तन्हाई नहीं जाने वाली!

आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा,
चन्द ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

ख़ुदाई नहीं जाने वाली!

तू परेशां है, तू परेशान न हो,
इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

सुनाई नहीं जाने वाली!

चीख़ निकली तो है होंठों से मगर मद्धम है,
बंद कमरों को सुनाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

ये खाई नहीं जाने वाली!

एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में,
मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

बुझाई नहीं जाने वाली!

कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है,
आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

ख़तरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली!

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली,
ये ख़तरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली|

दुष्यंत कुमार

आकाश-सी छाती तो है!

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|

दुष्यंत कुमार

जा के बतियाती तो है!

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है|

दुष्यंत कुमार

उस भोर तक जाती तो है!

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

दुष्यंत कुमार

गूँगी ही सही, गाती तो है!

एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है|

दुष्यंत कुमार