तंजानिया में घूमने का अवसर मिला था। लंदन का तो यह दूसरा ट्रिप है, पिछले वर्ष एक माह के लिए आया था, इस बार डेढ़ माह का प्रवास था। निश्चित रूप से हर अनुभव अपने आप में नया होता है।

 

 

लंबे समय तक एनटीपीसी में सेवा की लेकिन उस सेवा के दौरान कभी विदेश भ्रमण का अवसर नहीं मिला। मुझे याद है कि एक बार एक कवि आए थे, मैं वहाँ कवि सम्मेलनों का आयोजन करता था। तो वे कवि, उनको दिखता भी कम था, ‘भोंपू’ नाम था उनका, उन्होंने एकदम अपनी आंखों से सटाकर मेरा हाथ देखा था और कहा था कि मैं तो पता नहीं जिंदा रहूंगा या नहीं, लेकिन आप दुनिया के कई देश घूमोगे!

 

 

मैं सेवा से रिटायर भी हो गया फिर सोचा कि अब कहाँ विदेश जाऊंगा, लेकिन बच्चों का प्रताप है कि कई देशों में घूमना हो गया। कुछ लोगों के लिए विदेश जाना सहज ही रूटीन का हिस्सा होता है लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं था।

खैर, आज ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा और इसके बाद अपने देश में पहुंचने के बाद ही बात होगी।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

जगजीत सिंह जी की गाई, शायर ज़नाब शहीद कबीर जी की इस गज़ल के बहाने आज बात शुरू करेंगे-

 

 

ठुकराओ अब कि प्यार करो, मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

गिरने दो तुम मुझे, मेरा सागर संभाल लो,
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

अब भी दिला रहा हूँ, यक़ीन-ए-वफा मगर,
मेरा न ऐतबार करो, मैं नशे में हूँ।

वैसे देखा जाए तो प्रेम करने के लिए होश में होना ज़रूरी नहीं है, इसलिए जो वफा का यक़ीन नशे में दिलाया जा रहा है, वह शायद ज्यादा कारगर हो, हाँ व्यापार करने के लिए होश में होना बहुत ज़रूरी है।

इसीलिए तो इस गज़ल में धर्म गुरुओं, उपदेशकों से यह भी कहा गया है-

मुझको कदम-कदम पे भटकने दो वाइज़ो
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ।

एक और गज़ल में, यह भी कहा गया है-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,
इश्क़ कीजे, फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

और फिर इस दुनिया के नियमों के बारे में उस्ताद गुलाम अली जी ने क्या कहा है (मतलब गाया है)-

मयनोशी के आदाब से आगाह से, आगाह नहीं तू,
जिस तरह कहे साक़ी-ए-मैखाना पिए जा।

और फिर अकबर इलाहाबादी जी की, हंगामा बरपा वाली गज़ल में-

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से,
हर सांस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।

नातज़ुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं,
इस रंग को क्या जाने, पूछो जो कभी पी है।

आखिर में मुकेश जी की टिप्पणी-

है ज़रा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना
मैं नशे में हूँ।

वैसे नशे के बारे में ऐसी दलीलें देने के लिए तो शायद होश में रहना ज़रूरी है, और ये दलीलें कितनी लंबी चल सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है।

मैंने ऐसी कोई कसम भी तो नहीं खाई थी कि हमेशा होश की ही बात करुंगा।

नमस्कार।

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