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जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|


प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं|

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,
उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं|

मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं|

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भूल कर खाने लगे हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है!

आज एक बार फिर से स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और आपात्काल मेन लिखे गए उनके गजल संग्रह – ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए थे| आपात्काल के उस दमनकारी माहौल में इस प्रकार की गज़लें लिखना में वास्तव में बहुत बड़ा साहस का का था|

लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत जी की ये गजल-

 

 

 

 

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

 

एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है|

 

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है|

 

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

 

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है|

 

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!

आज मैं फिर से एक बार दुष्यंत कुमार जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, दुष्यंत कुमार जी आपात्काल में लिखी गई अपनी गज़लों के कारण बहुत प्रसिद्ध हुए थे। मैंने पहले भी उनकी कुछ गज़लें शेयर की हैं।

आज की इस गज़ल में जन-साधारण का उनके कष्टपूर्ण जीवन की ओर ध्यान दिलाते हुए, यह आवाह्न किया गया है कि अब इन कष्टों का अंत होना चाहिए और इसके लिए प्रत्येक जीर्ण-शीर्ण मनुष्य को विद्रोह की मुद्रा में आगे बढ़ना चाहिए और एक सशक्त जन-आंदोलन प्रारंभ होना चाहिए।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह प्रसिद्ध गज़ल-

 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

 

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है!

दुष्यंत कुमार जी हिंदी के एक श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं, हिंदी कविता में उनका अच्छा-खासा योगदान है लेकिन आम जनता के बीच उनको विशेष ख्याति उस समय मिली जब उन्होंने आपात्काल में विद्रोह का स्वर गुंजाने वाली गज़लें लिखीं, बाद में इन गज़लों को एक संग्रह में सम्मिलित किया गया, जिसका शीर्षक है- ‘साये में धूप’। इस संग्रह में एक से एक बेहतरीन गज़लें थीं।

मैंने पहले भी उनकी कुछ श्रेष्ठ गज़लों को अपने ब्लॉग में शामिल किया है, आज प्रस्तुत है दुष्यंत जी की यह गज़ल-

 

 

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है,
एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है।

 

राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर,
इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है।

 

आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है,
हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है।

 

पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे,
रास्तों में एक भी बरगद नहीं है।

 

मैकदे का रास्ता अब भी खुला है,
सिर्फ़ आमद—रफ़्त ही ज़ायद नहीं।

 

इस चमन को देख कर किसने कहा था,
एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है।

 

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-4 : सन्नाटा शहर में!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौथा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस चौथी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

दिल्ली में रहते हुए, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन की अनेक बैठकों में मैंने भाग लिया था, सामान्यतः ये बैठकें दिल्ली विश्वविद्यालय में कहीं होती थीं और इनमें काफी बहादुरी भरी बातें होती थीं। आपातकाल में ऐसी ही बैठक दिल्ली में मंडी हाउस के पास स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय में हुई और मैंने देखा कि इस बैठक में सभी बहादुरों ने किसी न किसी बहाने से आपातकाल का समर्थन किया।

इस बैठक के अनुभव से प्रभावित होकर मैंने ये कविता लिखी थी-

 

सन्नाटा शहर में

 

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

बेहद ठंडा है शहरी मरुथल
लो अब हम इसको गरमाएंगे,
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

दड़बे में कुछ सुधार होना है,
हमको ही सूत्रधार होना है,
ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,
अपनी सरकार का बिछौना है।
चिंतन सन्नाटा गहराता है,
शब्द वमन से उसको ढाएंगे।
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

परख राजपुत्रों की थाती है,
कविता उस से छनकर आती है,
ऊंची हैं अब जो भी आवाज़ें,
सारी की सारी बाराती हैं,
अपनी प्रतिभा के चकमक टुकड़े
नगर कोतवाल को दिखाएंगे।
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

अंत में मेरी कुछ पंक्तियां, जो दिल्ली में यमुना पार निवास के दर्द को भी दर्शाती हैं-

हर एक मुक़ाम पर
ठहरा, झुका, सलाम किया,
वो अपना घर था, जिसे रास्ते में छोड़ दिया।

 

उधर हैं पार नदी के बहार-ओ-गुल कितने,
इधर हूँ मैं कि ये जीवन
नदी के पार जिया।

 

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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