Categories
Uncategorized

पधारो महाराज!

देश की और विशेष रूप से मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव हुआ है। लंबे समय तक कांग्रेस में राहुल गांधी के निकटतम साथी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लंबे समय तक उपेक्षा सहने के बाद कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए।

 

 

पहले भी कांग्रेस के वर्तमान शाही परिवार से उपेक्षा सहने के बाद अनेक युवा नेता कांग्रेस छोड़ चुके हैं लेकिन यह झटका शायद ज्यादा बड़ा है। कांग्रेस के ‘मालिक’ घराने को युवा नेताओं से शायद ज्यादा खतरा लगता है कि कहीं उनकी प्रतिभा के सामने कांग्रेस के युवराज फीके नहीं पड़ जाएं। वैसे भी देखा जाए तो कांग्रेस में आज भी अनेक ऐसे युवा नेता हैं, जिनके सामने कांग्रेस के ये संस्कारहीन युवराज कहीं नहीं ठहरते। समय-समय पर वे ‘डंडा मारने’ और इसी तरह के वक्तव्यों से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते रहते हैं।

ये बात तो निश्चित है कि कांग्रेस में ‘वाड्रा’ फैमिली के अलावा हर किसी को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना होता है और यदि किसी की प्रतिभा के सामने आज के युवराज फीके पड़ते हों, तो फिर उसको सत्ता के केंद्र से दूर ही रखा जाएगा।

श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को मैंने अनेक बार संसद में और अन्य स्थानों पर बोलते हुए सुना है, अपनी शालीनता और शब्द चयन से वे हमेशा प्रभावित करते हैं। उनकी एक अभिव्यक्ति जो मुझे कुछ अटपटी लगती थी, वह भी मुझे याद है, जब सुमित्रा महाजन जी सदन की अध्यक्षा थीं, तब वे उनको संबोधित करते थे ‘अध्यक्षा महोदय’। हर किसी की, कुछ मामलों में अलग अभिव्यक्ति होती है, सो यह मुझे याद रह गई।

वाड्रा परिवार को युवा लोगों से कितना डर लगता है, इसका उदाहरण इससे मिलता है कि कल कोई चैनल बता रहा था कि कांग्रेस की संसदीय समिति में सदस्यों की औसत उम्र अब 70 वर्ष हो गई है।

खैर ज्योतिरादित्य सिंधिया जी के पिता को भी एक समय कांग्रेस छोड़कर  निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सदन में आना पड़ा था। जब ये लोग कांग्रेस में थे तब विरोधियों द्वारा इनके वंश को कभी-कभार गद्दार कह दिया जाता था, अब कांग्रेस वाले ऐसा कहने लगे हैं। मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि ज्योतिरादित्य जी या राजमाता से लेकर इनके वंश के जो भी नेता राजनीति में रहे हैं, उनको उनके अपने निष्पादन के बल पर ही परखा जाना चाहिए।

मुझे आशा है कि भाजपा में ज्योतिरादित्य जी को पर्याप्त अवसर मिलेगा और वे अपना समुचित योगदान सरकार के निष्पादन में कर सकेंगे।

एक बात यह भी मन में आती है कि देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस को यदि फिर से उभरना है तो उसको ‘वाड्रा कांग्रेस’ की जगह, इस खानदान का मोह छोड़ते हुए ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ बनना होगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****

Categories
Uncategorized

हाथ खाली हैं मगर…!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।

 

कुछ इस तरह ही मुझे याद है, और मुझे लगता है कि ब्लॉग लिखना एक बार शुरू किया तो फिर इसको बार-बार लिखने की ज़िद भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ कहानी सुनाने वाले भी खुद और सुनने वाले भी खुद ही। हाँ ये देखकर अच्छा लगता है कि मेरी साइट पर जाकर बहुत सारे अजनबी लोग, पुराने ब्लॉग्स को खोज-खोजकर पढ़ते हैं।

हाँ तो मैंने अपने एनटीपीसी के सेवाकाल के संबंध में काफी लिखा है। वहाँ पर मुझे क्रय-समितियों में बहुत बार दौरों पर जाना पड़ा है। सच बात तो ये है कि मैं कभी खुद अपने लिए भी खरीदारी नहीं करता। क्रय समितियों में जो औपचारिकताएं हैं, चयन से संबंधित, वे सब वित्त और सामग्री विभाग के लोग पूरा करते थे, मैं मानव संसाधन विभाग का प्रतिनिधि होने के नाते, केवल मौन मध्यस्थ की भूमिका में उनके साथ रहता था। क्रय समिति में जाने का आकर्षण मेरे लिए मात्र दूसरे शहर में घूमना ही होता था।
हाँ कभी-कभी मेरी भूमिका आती थी, जैसा कि मैंने एक ब्लॉग में लिखा था, चरित्र की शिक्षा देने वाले एक विद्यालय के शिक्षक जब, स्कूल से संबंधित खरीदारी के लिए साथ गए थे, और कमीशन खाने के चक्कर में एक खास पार्टी की वकालत करने लगे थे, तब हमने वहाँ से न खरीदने का फैसला लिया और कोटेशन लेकर वापस आ गए थे।

