इक ख़्वाब हमको घेरे था!

हमको उठना तो मुँह अँधेरे था,
लेकिन इक ख़्वाब हमको घेरे था|

जावेद अख़्तर

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती!

चिड़ियों के चहकार में गूंजे, राधा-मोहन अली-अली|
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती, घर की कुंडी जैसी मां |

निदा फ़ाज़ली