ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा!

पड़ेगा वक़्त जब मेरी दुआएँ काम आएंगी,
अभी कुछ तल्ख़ लगता है ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा|

बेकल उत्साही

जुबां है किसी बेजुबान की!

जुल्फों के पेंचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,
ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान की|

गोपालदास ‘नीरज’

गर्दनों पर टाइयां हैं!

दिलों की बात ओंठों तक न आए,
कसी यूँ गर्दनों पर टाइयां हैं|

सूर्यभानु गुप्त

आँखों ने कुछ और कह दिया!

लेकिन हमारी आँखों ने कुछ और कह दिया,
कुछ और कहते रह गए अपनी ज़बाँ से हम|

राजेश रेड्डी

आँखों से कहलाना ज़रूरी है!

मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है,
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है |

वसीम बरेलवी

वह झंकार है कविता!

नीलम सिंह जी एक सृजनशील कवियित्री हैं, उनके एक गीत की पंक्तियां मुझे अक्सर याद आती हैं-

धूप, धुआँ, पानी में,
ऋतु की मनमानी में,
सूख गए पौधे तो
मन को मत कोसना,
और काम सोचना|

आज प्रस्तुत है नीलम सिंह जी की एक और प्रभावशाली कविता, जो वास्तव में ‘कविता’ की क्षमता और प्रभाविता के बारे में ही है –

शब्दों के जोड़-तोड़ से
गणित की तरह
हल की जा रही है जो
वह कविता नहीं है|

अपनी सामर्थ्य से दूना
बोझ उठाते-उठाते
चटख गई हैं जिनकी हड्डियाँ
उन मज़दूरों के
ज़िस्म का दर्द है कविता
भूख से लड़ने के लिये
तवे पर पक रही है जो
उस रोटी की गंध है कविता|


उतार सकता है जो
ख़ुदा के चेहरे से भी नकाब
वो मज़बूत हाथ है कविता
जीती जा सकती है जिससे
बड़ी से बड़ी जंग
वह हथियार है कविता|

जिसके आँचल की छाया में
पलते हैं हमारी आँखों के
बेहिसाब सपने
उस माँ का प्यार है कविता
जिसके तुतलाते स्वर
कहना चाहते हैं बहुत कुछ
उस बच्चे की नई वर्णमाला का
अक्षर है कविता|


कविता एकलव्य का अँगूठा नहीं है
कि गुरु-दक्षिणा के बहाने
कटवा दिया जाय
वह अर्जुन का गाण्डीव है, कृष्ण का सुदर्शन चक्र ।

कविता नदी की क्षीण रेखा नहीं
समुद्र का विस्तार है
जो गुंजित कर सकती है
पूरे ब्रह्माण्ड को
वह झंकार है कविता ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही!

आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ शेयर और ग़ज़ल लेखक राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राजेश जी की कुछ ग़ज़लें मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की ग़ज़ल में उन्होंने यह व्यक्त किया है कि वर्तमान समय में लोगों को प्रभावित करने के लिए सच में झूठ की मिलावट बहुत जरूरी है और लोगों को खुद्दारी की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही ।
कितनी कोशिश की, मगर, हर बार थोड़ी कम रही ।

कुछ अना भी बिकने को तैयार थोड़ी कम रही,
और कुछ दीनार की झनकार थोड़ी कम रही ।

ज़िन्दगी ! तेरे क़दम भी हर बुलन्दी चूमती,
तू ही झुकने के लिए तैयार थोड़ी कम रही ।

सुनते आए हैं कि पानी से भी कट जाते हैं संग,
शायद अपने आँसुओं की धार थोड़ी कम रही ।

या तो इस दुनिया के मनवाने में कोई बात थी,
या हमारी नीयत-ए-इनकार थोड़ी कम रही ।

रंग और ख़ुशबू का जादू अबके पहले सा न था,
मौसम-ए-गुल में बहार इस बार थोड़ी कम रही ।


आज दिल को अक़्ल ने जल्दी ही राज़ी कर लिया
रोज़ से कुछ आज की तकरार थोड़ी कम रही ।

लोग सुन कर दास्ताँ चुप रह गए, रोए नहीं,
शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरी एक और कविता

आज फिर से पुराना लिखा हुआ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ-


गीत जो लिखे गए, लिखे गए।

किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की
आकुल चेष्टाओं की छाप,
भोगीं या केवल अंकित किया-
नाप-नाप कागज पर
रक्त सने पंजों का ग्राफ|

मैं कभी, कहीं नहीं रहा सृष्टा|
सृष्टि नहीं होती ऐसे कोई,
नहीं ही है कोई रचना|


भौचक लखते भर हैं
और क्रमशः करके पहचान आत्म-रूप की,
छाप अपनी, या कि अपने पर,
कहने भर का साहस करते हैं-
यह मेरी कविता है!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’


कभी ये कुछ लिखा था, जैसा भी आज याद आया सोचा कि कच्चा माल ही शेयर कर लेता हूँ|

नमस्कार|
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दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आत्म-मुग्ध, आत्म-लिप्त, आत्म-विरत!

मुझे ‘गर्म हवा’ फिल्म का प्रसंग याद आ रहा है| विभाजन के समय के वातावरण पर बनी थी वह फिल्म, जिसमें स्वर्गीय बलराज साहनी जी ने आगरा के एक मुस्लिम जूता व्यापारी की भूमिका बड़ी खूबसूरती से निभाई थी|

 

 

उस फिल्म में एक मुस्लिम नेता का चरित्र दिखाया गया है, जिसे तालियाँ बजवाने का शौक है, जैसा कि नेताओं को होता ही है| वह अपने भाषणों में कहता है कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वाला आखिरी व्यक्ति होगा| इस प्रकार की बात अक्सर नेता लोग तालियाँ पिटवाने के लिए करते हैं| लेकिन बाद में इन नेताजी को लगता है कि बदलते माहौल में यहाँ उनकी नेतागिरी नहीं चलने वाली| ऐसे में वे अचानक अपनी बेगम को बताते हैं कि हम पाकिस्तान जाएंगे, उनका सामान तांगे में लदता है, और अचानक उनकी तसवीर उल्टी हो जाती है और पृष्ठभूमि में तालियों की आवाज आती है| बड़े प्रतीकात्मक तरीके से यहाँ उनके पलटी मारने, कथनी और करनी के अंतर को दर्शाया गया है|

अचानक यह प्रसंग याद आ गया, और एक बात और कि जब वे जा रहे होते हैं, तब उनका जवान बेटा देखता है कि युवक लोग जूलूस निकाल रहे हैं और रोजगार आदि संबंधी अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं| बेटा तांगे से उतर जाता है और बोलता है कि उसकी जगह तो यही है, वह यहाँ रहकर ही अपने युवा साथियों के साथ संघर्ष करेगा|

मैं बात करना चाह रहा था ऐसे लोगों की जो जीवन में आत्म मुग्ध रहते हैं, नेतागण अधिकतर इसी श्रेणी में आते हैं| उनको दूसरों के दोष दिखाई देते हैं और वास्तव में दूसरों के दोष निकालना ही उनका मुख्य काम होता है| वे यह तो सोच ही नहीं पाते कि उनमें भी कोई दोष हो सकता है| यह वास्तव में बहुत खराब स्थिति होती है जब व्यक्ति न केवल अपनी कमियों पर ध्यान देना बंद कर देता है अपितु इस संबंध में सुनना भी नहीं चाहता, तब उसके सुधार की गुंजाइश नहीं बचती और वह क्रमशः लोगों के बीच अपना सम्मान खोता जाता है|

हम जो कुछ एक अधिकारी/कर्मचारी होने के नाते, सिस्टम का एक पार्ट होने के नाते करते हैं, वह हमारी एक भूमिका होती है और उस भूमिका का निर्वाह होने से हमें तसल्ली भी होती है| लेकिन एक यात्रा इसके साथ-साथ चलती है या शायद चलनी चाहिए!