आज अचानक शुरू-शुरू का एक क्रय-समिति में जाने का अनुभव याद आ गया। विंध्यनगर, मध्य प्रदेश में मैं कार्यरत था, कार्यपालक के रूप में और वहाँ पास के ही बाज़ार से कुछ पुरस्कार आदि खरीदने थे। हमारी क्रय समिति में, अन्य लोगों के साथ ही साथ, मेरे अपने विभाग के एक पर्यवेक्षक थे, जो संभवतः काफी आदर करने वाले थे और मुझसे बात करते समय, उनके हर वाक्य में दो बार ‘सर’ आता था।

आज यह घटना अचानक क्यों याद आ गई, उसका कारण यही है कि वह दुकान, जहाँ से हमने सामान खरीदा वहाँ पर ही मैंने इस तरफ ध्यान दिया कि मेरा यह साथी जो हर वाक्य में दो बार ‘सर’ बोलता था, दुकान पर एक घंटा चर्चा करने के दौरान उसके मुंह से एक बार भी ‘सर’ नहीं निकला और इसके अलावा यदि ध्यान से दुकानदार से बातचीत के अंदाज को देखा जाए तो यही लगेगा कि वह साथी ही मेरे बॉस थे।

खैर अचानक मेरा यह ऑब्ज़र्वेशन मुझे आज याद आ गया, इस बदले अंदाज़ से यदि मेरे उस साथी को कोई लाभ हुआ तो वही जानता होगा, वैसे मैं बाद में सामान्यतः दूसरे विभागों के अपने समकक्ष या अपने से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही गया और विक्रेता को अपनी स्थिति के बारे में ‘इम्प्रेस’ करने में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही, मुझे तो यही जल्दी रहती थी कि यह झमेला खत्म हो तो मैं कुछ समय शहर में घूम लूं।

खरीदारी की विशेषज्ञता तो मैं चाहता हूँ कि मेरी ऐसी ही बनी रहे-

हूँ बहुत नादान, करता हूँ ये नादानी
बेचकर खुशियां खरीदूं आंख का पानी,
हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ।
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ॥

नमस्कार।

***************

Categories
Uncategorized

75.जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

 

 

ज़नाब राहत इंदौरी का एक शेर याद आ रहा है जो उन्होंने किसी प्रोग्राम में पढ़ा था-

बनके इक हादसा, किरदार में आ जाएगा
जो हुआ ही नहीं, अखबार में आ जाएगा।

अब खबरों की दुनिया की क्या बात करें। आज बड़े-बड़े चैनलों पर जो पत्रकार, एंकर काम कर रहे हैं उनकी शक्ल देखने से पहले उनका चश्मा दिखाई देता है, कौन सी घटना इनके लिए महत्वपूर्ण होगी कौन सी नहीं, ये इनका प्रोग्राम देखने वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है, यहाँ तक कौन सी लाश पर ये देर तक बीन बजाएंगे और कौन सी हत्या या हत्याएं इनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है! इतना ही नहीं, मोदी जी और राहुल बाबा की तरह इनके भी फैन हैं, जो इनके द्वारा किसी खबर को महत्व दिए जाने और किसी को नकारे जाने के मामले में पूरी तरह साथ रहते हैं। इस मामले में यह भी शामिल है कि कहाँ घटना हो तो वहाँ का मुख्यमंत्री ज़िम्मेदार है और कहाँ उस गरीब की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।

खैर, ये तो मैंने बात शुरू करने के लिए कह दिया, मैं यात्रा करना चाहता हूँ पुराने दिनों में, जब हमने नगर संवाददाताओं, पत्रकारों, छोटे-छोटे अखबार छापने वालों को शुरू-शुरू में जाना था।

शाहदरा की बात है, शायद सत्तर के दशक की, वहाँ मैं कवि-गोष्ठियां आदि सुनने के लिए जाता था, वहाँ मालूम होता था कि किसी राष्ट्रीय समाचार पत्र के नगर संवाददाता थे, उनका काम खबरें एकत्रित करना नहीं था, बल्कि ये था कि किस खबर को अखबार में जाने दिया जाए और किसको रोक दिया जाए। अक्सर आयोजक लोग कवि गोष्ठी की खबर छपवाने के लिए उनसे गुहार लगाते थे। बाद में तो इस प्रकार के आयोजनों और उनकी रिपोर्ट छपवाने की गतिविधियां मैंने स्वयं काफी कीं, जन संपर्क का काम देखा तो पत्रकारों को मित्र बनाया और कंपनी से जुड़ी बहुत सी खबरें, रिपोर्टें उनके माध्यम से छपवाईं।

