कुछ भी यहाँ नहीं मिलता!

खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में,
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता|

कैफ़ी आज़मी

इक अजीब सी ये नक़ाब है!

कहीं छाँव है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है,
कई चेहरे इस में छुपे हुए, इक अजीब सी ये नक़ाब है|

राजेश रेड्डी

ख्वाब भी मर जाते हैं!

अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नजर आते हैं,
मुझको मालूम ना था ख्वाब भी मर जाते हैं|

अहमद फ़राज़

सुलगते हैं सवालों की तरह!

मुझसे नजरे तो मिलाओ कि हजारों चेहरे,
मेरी आंखों में सुलगते हैं सवालों की तरह|

जां निसार अख़्तर