एक प्रसंग याद आ रहा है सेवाकाल का| हमारे एक महाप्रबंधक थे, मिस्टर दुआ, जब मैं एक विद्युत परियोजना में काम करता था| वे अपने पद की भूमिका तो ठीक से निभाते ही थे, लेकिन एक क्रिएटिव व्यक्ति होने के नाते वे संस्कृतिक गतिविधियों में भी रुचि लेते थे और भाग लेते थे| उन्होंने इस दृष्टि से वहाँ लॉयंस क्लब की गतिविधि प्रारंभ कीं| अब वे इसमें रुचि लेते थे तो अधिकारीगण भी सदस्य बनते गए| इस प्रकार एक विशाल नेटवर्क वहाँ तैयार हो गया| आसपास के सोशली एक्टिव लोग भी इसमें जुड़ते गए|

अब कुछ उपयोगी काम तो होते ही होंगे इसके अलावा बहुत से लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने और तालियाँ पिटवाने का भी अवसर मिला| लेकिन मिस्टर दुआ को हमेशा तो वहाँ नहीं रहना था| उनका ट्रांसफर हुआ और एक मिस्टर सिंह उनके स्थान पर आए| महाप्रबंधक से निचले स्टार के लॉयंस क्लब में सक्रिय अधिकारियों ने लॉयन्स क्लब का एक प्रोग्राम रखा और मिस्टर सिंह के पास उसके लिए आमंत्रित करने गए| इस पर मिस्टर सिंह बोले- ‘न मैं जाऊंगा और न तुमको जाने दूंगा| आप यहाँ बिजली पैदा करने आए हैं या ये सब करने आए हैं|’

हर व्यक्ति की इस संबंध में अपनी फिलोसफ़ी है| कुछ लोग सिर्फ सिस्टम का पुर्जा बने रहना पसंद करते हैं, कुछ इन सीमाओं का बार-बार अतिक्रमण करते हैं|

मेरे अपने सेवाकाल के दौरान मैंने ऐसे कई लोगों से प्रेरणा प्राप्त की और स्वयं भी ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश की, जिससे कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात कह सकता है, आपकी कमी भी बता सकता है| जबकि एक-दो अधिकारी ऐसे भी थे, जिनके बारे में सभी जानते थे कि उनसे सहज होकर कुछ देर बात करना भी संभव नहीं है| कुछ ही देर में उनके सहज व्यवहार की सीमा समाप्त हो जाती है और किसी न किसी बहाने से ब्लास्ट पाइंट आ जाता है|

आज ऐसे ही खयाल आया कि इन आत्म मुग्ध किस्म के प्राणियों को श्रद्धांजलि दी जाए|

जबकि मैं यह आलेख समाप्त करने को था तभी यह खबर मिली कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और मेहनती कलाकार सुशांत सिंह राजपूत ने अपने मुंबई स्थित निवास में आत्महत्या कर ली| ये परेशानियाँ सिर्फ पैसे की कमी से ही नहीं होतीं जी! सबको संतोष प्राप्त हो यही कामना है| ऐसा प्रतिभाशाली कलाकार जिससे समाज को ऐसी अनेक प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाए जाने की उम्मीद रहती है, उसके अचानक चले जाने और इस मामले में तो हथियार डाल देने की जानकारी मिलने पर बहुत दुख होता है|

क्यों ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति, और ऐसा सफल व्यक्ति, जीवन में अंदर ही अंदर घुटता रहता है और दुनिया को तभी मालूम होता है जब वह आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठा लेता है| काश ये दुनिया ज्यादा रहने लायक होती|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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