फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा!

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी प्रीत हमारी हो,
फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो|

इब्ने इंशा

कोई इन्तहा ही नहीं!

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’