देखेगा कौन?

हिन्दी नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी, हिन्दी गीत साहित्य में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किए जाएंगे|

आज मैं स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं-


बगिया में नाचेगा मोर,
देखेगा कौन?
तुम बिन ओ मेरे चितचोर,
देखेगा कौन?

नदिया का यह नीला जल, रेतीला घाट,
झाऊ की झुरमुट के बीच, यह सूनी बाट,
रह-रह कर उठती हिलकोर,
देखेगा कौन?

आँखड़ियों से झरते लोर,
देखेगा कौन?

बौने ढाकों का यह वन, लपटों के फूल,
पगडंडी के उठते पाँव, रोकते बबूल,
बौराये आमों की ओर,
देखेगा कौन?
पाथर-सा ले हिया कठोर,
देखेगा कौन?

नाचती हुई फुल-सुंघनी, बनतीतर शोख,
घास पर सोन-चिरैया, डाल पर महोख,
मैना की यह पतली ठोर,
देखेगा कौन?
कलंगी वाले ये कठफोर,
देखेगा कौन?

आसमान की ऐंठन-सी धुएँ की लकीर,
ओर-छोर नापती हुई, जलती शहतीर,
छू-छूकर सांझ और भोर,
देखेगा कौन?
दुखती यह देह पोर-पोर,
देखेगा कौन?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कारवाँ गुज़र गया!

आज बिना किसी भूमिका के, श्रेष्ठ कवि और गीतों के राजकुमार कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ| एक ऐसा गीत जो नीरज जी की पहचान बना और उनसे अक्सर कवि सम्मेलनों में यह गीत प्रस्तुत करने का अनुरोध किया जाता था|

इस गीत का कुछ अंश मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ, लीजिए आज प्रस्तुत है नीरज जी का यह पूरा गीत –

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई,

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा

थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे उठे कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,

हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे, नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।


माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन,

पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार| 

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भ्रमण पिपासा – गेराल्ड गॉल्ड



आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट|

भ्रमण, यायावरी और यदि धार्मिक उद्देश्य जोड़ दें तो यह पवित्र होकर तीर्थ यात्रा बन जाता है।
जी हाँ, आज गेराल्ड गॉल्ड की अंग्रेजी कविता ‘Wander thirst‘ याद आ रही है, जो मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रही है।

आज मैं यहाँ उसका यथासंभव हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करने का भी प्रयास कर रहा हूँ-

भ्रमण पिपासा


पूरब में जहाँ सूरज उगता है, उसके पार; और पश्चिम में समुद्र के भी पार
और पूरब और पश्चिम में मेरी भ्रमण पिपासा, नहीं रहने देगी मुझे चैन से,
ये मेरे भीतर पागलपन के झोंके की तरह मचलती है, उकसाती है मुझे- अलविदा कहने को,
क्योंकि मुझे बुलाते रहते हैं- समुद्र, गगन के सितारे और हाँ आकाश भी तो पुकारता है!

मुझे नहीं पता कि वह जो श्वेत मार्ग दिखता है, वह कहाँ है, और कहाँ हैं नीली पहाड़ियां,
परंतु सूर्य को मित्र बना सकता है मनुष्य, और सितारे को अपना मार्गदर्शक,
और जब एक बार पुकार सुनाई दे जाती है, तब यायावरी की कोई सीमा नहीं बांधी जा सकती,
क्योंकि नदियां बुलाती हैं, सड़कें बुलाती हैं, और हाँ पक्षी भी तो बुलाता है!

वहाँ, जहाँ लंबा क्षितिज पसरा है, और वहीं रहता है दिन-रात,
बूढ़े जलयान घर की ओर लौटते हैं, जबकि युवा जलयान और दूर बढ़ जाते हैं,
लौट सकता हूँ मैं , लेकिन मैं जाऊंगा अवश्य, और यदि लोग आपसे पूछें कि क्यों,
तो आप पूरा दोष डाल दें सितारों पर और सूरज पर,
और उस सुदूर श्वेत मार्ग पर, आसमान पर।


इस हिंदी अनुवाद के साथ ही मूल अंग्रेजी रचना भी प्रस्तुत है:-


Wander-thirst

Beyond the east the sunrise; Beyond the west the sea
And East and West the Wander-Thirst that will not let me be;
It works in me like madness to bid me say goodbye,
For the seas call, and the stars call, and oh! The call of the sky!
I know not where the white road runs, nor what the blue hills are,
But a man can have the sun for friend, and for his guide, a star;
And there’s no end to voyaging when once the voice is heard,
For the rivers call, and the road calls, and oh! The call of a bird!
Yonder the long horizon lies, and there by night and day
The old ships draw to home again, the young ships sail away
And come I may, but go I must, and if men ask you why,
You may put the blame on the stars and the sun,
And the white road and the sky.

