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कोयल से!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पुरानी पोस्ट|

आज मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता के कुछ भाग का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता का वह भाग प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

कोयल से


मेरे हृदय में पीड़ा होती है, और सुस्ती भरी सुन्नता दर्द पैदा करती है,
मेरी चेतना को लगता है, जैसे मैंने कोई विषैला पेय पी लिया हो,
अथवा कुछ नशीला पदार्थ नाली में उगल दिया हो,
एक मिनट बीता और याद्दाश्त भुला देने वाली पौराणिक ‘लीथी’ नदी डूब गई :

ऐसा इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हारी खुशी से बहुत जलन होती है,
बल्कि इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी खुशी में बहुत खुश हूँ,-
कि हल्के पंखों के साथ तुम हरे-भरे पेड़ों पर बसी आत्मा जैसी हो,
गीतों भरा परिवेश बनाती तुम
हरियाली और असंख्य छायाओं के बीच,
खुले कंठ से ग्रीष्म ऋतु के गीत, बहुत सहजता से गाती हो।


अरे वो, अंगूरी शराब जो लंबे समय तक
धरती के भीतर गहरी दबी रहकर ठंडी हुई थी,
उसमें से फूल-पौधों और हरियाली का स्वाद आता है,
यह नृत्य की थिरकन, जमीन से जुड़े गीत के स्वर
और धूप से भरे उल्लास का वातावरण बनाती है।

दक्षिण का उष्ण सत्व, जैसे किसी ने समुद्र तट की हवा बोतल में भर ली हो,
जिसमें ग्रीक पौराणिक फव्वारे का वास्तविक सुर्ख चमत्कारी जल हो।
ऐसी मदिरा जिसमें निरंतर बुलबुले उठ रहे हों,
और जिसको पियें तो होठों पर बैंगनी निशान बन जाएं।


मेरा मन होता है कि मैं इसे पीकर, दुनिया से गायब हो जाऊं
और तुम्हारे साथ घने जंगलों में खो जाऊं।
कहीं दूर जाकर गायब हो जाऊं, अंतरिक्ष में घुल जाऊं, पूरी तरह भूल जाऊं,
वह सारी परेशानियां, जिनको तुमने पत्तों के बीच रहकर जाना ही नहीं है।

थकान, ज्वर और तनाव,
यहाँ लोग बैठते हैं और एक दूसरे के दुख, उनकी कराह सुनते हैं
जहाँ पक्षाघात वृद्ध लोगों को पूरी तरह लाचार बना देता है
जहाँ युवा पीले पड़ते हैं, दुबले होते हैं और मर जाते हैं।
जहाँ सोचने का मतलब है उदासी से भर जाना,
जहाँ निराशा से बोझिल पलकों के साथ जीना पड़ता है;
जहाँ सौंदर्य की आंखों की चमक भी बनी नहीं रह पाती,
और ऐसा लगता है कि शायद बाद में कोई उन पर सम्मोहित नहीं होगा।


दूर! दूर! क्योंकि मैं उड़कर तुम्हारे पास आऊंगा,
बैकस (यूनानी सुरा देवता) और उसके मित्रों के साथ नहीं,
अपितु काव्य रचनाओं के अदृश्य पंखों पर सवार होकर,
यद्यपि मेरा मस्तिष्क मेरी गति को रोकता है, हतोत्साहित करता है:
पहले से ही तुम्हारे साथ! रात बहुत मृदुल है,
और रात की रानी की तरह चंद्रमा अपने सिंहासन पर विराजमान है,
चारों तरफ से सितारों के रूप में अपने चारणों से घिरा हुआ;
लेकिन कोई प्रकाश नहीं है
सिवाय उसके, जो स्वर्ग से हवा के साथ बहकर आ पाता है,
(पत्तियों से छनकर, घुमावदार रास्तों से)।




और अब अंग्रेजी कविता का वह अंश , जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

Ode to a Nightingale


My heart aches, and a drowsy numbness pains
My sense, as though of hemlock I had drunk,
Or emptied some dull opiate to the drains
One minute past, and Lethe-wards had sunk:
‘Tis not through envy of thy happy lot,
But being too happy in thy happiness, –
That thou, light-winged Dryad of the trees,
In some melodious plot
Of beechen green, and shadows numberless,
Singest of summer in full-throated ease.