आगे बढ़ने से पहले एक पत्रकार मित्र की बात बताऊं जो आगरा में एक छोटा सा अखबार छापते थे। उनके हाथ कुछ यशकामी लोग लग जाते थे या वे उनको ऐसा बना देते थे। जैसे एक कल्लू टाल वाले थे, जो लकड़ियों की एक बड़ी सी टाल चलाते थे। कमाई ठीक-ठाक थी उनकी, वे उनसे मिलते और बोलते कि देखो कल तुम मर जाओगे, लोग तुमको किस नाम से जानेंगे, ‘कल्लू टाल वाला’, तुम्हारे नाम से कुछ छाप देता हूँ अखबार में, नाम हो जाएगा। और अगर वो नहीं मानता तो ये भी बताते कि तुम्हारे खिलाफ कुछ लिख दूंगा, फिर सफाई देते फिरना। इस प्रकार वो कल्लू टालवाला चक्कर में आ जाता था और उनको कुछ दाना-पानी दे देता था।

वैसे कल्लू टालवाले के बहाने मुझे कुछ फिल्मी पात्र भी याद आ गए, एक तो ‘चमेली की शादी’ में थे ‘हैं जी’, जो ख्याति पाने के लिए राजनीति में उतरना चाहते थे और एक बेचारे थे मुकरी, जिनके छोटे से शरीर पर ‘अइयो बल्ली प्यार का दुश्मन, हाय-हाय’ जैसी लानत लगी थी!

खैर फिर से वास्तविक दुनिया के पत्रकारों पर आते हैं, देश के कुछ सुदूर स्थानों पर छोटे-छोटे अखबार छापकर ब्लैकमेल करने का धंधा भी काफी चलता रहा है, शायद आज भी कुछ स्थानों पर चलता हो। जब मैं एनटीपीसी, विंध्यनगर में था, जो मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित है, जहाँ कुंवर अर्जुन सिंह जी ने ‘चुरहट लॉटरी कांड’ को अंजाम देकर, उस क्षेत्र को ख्याति दिलाई थी।

हाँ तो इस परियोजना जब मैं था, तब वहाँ सीधी के एक सज्जन थे, जो पत्रकार कहलाते थे, वे चार पन्नों का एक अनियतकालीन अखबार निकालते थे-‘विंध्य टाइगर’। कंपनी के गेस्ट हाउस में उनको आते ही कमरा मिल जाता था, साथ में खाना और दारू भी, क्योंकि गेस्ट हाउस चलाने वाले ठेकेदार को अपनी खैरियत की चिंता थी। एनटीपीसी तो वैसे भी इलाके के बदमाश लोगों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी। तो ये पत्रकार महोदय आकर ठेकेदारों से वसूली करते, धमकी देते और जिसके साथ इनकी पिछली बार पैसे को लेकर बात नहीं बनी थी, उसके खिलाफ छापकर लाया हुआ चार पृष्ठ का (छोटे आकार का) अखबार कॉलोनी और दफ्तर में अनेक स्थानों पर चिपका देते।

ऐसे लोगों को ब्लैकमेल करने के लिए तो लोग मिल ही जाते हैं। जैसे मुझे याद आ रहा है कि वहाँ नगर प्रशासन विभाग के प्रधान एक बार बने श्री रघुरमन, उनके समय में यह हुआ कि सड़कों आदि की जीवन अवधि अचानक काफी कम हो गई। इसको हमने इस रूप में जाना कि जिस प्रकार पौधों में जीवन प्रमाणित करने वाला परीक्षण ‘रमन इफेक्ट’ कहलाता है, वैसे ही सड़कों की आयु कम करने वाला परीक्षण ‘रघुरमन इफेक्ट’ है।

क्षमा करें, यह नाम अचानक याद आ गया, बहुत पुरानी बात है और ये सज्जन इंचार्ज थे, मैं कोई दोष उनको नहीं दे रहा हूँ, बस अपनी बात कहने का माध्यम उनको बना लिया, ये कोई और ‘इफेक्ट’ भी हो सकता है।

इस प्रकार एक-दो पत्रकारों के माध्यम से, जो याद आया कि छोटे स्थानों पर जो एक विशेष प्रकार की पत्रकारिता होती थी, शायद आज भी होती हो, उसकी एक बानगी प्रस्तुत की है।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

****************