बौड़म जी की बस-यात्रा!

प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि अशोक चक्रधर जी एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी ने कुछ कविताओं में ‘बौड़म जी’ नामक एक कैरेक्टर के माध्यम से अपनी बात कही है| आज की इस कविता में बौड़म जी की बस यात्रा की बात कही गई है, जो बस यात्रा का अनुभव न होने के कारण धक्का खाते-खाते पीछे से आगे तक पहुँच जाते हैं और फिर अगले दरवाजे से बाहर निकल जाते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है अशोक चक्रधार जी की यह कविता –


बस में थी भीड़
और धक्के ही धक्के,
यात्री थे अनुभवी,
और पक्के ।

पर अपने बौड़म जी तो
अंग्रेज़ी में
सफ़र कर रहे थे,
धक्कों में विचर रहे थे ।
भीड़ कभी आगे ठेले,
कभी पीछे धकेले ।
इस रेलमपेल
और ठेलमठेल में,
आगे आ गए
धकापेल में ।

और जैसे ही स्टाप पर

उतरने लगे
कण्डक्टर बोला-
ओ मेरे सगे !
टिकिट तो ले जा !

बौड़म जी बोले-
चाट मत भेजा !
मैं बिना टिकिट के
भला हूँ,
सारे रास्ते तो
पैदल ही चला हूँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********