तुलना!

लंबे समय के बाद आज मैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी आपातकाल में प्रकाशित अपने ग़ज़ल संग्रह ‘साए में धूप’ के कारण बहुत प्रसिद्ध हो गए थे, मैंने शुरू में उनकी ग़ज़लें शेयर की थीं लेकिन कई बार से मैं उनकी अन्य कविताएं शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह सुंदर कविता, जिसमें उन्होंने सामान्य गड़रियों और राजनैतिक गड़रियों की तुलना की है –


गडरिए कितने सुखी हैं ।

न वे ऊँचे दावे करते हैं
न उनको ले कर
एक दूसरे को कोसते या लड़ते-मरते हैं।
जबकि
जनता की सेवा करने के भूखे
सारे दल भेडियों से टूटते हैं ।
ऐसी-ऐसी बातें
और ऐसे-ऐसे शब्द सामने रखते हैं
जैसे कुछ नहीं हुआ है
और सब कुछ हो जाएगा ।

जबकि
सारे दल
पानी की तरह धन बहाते हैं,
गडरिए मेंड़ों पर बैठे मुस्कुराते हैं
… भेडों को बाड़े में करने के लिए
न सभाएँ आयोजित करते हैं
न रैलियाँ,
न कंठ खरीदते हैं, न हथेलियाँ,
न शीत और ताप से झुलसे चेहरों पर
आश्वासनों का सूर्य उगाते हैं,
स्वेच्छा से
जिधर चाहते हैं, उधर
भेड़ों को हाँके लिए जाते हैं ।

गडरिए कितने सुखी हैं ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मापदण्ड बदलो!

अत्यंत लोकप्रिय कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी द्वारा आपातकाल में लिखी गई ग़ज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ से अनेक ग़ज़लें शेयर की जाती हैं और मैंने भी की हैं| लेकिन दुष्यंत जी का पारंपरिक जुझारू कविता में भी समान दखल था| मैंने दुष्यंत जी की कुछ कविताएं पहले भी शेयर की हैं, ऐसी ही एक कविता आज भी शेयर कर रहा हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता –

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते-सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आज़माने को
धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी ।
एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।

ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
ये मुझको उकसाते हैं ।
पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
क़सम देती हैं ।
कुछ हो अब, तय है –
मुझको आशंकाओं पर क़ाबू पाना है,
पत्थरों के सीने में
प्रतिध्वनि जगाते हुए
परिचित उन राहों में एक बार
विजय-गीत गाते हुए जाना है –
जिनमें मैं हार चुका हूँ ।

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तन्हाई नहीं जाने वाली!

आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा,
चन्द ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

ख़ुदाई नहीं जाने वाली!

तू परेशां है, तू परेशान न हो,
इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

सुनाई नहीं जाने वाली!

चीख़ निकली तो है होंठों से मगर मद्धम है,
बंद कमरों को सुनाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

ये खाई नहीं जाने वाली!

एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में,
मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

बुझाई नहीं जाने वाली!

कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है,
आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

ख़तरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली!

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली,
ये ख़तरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

आकाश-सी छाती तो है!

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|

दुष्यंत कुमार

जा के बतियाती तो है!

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है|

दुष्यंत कुमार