O for a draught of vintage! that hath been
Cooled a long age in the deep-delved earth,
Tasting of Flora and the country-green,
Dance, and Provencal song, and sunburnt mirth.
O for a beaker full of the warm South,
Full of the true, the blushful Hippocrene,
With beaded bubbles winking at the brim
And purple-stained mouth;
That I might drink, and leave the world unseen,
And with thee fade away into the forest dim.

Fade far away, dissolve, and quite forget
What thou among the leaves hast never known,
The weariness, the fever, and the fret
Here, where men sit and hear each other groan;
Where palsy shakes a few, sad, last grey hairs,
Where youth grows pale, and spectre-thin, and dies;
Where but to think is to be full of sorrow
And leaden-eyed despairs;
Where Beauty cannot keep her lustrous eyes,
Or new Love pine at them beyond tomorrow.

Away! away! for I will fly to thee,
Not charioted by Bacchus and his pards,
But on the viewless wings of Poesy,
Though the dull brain perplexes and retards:
Already with thee! tender is the night,
And haply the Queen-Moon is on her throne,
Clustered around by all her starry Fays;
But here there is no light
Save what from heaven is with the breezes blown
Through verdurous glooms and winding mossy ways.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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चांदनी जगाती है!

हिन्दी साहित्य का एक जगमगाता सितारा थे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी| विख्यात साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ का सफल संपादन तो उन्होंने लंबे समय तक किया ही, उनका अमूल्य योगदान साहित्य की सभी विधाओं- कविता, कहानी, उपन्यास आदि में उल्लेखनीय है| मैंने पहले भी उनकी कुछ रचनाएं शेयर की हैं, आज एक और रचना शेयर कर रहा हूँ|

पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान के अलावा भारती जी को अनेक साहित्यिक पुरस्कार भी प्राप्त हुए थे| लीजिए आज धर्मवीर भारती जी की यह प्रसिद्ध रचना प्रस्तुत है-


आज-कल तमाम रात
चांदनी जगाती है|

मुँह पर दे-दे छींटे
अधखुले झरोखे से
अन्दर आ जाती है
दबे पाँव धोखे से

माथा छू
निंदिया उचटाती है
बाहर ले जाती है
घंटो बतियाती है|


ठंडी-ठंडी छत पर
लिपट-लिपट जाती है
विह्वल मदमाती है
बावरिया बिना बात?

आजकल तमाम रात
चाँदनी जगाती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कविता – पाबलो नेरुदा

आज फिर से, लंबे अंतराल के बाद, मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


पाब्लो नेरुदा

कविता

और ऐसा उस उम्र में हुआ…कविता चली आई
मुझे खोजते हुए। मैं नहीं जानता कहाँ से
आई थी वह, शीत की ठिठुरन से या किसी नदी से,
मुझे नहीं मालूम कैसे और कब,
नहीं, कोई आवाजें नहीं आई, न कोई
शब्द थे, न मौन,
परंतु एक मार्ग पर मुझे बुलाया गया,
रात्रि की शाखाओं से,
अचानक भीषण झंझावात के बीच,
अथवा अकेले वापस लौटते हुए,
वहाँ मैं उपस्थित था, बिना किसी चेहरे के
और उसने मुझे छुआ।

मैं समझ नहीं पाया कि क्या कहूं, मेरे मुंह में
किसी तरह
कोई नाम नहीं आ रहे थे,
मेरी आंखों के आगे अंधेरा था,
तभी अचानक मेरी आत्मा में कुछ हलचल हुई,
यह भय था अथवा पंख (कल्पना के), जिन्हे मैं भूल चुका था,
और मैंने अपना मार्ग बना लिया
अर्थ तलाशते हुए
उस अग्नि के
और मैंने लिखी पहली बेसुध सी पंक्ति,
बेसुध, सारतत्व रहित, शुद्ध
बकवास,
शुद्ध बुद्धिमत्ता
एक ऐसे व्यक्ति की, जो कुछ नहीं जानता,
और अचानक मैंने देखा
कि स्वर्ग के बंधन
शिथिल हुए
और खुल गए,
अनेक ग्रह,
लहराती हुई फसलें,
छाया छिदी हुई,
बिंधे हुए तीरों से, आग और फूलों से,
घुमावदार रात और ब्रह्मांड।