– Gerald Gould

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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भाषा वंदना

आदरणीय सोम ठाकुर जी का बहुत प्रसिद्ध गीत है जो हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की वंदना का गीत है| हिन्दी की समृद्ध परंपरा और शक्ति का जो वर्णन इस गीत में बहुत सहज भाव से कर दिया गया है, उसका वर्णन करने में विद्वानों को काफी लंबा विवरण देना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह भाषा वंदना का अमर गीत –

करते है तन मन से वंदन जन -गण -मन की अभिलाषा का
अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधान अपनी भाषा का

यह अपनी शक्ति – सर्जना के
माथे की है चंदन रोली
माँ के आँचल की छाया में
हमने जो सीखी है बोली

यह अपनी बँधी हुई अंजूरी, यह अपने महके शब्द सुमन
यह पूजन अपनी संस्कृति का, यह अर्चन अपनी भाषा का

अपने रत्नाकर के रहते
किसकी धारा के बीच बहें
हम इतने निर्धन नहीं कि
वाणी से औरों के ऋणी रहें

इसमे प्रतिबिंबित है अतीत, आकर ले रहा वर्तमान
यह दर्शन अपनी संस्कृति का, यह दर्पण अपनी भाषा का

यह उँचाई है तुलसी की
यह सूर – सिंध की गहराई
टंकार चंदबरदाई की
यह विद्यापति की पुरवाई

जयशंकर का जयकार, निराला का यह अपराजय ओज
यह गर्जन अपनी संस्कृति का, यह गुंजन अपनी भाषा का|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कभी पहले जैसे, मिला न हो!

डॉक्टर बशीर बद्र, आज की उर्दू शायरी में एक जाना-पहचाना नाम है| उनको विशेष रूप से शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाना जाता है| अनेक शेर उनके लोगों के ज़ेहन में छाए रहते हैं, जैसे ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो’, ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो’, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुमको डर नहीं लगता, बस्तियां जलाने में‘ आदि |

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर बशीर बद्र की यह ग़ज़ल –


कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो,
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो|

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो|

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं,
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो|

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से,
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो|

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे,
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो|

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे,

मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ठंडा लोहा – धर्मवीर भारती

एक बार फिर से आज मैं स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| धर्मवीर भारती जी हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यास एवं कहानी लेखक, निबंध लेखक, कवि और गीतकार के अलावा धर्मयुग के जाने-माने संपादक थे| आज मैं भारती जी की एक प्रसिद्ध रचना ‘ठंडा लोहा’ शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है धर्मवीर भारती जी जी की यह कविता –

ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!
मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा!

मेरी स्वप्न भरी पलकों पर
मेरे गीत भरे होठों पर
मेरी दर्द भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब
एक पर्त ठंडे लोहे की
मैं जम कर लोहा बन जाऊँ –
हार मान लूँ –
यही शर्त ठंडे लोहे की


ओ मेरी आत्मा की संगिनी!
तुम्हें समर्पित मेरी सांस सांस थी, लेकिन
मेरी सासों में यम के तीखे नेजे सा
कौन अड़ा है?
ठंडा लोहा!
मेरे और तुम्हारे भोले निश्चल विश्वासों को
कुचलने कौन खड़ा है ?
ठंडा लोहा!

ओ मेरी आत्मा की संगिनी!
अगर जिंदगी की कारा में
कभी छटपटाकर मुझको आवाज़ लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे धीरे निगल चुका है
इस बस्ती में दीप जलाने वाला नहीं बचा है

सूरज और सितारे ठंडे
राहें सूनी
विवश हवाएं
शीश झुकाए खड़ी मौन हैं
बचा कौन है?
ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रुड्यार्ड किप्लिंग की कविता – ‘यदि’

आज पुरानी पोस्ट दोहरा रहा हूँ, लीजिए प्रस्तुत है मेरे द्वारा किए गए अनुवाद की यह पोस्ट|

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘If’ का भावानुवाद-

Senior Man Standing and Fishing in Park Pond



यदि


यदि आप शांत चित्त बने रहते हैं, जब आपके सभी साथी जीवन में हार रहे हों, और इसका दोष आपको दे रहे हों।
जब आपका आत्म-विश्वास बना रहता है, जबकि सभी आप पर संदेह कर रहे हों,
और आप उनके संदेह करने को भी गलत न मानते हों;
यदि आप प्रतीक्षा कर सकते हैं और ऐसा करने में आपका धैर्य समाप्त नहीं होता हैं,
अथवा, जब लोग आपके बारे में झूठ बोलते हैं, तब भी आप झूठ का सहारा नहीं लेते,
अथवा नफरत का सामना करने पर भी, आप नफरत को बढ़ावा नहीं देते,
और फिर भी स्वयं को बहुत अच्छा नहीं मानते और न ही बहुत बुद्धिमान प्रदर्शित करते हैं;


