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एक जाला-सा समय की आँख में उतरा!

आज हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर- श्री राजेन्द्र गौतम का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में सामान्य जन के लिए संघर्ष और आशावाद का संदेश दिया गया है| यह विश्वास व्यक्त किया गया है की परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो, हम लोग मिलकर उनका सामना कर सकते हैं| इस अंधेरी सुरंग के पार रोशनी की सौगात अवश्य मिलेगी|


आइए इस नवगीत का आनंद लेते हैं-



यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे,
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है|

सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को,
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है|

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा,
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।


संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है,
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली|
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने,
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली|


पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे,
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मौसम नहीं, मन चाहिए !

एक बार फिर से आज हिन्दी काव्य मंचों पर गीत परंपरा के एक लोकप्रिय स्वर रहे, स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस गीत में यही संदेश दिया गया है कि अगर हमारे हौसले बुलंद हों, अगर हमारे मन में पक्का संकल्प हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक लोकप्रिय गीत-

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं,
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुये सब फासले,
दूरी कहीं कोई नहीं, केवल समर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

हर दर्द झूठा लग रहा, सहकर मजा आता नहीं,
आँसू वही आँखें वही
कुछ है ग़लत कुछ है सही,
जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

राहें पुरानी पड़ गईं, आख़िर मुसाफ़िर क्या करे !
सम्भोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक,
भटके हुये इन्सान को, कुछ और जीवन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कोई न हो जब साथ तो, एकान्त को आवाज़ दें !
इस पार क्या उस पार क्या !
पतवार क्या मँझधार क्या !!
हर प्यास को जो दे डुबा वह एक सावन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कैसे जियें कैसे मरें यह तो पुरानी बात है !
जो कर सकें आओ करें
बदनामियों से क्यों डरें,
जिसमें नियम-संयम न हो, वह प्यार का क्षण चाहिए!

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएंगे।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी।

 

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

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देवों के देव महादेव!

मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट में यह उल्लेख किया है की लॉक डाउन प्रारंभ होने के बाद हमने हॉटस्टार पर धार्मिक सीरियल – ‘देवों के देव महादेव’ देखना प्रारंभ किया था और अभी तक हम इसे देख रहे हैं| हर रोज हम 4-5 एपिसोड तो देख ही लेते हैं, और ऐसा लगता है की अभी भी इसका 20% भाग देखना बाकी है|

 

महादेव जिनको आदि-देव कहा जाता है और उनके साथ आदि-शक्ति जगदंबा पार्वती| वास्तव में कैलाश में बसने वाले महादेव – त्रिदेव के दिव्य सदस्य ऐसे हैं कि जिनके चमत्कारों का वर्णन करना बहुत कठिन है| महादेव और जगत जननी, अनेक बार अनेक रूपों में मिलते हैं| बम भोले कहे जाने वाले महादेव कभी बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं और जब रुष्ट हो जाते हैं तब त्रिदेव और सारे देवता उनको मनाने में लग जाते हैं| सभी लोग जब श्रेष्ठ वस्तुओं, सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हैं तब महादेव दुनिया के कल्याण के लिए विषपान करते हैं, और देवता लोग अमृत पाकर खुशी मनाते हैं|

देवताओं पर जब संकट आता है, तब वे महादेव की शरण में आते हैं और बाद में उनको भूल जाते हैं, अहंकार में डूब जाते हैं| इन्द्र के अहंकारी स्वभाव के अनेक उदाहरण इस कथा में आते हैं| तुलसीदास जी ने देवताओं के बारे में लिखा है-

आए देव सदा स्वारथी, बात करहीं जनु परमारथी|

महादेव के यशस्वी पुत्र- कार्तिकेय, जो देवताओं के सेनापति थे, गणेश जी, जिनको उनके श्रेष्ठ गुणों और बुद्धिमत्ता के कारण- प्रथम पूज्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ| इनकी पुत्री – अशोक सुंदरी, जिनके पति नहुष देवराज इन्द्र का आसन भी प्राप्त कर लेते हैं लेकिन अपने अहंकार के कारण एक ऋषी से श्राप पाकर सर्प बन जाते हैं|

ऐसे अनेक पौराणिक पात्र हैं जिनकी कथाएँ इस विराट सीरियल के माध्यम से जानने को मिलती हैं| कुछ पात्र हैं- महादेव की ही ऊर्जा से उत्पन्न – जलंधर और अंधक, जलंधर तो त्रिलोकाधिपति भी बन जाते हैं, इनके अलावा बाणासुर जो महादेव के आशीष से ही महाबली बनता है और फिर सबके लिए खतरा बन जाता है|