और मैं अत्यंत सूक्ष्म प्राणी,
जिसमें भरा था सुरूर, तारों से भरे-
शून्य के विस्तार का,
रहस्य के इस स्वरूप
की तरह,
मैंने महसूस किया कि
मैं भी हूँ,
विशुद्ध रूप से एक हिस्सा-
इस अनंत आकाश का,
मैं भी तारों के साथ-साथ
आकाश में उड़ने लगा,
आकाश के खुले विस्तार में मेरा हृदय,
पूरी तरह मुक्त हो गया।



और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Pablo Neruda
Poetry


And it was at that age…Poetry arrived
in search of me. I don’t know, I don’t know where
it came from, from winter or a river.
I don’t know how or when,
no, they were not voices, they were not
words, nor silence,
but from a street I was summoned,
from the branches of night,
abruptly from the others,
among violent fires
or returning alone,
there I was without a face
and it touched me.

I did not know what to say, my mouth
had no way
with names
my eyes were blind,
and something started in my soul,
fever or forgotten wings,
and I made my own way,
deciphering
that fire
and I wrote the first faint line,
faint, without substance, pure
nonsense,
pure wisdom
of someone who knows nothing,
and suddenly I saw
the heavens
unfastened
and open,
planets,
palpitating planations,
shadow perforated,
riddled
with arrows, fire and flowers,
the winding night, the universe.

And I, infinitesmal being,
drunk with the great starry
void,
likeness, image of
mystery,
I felt myself a pure part
of the abyss,
I wheeled with the stars,
my heart broke free on the open sky.

नमस्कार।
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ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

हरिवंश राय बच्चन जी हिन्दी की गीत परंपरा के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे| किसी समय कवि सम्मेलनों में उनके गीतों की धूम होती थी और लोग रात-रात भर जागकर उनके मधुर गीतों का आनंद लेते थे| उनकी प्रमुख विशेषता थी सरल भाषा में गहरी बात कहना|

लीजिए आज हरिवंश राय बच्चन जी के इस गीत का आनंद लीजिए-


सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरे हमसफ़र उदास न हो!



आज साहिर लुधियानवी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| साहिर जी ने भारतीय फिल्मों को बहुत सुंदर गीत दिए हैं और वे भारत के नामवर शायरों में शुमार होते थे और अपनी कला और स्वाभिमान के लिए जाने जाते थे|

लीजिए आज साहिर जी के इस गीत का आनंद लीजिए-


मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो
कठिन सही तेरी मन्जिल मगर उदास न हो

कदम कदम पे चट्टानें खडी़ रहें लेकिन
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…

हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है
हजारों चाँद सितारों का खून होता है
तब एक सुबह फ़िजाओं पे मुस्कुराती है
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते!

वसीम बरेलवी साहब आज के एक मशहूर शायर हैं जो अपने सहज भाव से कही गए, गहराई से भरे शेरों से जनता को बांध लेते हैं| मैंने भी अपने संस्थान के लिए किए गए आयोजनों में दो बार उनको आमंत्रित किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है, जनाब वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल–

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते,
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते|

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है,
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते|

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का,
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते|


ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना,
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते|

बिसात-ए-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता,
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते|

‘वसीम’ जहन बनाते हैं तो वही अख़बार,
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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Poetry

गीत भी कहीं न सो जाए!

आज मैं स्वर्गीय अज्ञेय जी द्वारा संपादित- काव्य संकलन- तारसप्तक में सम्मिलित प्रमुख कवि- स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| तारसप्तक हिन्दी कविता की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था|

लीजिए प्रस्तुत है गिरिजाकुमार माथुर जी का यह गीत –


इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

देखा तुमको मैंने कितने जन्मों के बाद
चम्पे की बदली सी धूप-छाँह आसपास
घूम-सी गई दुनिया यह भी न रहा याद
बह गया है वक़्त लिए मेरे सारे पलाश!


