हमको आते हैं समझाने लोग!

यादों से बचना मुश्किल है उनको कैसे समझाएँ,
हिज्र के इस सहरा तक हमको आते हैं समझाने लोग|

राही मासूम रज़ा

इस आँच में तपना नहीं आता!

दिल को सर-ए-उल्फ़त भी है रुसवाई का डर भी,
उसको अभी इस आँच में तपना नहीं आता|

आनंद नारायण मुल्ला

चिरागों को हवाओं से बचाया जाए!

जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं,
उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए|

निदा फ़ाज़ली

तेरा नाम न पढ़ ले कोई!

काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में,
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई|

परवीन शाकिर

कल कोई त्योहार होगा!

ये सारे शहर में दहशत-सी क्यों हैं,
यक़ीनन कल कोई त्योहार होगा|

राजेश रेड्डी

फ़ना होने से डरता है!

यहाँ हर शख़्स हर पल हादिसा होने से डरता है,
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है|

राजेश रेड्डी

ख़ौफ़ के मारे न देख!

अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

दुष्यंत कुमार

शराफ़तों की यहाँ कोई –

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं,
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है।

वसीम बरेलवी

मैं अपने साये से–

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो,
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो|

शहरयार