दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे!

कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं,
दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे|

बशीर बद्र

ये दयार-ए-इश्क़ है!

ये दयार-ए-इश्क़ है इसमें सहर,
बस्तियाँ कम कम हैं वीराने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’