यदि आप स्वप्न देख सकते हैं- -और स्वप्नों को अपना स्वामी नहीं बनने देते,
यदि आप सोच सकते हैं- -परंतु चिंतन को ही अपना लक्ष्य नहीं बना लेते,
यदि आप विजय और विपत्ति दोनो का सामना करते हैं
और इन दोनो बहुरूपियों को समभाव से देखते हैं, .
यदि आप उस सच को सुनने का साहस रखते हैं, जो आपने बोला है-
और धूर्त लोगों ने मूर्ख लोगों को फंसाने के लिए उसको अलग रूप में प्रस्तुत किया गया है,
और जिन चीजों को पाने के लिए आपने अपना जीवन लगाया है, उनको टूटता देख सकते हैं,
और घिसे-पिटे औजारों से उनको दुबारा तैयार कर सकते हैं।


यदि आप अपनी जीती हुई वस्तुओं का एक ढेर लगा सकते हैं
और पलक झपकते ही इनको खो देने का जोखिम उठाने को तैयार हैं,
और उनको खो देने, और उसके बाद शुरू से पुनः प्रारंभ करने को तैयार हैं, ,
और कभी अपनी उस हानि को लेकर आह न भरने को तैयार हैं;
यदि आप अपने हृदय, मस्तिष्क और मांसपेशियों को इसके लिए तैयार रखते हैं
कि वे इन सबके चले जाने के बाद, पुनः आपका अनुकूल समय आने तक साथ दें,
और उस समय धैर्य बनाए रखें, जब आपके पास कुछ न हो,
सिवाय उस दृढ़ इच्छा के, जो उनसे कहे कि ‘धैर्य बनाए रखो!’

यदि आप लोगों की भीड़ से बात करते हो और अपने सद्गुण बनाए रखते हो,
अथवा शासकों के साथ रहते हो- -और तब भी अपनी सादगी बचाए रखते हो,
यदि न तो शत्रु और न प्रेम करने वाले मित्र, आपको कष्ट दे सकते हैं,
यदि सभी लोग आपके लिए समान हैं, लेकिन कोई भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है:
यदि आप किसी भी अक्षमाशील मिनट में
साठ सेकंड तक दौड़ने दूरी को भर सकते हैं,
तो यह पूरी धरा आपकी है, और यहाँ मौज़ूद सभी कुछ आपका है,
और- -ज्यादा बड़ी बात यह है कि- -तब आप एक मनुष्य हो, मेरे पुत्र!




-रुड्यार्ड किप्लिंग



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



If


If you can keep your head, when all about you Are losing theirs and blaming it on you;
If you can trust yourself when all men doubt you,
But make allowance for their doubting too:
If you can wait and not be tired by waiting,
Or, being lied about, don’t deal in lies,
Or being hated don’t give way to hating,
And yet don’t look too good, nor talk too wise;


If you can dream- -and not make dreams your master;
If you can think- -and not make thoughts your aim,
If you can meet with Triumph and Disaster
And treat those two impostors just the same:.
If you can bear to hear the truth you’ve spoken
Twisted by knaves to make a trap for fools,
Or watch the things you gave your life to, broken,
And stoop and build’em up with worn-out tools;


If you can make one heap of all your winnings
And risk it on one turn of pitch-and-toss,
And lose, and start again at your beginnings,
And never breathe a word about your loss:
If you can force your heart and nerve and sinew
To serve your turn long after they are gone,
And so hold on when there is nothing in you
Except the Will which says to them: ‘Hold on! ‘


If you can talk with crowds and keep your virtue,
Or walk with Kings- -nor lose the common touch,
If neither foes nor loving friends can hurt you,
If all men count with you, but none too much:
If you can fill the unforgiving minute
With sixty seconds’ worth of distance run,
Yours is the Earth and everything that’s in it,
And- -which is more- -you’ll be a Man, my son!


-Rudyard Kipling



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना!

Close-Up Photography of Pink Flowers



स्वर्गीय भारत भूषण जी एक असाधारण प्रतिभा वाले कवि और गीतकार थे| भारत भूषण जी के गीतों को सुनना ही एक दिव्य अनुभव होता था| भारत भूषण जी के अनेक गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ ‘बनफूल’ यह भी भारत भूषण जी का एक प्रसिद्ध गीत है|

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें जीवन में कुछ भी मनचाहा नहीं मिलता, इसका उदाहरण भारत भूषण जी ने ‘बनफूल’ के माध्यम से दिया है| इस गीत में बनफूल अपनी व्यथा सुनाते हुए यह भी कहता है कि मालिन, जो किसी भी दृष्टि से सुंदर नहीं है, लेकिन वह भी चुनने के लिए बनफूल की तरफ निगाह नहीं डालती, और वह जीवन भर उपेक्षित ही रहता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह लाजवाब गीत ‘बनफूल’-


मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना,
मैं भी उनमें जिनका जग में, जैसा आना वैसा जाना|

सिर पर अंबर की छत नीली, जिसकी सीमा का अंत नहीं
मैं जहाँ उगा हूँ वहाँ कभी भूले से खिला वसंत नहीं,
ऐसा लगता है जैसे मैं ही बस एक अकेला आया हूँ
मेरी कोई कामिनी नहीं, मेरा कोई भी कंत नहीं,
बस आसपास की गर्म धूल उड़ मुझे गोद में लेती है
है घेर रहा मुझको केवल सुनसान भयावह वीराना|

सूरज आया कुछ जला गया, चंदा आया कुछ रुला गया
आंधी का झोंका मरने की सीमा तक झूला झुला गया,
छह ऋतुओं में कोई भी तो मेरी न कभी होकर आई
जब रात हुई सो गया यहीं, जब भोर हुई कुलमुला गया,
मोती लेने वाले सब हैं, ऑंसू का गाहक नहीं मिला
जिनका कोई भी नहीं उन्हें सीखा न किसी ने अपनाना|


सुनता हूँ दूर कहीं मन्दिर, हैं पत्थर के भगवान जहाँ
सब फूल गर्व अनुभव करते, बन एक रात मेहमान वहाँ,
मेरा भी मन अकुलाता है, उस मन्दिर का आंगन देखूँ
बिन मांगे जिसकी धूल परस मिल जाते हैं वरदान जहाँ,
लेकिन जाऊँ भी तो कैसे, कितनी मेरी मजबूरी है
उड़ने को पंख नहीं मेरे, सारा पथ दुर्गम अनजाना|

काली रूखी गदबदा बदन, कांसे की पायल झमकाती
सिर पर फूलों की डलिया ले, हर रोज़ सुबह मालिन आती,
ले गई हज़ारों हार निठुर, पर मुझको अब तक नहीं छुआ
मेरी दो पंखुरियों से ही, क्या डलिया भारी हो जाती,
मैं मन को समझाता कहकर, कल को ज़रूर ले जाएगी
कोई पूरबला पाप उगा, शायद यूँ ही हो कुम्हलाना|


उस रोज़ इधर दुल्हा-दुल्हन को लिए पालकी आई थी
अनगिनती कलियों-फूलों से, ज्यों अच्छी तरह सजाई थी,
मैं रहा सोचता गुमसुम ही, ये भी हैं फूल और मैं भी
सच कहता हूँ उस रात, सिसकियों में ही भोर जगाई थी,
तन कहता मैं दुनिया में हूँ, मन को होता विश्वास नहीं
इसमें मेरा अपराध नहीं, यदि मैं भी चाहूँ मुसकाना|

पूजा में चढ़ना होता तो, उगता माली की क्यारी में
सुख सेज भाग्य में होती तो, खिलता तेरी फुलवारी में,
ऐसे कुछ पुण्य नहीं मेरे, जो हाथ बढ़ा दे ख़ुद कोई
ऐसे भी हैं जिनको जीना ही पड़ता है लाचारी में,
कुछ घड़ियाँ और बितानी हैं, इस कठिन उपेक्षा में मुझको
मैं खिला पता किसको होगा, झर जाऊंगा बे-पहचाना|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला!

एक जमाने में कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी को आज याद करते हैं उनकी सबसे अधिक प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ के कुछ छंदों के माध्यम से, यह रचना उन्होंने उम्र खैयाम की रूबाइयों के आधार पर लिखी थी| यह रचना अपने आप में ही इतनी मोहक है और एक प्रकार का दर्शन भी प्रस्तुत करती है| एक ऐसे कवि द्वारा शराब पर लिखी गई रचना जो स्वयं कभी शराब नहीं पीता था|

इस काव्य का कुछ प्रारंभिक अंश मैं पहले शेयर कर चुका हूँ, आज उसके कुछ बाद का अंश|

लीजिए प्रस्तुत हैं इस प्रसिद्ध रचना का कुछ अंश-


बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
‘होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले’
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।16।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।17।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।18।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला’
‘और लिये जा, और पिये जा’, इसी मंत्र का जाप करे’
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।19।


बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।20।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कोई शहर से आया होगा!

आज विख्यात अभिनेत्री शबाना आज़मी के पिता और हमारे देश के जाने माने शायर ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूं| कैफ़ी आज़मी साहब को एक विद्रोही शायर के रूप में भी जाना जाता है| एक अनोखा ही अंदाज़ था उनका बात कहने का, जैसे ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो‘|

लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल :



शोर यूँ ही न परिंदों ने मचाया होगा
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा|

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा|

बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं
किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा|

बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा|

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे
हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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