नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम!

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भून कर खाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है!

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

फूल कुम्हलाने लगे हैं!

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कमाल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

लोग चिल्लाने लगे हैं!

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

जिएं तो अपने बग़ीचे में–

जिएं तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए|

दुष्यंत कुमार

आदमी का ख़्वाब सही!

ख़ुदा नहीं न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए|

दुष्यंत कुमार

मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए!

न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए|

दुष्यंत कुमार