उनमें नींद पराई है!

यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं,
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है|

क़तील शिफ़ाई

मेरी आँख में आना नहीं आता!

ढूँढे है तो पलकों पे चमकने के बहाने,
आँसू को मेरी आँख में आना नहीं आता|

वसीम बरेलवी

हो गयी वो नज़र सयानी भी!

अपनी मासूमियों के पर्दे में
हो गयी वो नज़र सयानी भी।

फ़िराक़ गोरखपुरी

निगाहों की बदगुमानी भी!

लाख हुस्ने-यक़ीं से बढ़कर है
उन निगाहों की बदगुमानी भी।

फ़िराक़ गोरखपुरी

मेरी आँखों पे ही क्यों ये तोहमतें !

मेरी आँखों पे ही क्यों ये तोहमतें,
अपने बारे में भी सोचा आपने।

नक़्श लायलपुरी

नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों!

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों,
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों|

इब्ने इंशा

न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था!

न वो आँख ही तेरी आँख थी, न वो ख़्वाब ही तेरा ख़्वाब था,
दिले मुन्तज़िर तो है किसलिए, तेरा जागना उसे भूल जा।

अमजद इस्लाम

आवाज़ होती जा रही है!

ख़मोशी साज़ होती जा रही है,
नज़र आवाज़ होती जा रही है|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

जिसे जितना शुऊर था!

इस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार,
उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’