सत्य!

बाबा नागार्जुन अपने समय के एक महत्वपूर्ण कवि रहे हैं, बड़े फक्कड़ अंदाज़ में बेबाक ढंग से अपनी बात रखते थे| आज की बाबा नागार्जुन जी की कविता, जैसा कि इसके कथ्य से ही स्पष्ट है, आपातकाल में लिखी गई थी| उस समय बाबा नागार्जुन जेल में भी रहे थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता–

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात


सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है


वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक

लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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नाव जर्जर ही सही!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमायर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ | दुष्यंत जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे, लेकिन वे जनकवि तब बने जब आपातकाल के दौरान उनकी एक के बाद एक ग़ज़लें सामने आईं, प्रारंभ में कमलेश्वर जी ने कथा पत्रिका सारिका में उनकी कुछ ग़ज़लें प्रकाशित कीं और बाद में इन ग़ज़लों को ‘साये में धूप’ नामक संकलन में प्रकाशित किया गया|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह ग़ज़ल –


इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

एक खंडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है|

एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है|

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बुनियाद हिलनी चाहिए!

स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की कुछ रचनाएं मैं पहले शेयर कर चुका हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के प्रमुख कवियों में शामिल थे, परंतु उनको विशेष रूप से प्रसिद्धि मिली थी आपातकाल में प्रकाशित उनकी विद्रोह के स्वर गुंजाने वाली ग़ज़लों से, जिन्हें बाद में उनके ग़ज़ल संकलन ‘साये में धूप’ में संकलित किया गया|

आज जो ग़ज़ल मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ वह दुष्यंत कुमार जी की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल है परंतु शायद मैं अब तक इसको यहाँ शेयर नहीं कर पाया हूँ, तो लीजिए यह आज प्रस्तुत है-


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए|

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए|

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए|

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए|

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है !

आज दुष्यंत कुमार जी की लिखी एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों में शामिल थी और जिसको उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल किया गया था| इसमें सभी रचनाएँ आपातकाल के विरोध में आन्दोलनधर्मी ग़ज़लें थीं|

उस समय आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था और इस ग़ज़ल के एक शेर में भी कहा गया है- ‘एक बूढ़ा आदमी है देश में, या यूं कहें, इस अंधेरी रोशनी में एक रोशनदान है’|

लीजिए प्रस्तुत है उस ज़माने में अत्यंत लोकप्रिय हुई यह ग़ज़ल-

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है|

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है|

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है|

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है|

इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके,
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है|

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है|

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं!

दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यिक कवि थे और आपात्काल के दौरान जब उन्होंने एक के बाद एक विद्रोह के स्वरों को गुंजाने वाली ग़ज़लें लिखीं, तब वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए| मुझे याद है उस समय कमलेश्वर जी साहित्यिक पत्रिका – ‘सारिका’ में निरंतर ये ग़ज़लें प्रकाशित करते थे और बाद में इनको ‘साये में धूप’ नामक संकलन में सम्मिलित किया गया|


लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी की यह ग़ज़ल-

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं|

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं|

बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है,
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं|

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं|


आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर,
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं|

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत,
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं!

दुष्यंत कुमार जी की आपातकाल में लिखी गई कुछ ग़ज़ल और कविताएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| आज दुष्यंत जी की एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल थी|


लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं,
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं|

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं|

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं|

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना,
ये गर्म राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं|

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है,
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं|


कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी,
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं|

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है,
चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|


प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं|

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,
उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं|

मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं|

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भूल कर खाने लगे हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है!

आज एक बार फिर से स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और आपात्काल मेन लिखे गए उनके गजल संग्रह – ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए थे| आपात्काल के उस दमनकारी माहौल में इस प्रकार की गज़लें लिखना में वास्तव में बहुत बड़ा साहस का का था|

लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत जी की ये गजल-

 

 

 

 

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

 

एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

 

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है|

 

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

 

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है|

 

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!

आज मैं फिर से एक बार दुष्यंत कुमार जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, दुष्यंत कुमार जी आपात्काल में लिखी गई अपनी गज़लों के कारण बहुत प्रसिद्ध हुए थे। मैंने पहले भी उनकी कुछ गज़लें शेयर की हैं।

आज की इस गज़ल में जन-साधारण का उनके कष्टपूर्ण जीवन की ओर ध्यान दिलाते हुए, यह आवाह्न किया गया है कि अब इन कष्टों का अंत होना चाहिए और इसके लिए प्रत्येक जीर्ण-शीर्ण मनुष्य को विद्रोह की मुद्रा में आगे बढ़ना चाहिए और एक सशक्त जन-आंदोलन प्रारंभ होना चाहिए।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह प्रसिद्ध गज़ल-

 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

 

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है!

दुष्यंत कुमार जी हिंदी के एक श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं, हिंदी कविता में उनका अच्छा-खासा योगदान है लेकिन आम जनता के बीच उनको विशेष ख्याति उस समय मिली जब उन्होंने आपात्काल में विद्रोह का स्वर गुंजाने वाली गज़लें लिखीं, बाद में इन गज़लों को एक संग्रह में सम्मिलित किया गया, जिसका शीर्षक है- ‘साये में धूप’। इस संग्रह में एक से एक बेहतरीन गज़लें थीं।

मैंने पहले भी उनकी कुछ श्रेष्ठ गज़लों को अपने ब्लॉग में शामिल किया है, आज प्रस्तुत है दुष्यंत जी की यह गज़ल-

 

 

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है,
एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है।

 

राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर,
इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है।

 

आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है,
हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है।

 

पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे,
रास्तों में एक भी बरगद नहीं है।

 

मैकदे का रास्ता अब भी खुला है,
सिर्फ़ आमद—रफ़्त ही ज़ायद नहीं।

 

इस चमन को देख कर किसने कहा था,
एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है।

 

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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