ले लो ये शब्द
गीत भी कहीं न सो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

उत्सव से तन पर सजा ललचाती मेहराबें
खींच लीं मिठास पर क्यों शीशे की दीवारें
टकराकर डूब गईं इच्छाओं की नावें
लौट-लौट आई हैं मेरी सब झनकारें|


नेह फूल नाजुक
न खिलना बन्द हो जाए
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

क्या कुछ कमी थी मेरे भरपूर दान में
या कुछ तुम्हारी नज़र चूकी पहचान में
या सब कुछ लीला थी तुम्हारे अनुमान में
या मैंने भूल की तुम्हारी मुस्कान में|


खोलो देह-बंध
मन समाधि-सिंधु हो जाए|
आने दो आंच
रोशनी न मंद हो जाए|

इतना मत दूर रहो
गंध कहीं खो जाए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें !

अभिव्यक्ति की- गीत, कविता, शायरी की दुनिया कितनी व्यापक है, ज़िंदगी के कितने रंग हम इसमें देख सकते हैं, यह वास्तव में अद्वितीय है| इसी क्रम में आज मैं राजेश रेड्डी जी की एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें,
मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें|

मेरे चहरे पे मुसलसल हैं निगाहें उसकी,
जाने किस शख़्स को वो ढूँढ रहा है मुझमें|

हँसना चाहूँ भी तो हँसने नहीं देता मुझको,
ऐसा लगता है कोई मुझसे ख़फ़ा है मुझमें|

मैं समुन्दर हूँ उदासी का अकेलेपन का,
ग़म का इक दरिया अभी आके मिला है मुझमें|


इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं,
अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें|

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ,
मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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प्रेम गीतिका

आज फिर से मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


पाब्लो नेरुदा

प्रेम गीतिका

मैं लालायित हूँ, तुम्हारे मुंह, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारे केशों के लिए,
शांत और अनबुझी प्यास के कारण बेचैन,
मैं गलियों में तुम्हें तलाशता फिरता हूँ,
रोटी से मुझे तृप्ति नहीं मिलती,
सवेरा मुझे अव्यवस्थित करता है, पूरा दिन
मैं तुम्हारे कदमों के द्रवमान तलाशता हूँ!


मैं भूखा हूँ तुम्हारी तरल हंसी के लिए,
तुम्हारे हाथ एक आदिम फसल का रंग लिए हुए,
तुम्हारे हाथों की उंगलियों में नाखूनों के पीले पत्थरों के लिए,
मैं तुम्हारी त्वचा को पूरे बादाम की तरह चबा जाना चाहता हूँ।

मैं तुम्हारे कमनीय शरीर में दमकती सूर्य की किरण पचा जाना चाहता हूँ,
तुम्हारे अभिमानी चेहरे पर स्थापित प्रभुतापूर्ण नासिका,
मैं तुम्हारी चितवन के इन प्रहारों की तैरती छायाओं से
अपनी क्षुधा मिटाना चाहता हूँ,


और मैं इधर-उधर भटकता हूँ, धुंधलके में सूंघते हुए,
तुम्हारी तलाश में, तुम्हारे हृदय को खोजने के लिए,
जैसे जंगली बिल्ला (प्यूमा) घूमता है, क्विट्रेटू के रेगिस्तानों में!



और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Pablo Neruda

Love Sonnet

I crave your mouth, your voice, your hair.
Silent and starving, I prowl through the streets.
Bread does not nourish me, dawn disrupts me, all day
I hunt for the liquid measure of your steps.

I hunger for your sleek laugh,
your hands the color of a savage harvest,
hunger for the pale stones of your fingernails,
I want to eat your skin like a whole almond.


I want to eat the sunbeam flaring in your lovely body,
the sovereign nose of your arrogant face,
I want to eat the fleeting shade of your lashes,

and I pace around hungry, sniffing the twilight,
hunting for you, for your hot heart,
like a puma in the barrens of Quitratue.


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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दूसरा बनवास !

कैफ़ी आज़मी साहब हमारे देश के ऐसे मशहूर शायरों में शामिल थे, जिनका नाम शायरी की दुनिया में बहुत आदर के साथ लिया जाता है| आज उनकी जो नज़्म मैं शेयर कर रहा हूँ उसमें उन्होंने बताया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी यदि बाबरी मस्जिद का गिराया जाना देखते तो उनको कैसा महसूस होता|


लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह भावपूर्ण नज़्म-


राम बन-बास से जब लौट के घर में आए,
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए|

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छः दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए|

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ
प्यार की कहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ,
मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए|


धर्म क्या उनका था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए|

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर
तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए|


पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे,

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे
छः दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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