उँगलियों से फिसल रही है!

वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है,
ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है|

जावेद अख़्तर

कभी चांद नगर के हम हैं!

जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं,
कभी धरती के, कभी चांद नगर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ!

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ,
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा|

बशीर बद्र