त्रिया–चरित्र हवाओं का!

मेरे अत्यंत प्रिय कवि और हमेशा बड़े भाई की तरह स्नेह से मिलने वाले, श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ|

किशन सरोज जी को सुनना एक अलग ही तरह का दिव्य अनुभव प्रदान करता था, प्रेम के प्रति पूर्णतः समर्पित और अनोखी अनुभूतियों से हमारा साक्षात्कार कराने वाले किशन जी एक महान व्यक्ति और रचनाकार थे|

लीजिए प्रस्तुत है किशन सरोज जी का लिखा यह अलग किस्म का गीत–


बिखरे रंग, तूलिकाओं से
बना न चित्र हवाओं का
इन्द्रधनुष तक उड़कर पहुंचा
सोंधा इत्र हवाओं का|

जितना पास रहा जो, उसको
उतना ही बिखराव मिला
चक्रवात-सा फिरा भटकता
बनकर मित्र हवाओं का|

कभी गर्म लू बनीं जेठ की
कभी श्रावनी पुरवाई
फूल देखते रहे ठगे-से
ढंग विचित्र हवाओं का|

परिक्रमा वेदी की करते
हल्दी लगे पांव कांपे
जल भर आया कहीं दॄगों में
धुँआ पवित्र हवाओं का|


कभी प्यार से माथा चूमा
कभी रूठ कर दूर हटीं
भोला बादल समझ न पाया
त्रिया–चरित्र हवाओं का|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अपनी भाषा की रोशनी में चलता रहूँ – रमेश रंजक

आज मैं अपने प्रिय कवियों में से एक रहे स्व. रमेश रंजक जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। यह जानकर अच्छा लगता है कि रमेश रन्जक जी से कुछ बार बात करने का, उनके नवगीत सुनने का अवसर मिला और एक बार उन्होंने मेरा गीत सुनकर उसे नवगीत संकलन अंतराल-4 में प्रकाशित करने के लिए भेजा था।

रंजक जी ने कविता और नवगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी, उनकी यह रचना भी एक अच्छी बानगी है, उनकी रचना प्रतिभा और उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाने वाले। लीजिए प्रस्तुत है ये रचना-

 

 

 

जब मैं छोटा था
पिताजी कहते थे —
‘अंधेरे  में
रोशनी लेकर चला करो !’

 

जब मैं बड़ा हुआ
रीतिकालीन नायिकाओं को
आँचल की ओट में
दीप लिए चलते पढ़ा ।

 

जब कुछ और बड़ा हुआ
तो मैंने अपने भीतर
स्वयं एक
रोशनी को गढ़ा ।

 

अब, जब मैं
पचास का हो रहा हूँ
चाहता हूँ कि —
अपनी भाषा की रोशनी में
चलता रहूँ
और उस अन्धेरे को
दलता रहूँ
जो हमारे भीतर की रोशनी को
लगातार खाए जा रहा है ।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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