उस भोर तक जाती तो है!

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है|

दुष्यंत कुमार

कितनी देर लगा दी आने में!

शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं,
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में|

गुलज़ार

हमीं ने शाम चुनी है!

सहर भी, रात भी, दोपहर भी मिली लेकिन,
हमीं ने शाम चुनी है, नहीं उदास नहीं|

गुलज़ार

एक छोटी सी मुलाकात!

स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी हिन्दी में अपनी तरह के एक अनूठे कवि थे| उनकी एक कविता जो अक्सर मुझे याद आती है, वह है- ‘उठ मेरी बेटी सुबह हो गई’ जिसमें एक लाचार पिता अपनी बच्ची को जीवन की कुछ समझाता है|
लीजिए प्रस्तुत है, स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता, जिसका कथ्य स्वतः स्पष्ट है-

कुछ देर और बैठो –
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।

शब्दों के जलते कोयलों की आँच
अभी तो तेज़ होनी शुरु हुई है
उसकी दमक
आत्मा तक तराश देनेवाली
अपनी मुस्कान पर
मुझे देख लेने दो

मैं जानता हूँ
आँच और रोशनी से
किसी को रोका नहीं जा सकता
दीवारें खड़ी करनी होती हैं
ऐसी दीवार जो किसी का घर हो जाए।


कुछ देर और बैठो –
देखो पेड़ों की परछाइयाँ तक
अभी उनमें लय नहीं हुई हैं
और एक-एक पत्ती
अलग-अलग दीख रही है।

कुछ देर और बैठो –
अपनी मुस्कान की यह तेज़ धार
रगों को चीरती हुई
मेरी आत्मा तक पहुँच जाने दो
और उसकी एक ऐसी फाँक कर आने दो
जिसे मैं अपने एकांत में
शब्दों के इन जलते कोयलों पर
लाख की तरह पिघला-पिघलाकर
नाना आकृतियाँ बनाता रहूँ
और अपने सूनेपन को
तुमसे सजाता रहूँ।


कुछ देर और बैठो –
और एकटक मेरी ओर देखो
कितनी बर्फ मुझमें गिर रही है।
इस निचाट मैदान में
हवाएँ कितनी गुर्रा रही हैं
और हर परिचित कदमों की आहट
कितनी अपरिचित और हमलावर होती जा रही है।

कुछ देर और बैठो –
इतनी देर तो ज़रूर ही
कि जब तुम घर पहुँचकर
अपने कपड़े उतारो
तो एक परछाईं दीवार से सटी देख सको
और उसे पहचान भी सको।


कुछ देर और बैठो
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।
उन्हें हट तो जाने दो –
शब्दों के इन जलते कोयलों पर
गिरने तो दो
समिधा की तरह
मेरी एकांत
समर्पित

खामोशी!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आहटें, घबराहटें, परछाइयां !

क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार,
आहटें, घबराहटें, परछाइयाँ|

कैफ़ भोपाली

फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो!

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो,
कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो|

राहत इन्दौरी

बहुत तेज़ क़दम आते हैं !

कोई लश्कर है के बढ़ते हुए ग़म आते हैं |
शाम के साये बहुत तेज़ क़दम आते हैं ||

बशीर बद्र