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मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा !

एक बार फिर से मैं, हिन्दी काव्य मंचों और फिल्मी दुनिया, दोनों क्षेत्रों में अपनी रचनाधर्मिता की अमिट छाप छोड़ने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी गजल, जिसे वे ‘गीतिका’ कहते थे प्रस्तुत कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे, वहीं उन्होंने हमारी फिल्मों में भी अनेक साहित्यिक गरिमा से युक्त गीत लिखे|


आज की यह गजल भी उनकी एक अलग पहचान प्रस्तुत करती है –

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा ।


वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,
उसे न कुछ भी मिला, जो अगर-मगर में रहा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अब दो आलम में, उजाले ही उजाले होंगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

 

 

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

 

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,
उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।
(डॉ. बालस्वरूप राही)

 

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।
(डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

 

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

 

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,
मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

 

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,
क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

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