आँसुओं के मरासिम पुराने हैं!

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं,
मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

निगाह को ऐसी रसाई दे!

देना है तो निगाह को ऐसी रसाई दे,
मैं देखता हूँ आइना तो मुझे तू दिखाई दे|

कृष्ण बिहारी नूर

मिलती है तो क्या क्या नहीं होता!

ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता,
आँख उनसे जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता|

अकबर इलाहाबादी

आँखों में जो बात हो गई है!

आँखों में जो बात हो गई है,
इक शरह-ए-हयात हो गई है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

सदा थी किसी भूली याद की!

चेहरा था या सदा थी किसी भूली याद की,
आँखें थीं उसकी यारो कि दरिया-ए-नूर था|

मुनीर नियाज़ी

दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम!

क्या कहें उल्फ़त में राज़-ए-बे-हिसी क्यूँकर खुला,
हर नज़र को तेरी दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपुरी

किसी और का चेहरा है कि तुम हो!

देखो ये किसी और की आँखें हैं कि मेरी,
देखूँ ये किसी और का चेहरा है कि तुम हो|

अहमद फ़राज़

आँख उसकी बड़ी सयानी है!

बन के मासूम सब को ताड़ गई,
आँख उसकी बड़ी सयानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

आँखें बोलेंगी!

आज एक और सुंदर कविता स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक और सुंदर कविता –


जीभ की ज़रूरत नहीं है

क्योंकि कहकर या बोलकर
मन की बातें ज़ाहिर करने की
सूरत नहीं है

हम
बोलेंगे नहीं अब
घूमेंगे-भर खुले में

लोग
आँखें देखेंगे हमारी
आँखें हमारी बोलेंगी

बेचैनी घोलेंगी
हमारी आँखें
वातावरण में

जैसे प्रकृति घोलती है
प्रतिक्षण जीवन
करोड़ों बरस के आग्रही मरण में

और
सुगबुगाना पड़ता है
उसे

संग से
शरारे
छूटने लगते हैं

पहाड़ की छाती से
फूटने लगते हैं
झरने !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में!

ख़राब सदियों की बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में,
अब इन बे-अंत ख़लाओं में ख़्वाब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी