कब हश्र मुअ’य्यन है !

कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना,
कब हश्र मुअ’य्यन है तुझको तो ख़बर होगी|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यारों की किस तरह बसर होगी!

वाइ’ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है,
अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब शाम-ए-नज़र होगी!

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना,
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब जान लहू होगी!

कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा,
किस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सुनते थे सहर होगी!

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सुब्ह किधर निकल गई!

आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र ‘फ़ैज़’ न जाने क्या हुए,
रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बात बदल बदल गई!

दिल से तो हर मोआ’मला करके चले थे साफ़ हम,
कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रात मचल मचल गई!

जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी,
जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई|

फ़ैज़ अहमद फ़ै

दिल था कि फिर बहल गया!

शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई,
दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इश्क़ को आज़मा के देख लिया!

‘फ़ैज़’ तकमील-ए-ग़म भी हो न सकी,
इश्क़ को आज़मा के देख लिया|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़