ऐसा लगता है कि असुर लोग पहले शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए ही तपस्या करते हैं और फिर उन देवों के लिए भी खतरा बन जाते हैं, जिनसे वे वरदान प्राप्त कराते हैं| कुछ ऋषी तो ऐसा लगता है कि हमेशा श्राप देने के लिए ही तैयार रहते हैं, लेकिन कहा जाता है कि उनके श्राप भी दुनिया के कल्याण के लिए ही होते हैं|
तुलसीदास जी ने महादेव और माता पार्वती के बारे में लिखा है-

भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ

वास्तव में माता भवानी के मन में अपार श्रद्धा है, लेकिन वैसा अडिग विश्वास नहीं है, जैसा महादेव के मन में है, शायद यही कारण है कि वे जब श्रीराम को सीता जी की खोज में वन में भटकते हुए देखते हैं, तब वे सीता माता का वेष बदलकर उनकी परीक्षा लेने चली जाती हैं| श्रीराम उनको तुरंत पहचान कर प्रणाम करते हैं और इसके बाद महादेव उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं, क्योंकि उन्होंने सीता का रूप धरा था, जिनको महादेव अपनी माता का दर्जा देते हैं|

ऐसे अनेक पौराणिक प्रसंग इस सीरियल में आते हैं, जिनको देखना और जानना सभी के लिए अच्छा होगा| जब यह सीरियल प्रसारित हुआ था तब शायद एक वर्ष से अधिक तक प्रसारित हुआ था, हमने इसको लॉक डाउन की अवधि में देखा है और आशा है कि जल्द ही इसे पूरा कर लेंगे|

एक त्रुटि मुझे इस सीरियल में, काल-क्रम की दृष्टि से लगी, शायद सीरियल निर्माताओं तक मेरी बात पहुँच पाए| सीरियल में यह दिखाया कि आदि शक्ति पहले जन्म में सती के रूप में श्रीराम जी की परीक्षा लेती हैं और बाद में पार्वती के रूप में पुनः महादेव से मिलती हैं| लेकिन फिर पार्वती के रूप में उनके अवतार के बाद ही श्रीराम का जन्म दिखाया गया है और वे सीता जी को विवाह के लिए आशीर्वाद भी देती हैं|

इस सीरियल में प्रसंग तो इतने हैं कि उनको लिखते ही जा सकते हैं, लेकिन मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि यह सीरियल देखने लायक है| एक बात और मेरी 6 वर्ष की पोती भी यह सीरियल नियमित रूप से देखती है और कभी-कभी ऐसी भाषा बोलती है- ‘आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा दायित्व है’|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

जगजीत सिंह जी की गाई, शायर ज़नाब शहीद कबीर जी की इस गज़ल के बहाने आज बात शुरू करेंगे-

 

 

ठुकराओ अब कि प्यार करो, मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

गिरने दो तुम मुझे, मेरा सागर संभाल लो,
इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

अब भी दिला रहा हूँ, यक़ीन-ए-वफा मगर,
मेरा न ऐतबार करो, मैं नशे में हूँ।

वैसे देखा जाए तो प्रेम करने के लिए होश में होना ज़रूरी नहीं है, इसलिए जो वफा का यक़ीन नशे में दिलाया जा रहा है, वह शायद ज्यादा कारगर हो, हाँ व्यापार करने के लिए होश में होना बहुत ज़रूरी है।

इसीलिए तो इस गज़ल में धर्म गुरुओं, उपदेशकों से यह भी कहा गया है-

मुझको कदम-कदम पे भटकने दो वाइज़ो
तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ।

एक और गज़ल में, यह भी कहा गया है-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,
इश्क़ कीजे, फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

और फिर इस दुनिया के नियमों के बारे में उस्ताद गुलाम अली जी ने क्या कहा है (मतलब गाया है)-

मयनोशी के आदाब से आगाह से, आगाह नहीं तू,
जिस तरह कहे साक़ी-ए-मैखाना पिए जा।

और फिर अकबर इलाहाबादी जी की, हंगामा बरपा वाली गज़ल में-

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से,
हर सांस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।

नातज़ुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं,
इस रंग को क्या जाने, पूछो जो कभी पी है।

आखिर में मुकेश जी की टिप्पणी-

है ज़रा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना
मैं नशे में हूँ।

वैसे नशे के बारे में ऐसी दलीलें देने के लिए तो शायद होश में रहना ज़रूरी है, और ये दलीलें कितनी लंबी चल सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है।

मैंने ऐसी कोई कसम भी तो नहीं खाई थी कि हमेशा होश की ही बात करुंगा।

नमस्कार।

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