आँधियों का डर न फेंक

जो धरा से कर रही हैं कम गगन का फासला,
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक|

कुंवर बेचैन

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है!

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जाना|

अहमद फ़राज़

पिघल न जाए कहीं !

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं

दुष्यंत कुमार

नज़ारा बदल न जाए कहीं!

नजर-नवाज़ नजारा बदल न जाए कहीं
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं|

दुषयांत कुमार

जी यहां घबराता है!

आज सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी अपने समय के प्रमुख साहित्यिक कवियों में शामिल थे और उस समय की प्रमुख साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल में शामिल थे|

बाकी तो कविता खुद अपनी बात कहती है, लीजिए प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की यह कविता


अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है|

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है|

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त,
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है|

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा,
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है|

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है|


हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है|

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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जब मुझे भय सताता है!


आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट
आज से भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-





जॉन कीट्स

जब मुझे भय सताता है!


जब मुझे ऐसे भय सताते हैं, कि शायद मेरा जीवन ही समाप्त हो जाए
इससे पहले कि मेरी कलम, मेरे मन में कुलबुलाती रचनाओं को कागज़ पर उतार पाए,
इससे पहले कि मेरी रचनाओं से भरी पुस्तकें, ऐसे जमा हो जाएं,
जैसे अनाज भंडार में तैयार अनाज भरा होता है;
जब मैं रात के सितारों से भरे चेहरे पर,
अत्यधिक रोमांस के विशाल बादलों से भरे चिह्न देखूं,
और यह सोचूं, कि शायद अवसर के जादुई प्रभाव की बदौलत
इनकी छायाओं तक पहुंचने के लिए मैं जीवित न रहूं;
और जब मुझे ऐसा लगता है कि, घंटे भर के जीवन वाला सुघड़ जीव,
शायद मैं तुम्हे अधिक समय तक नहीं देख पाऊंगा,
परीलोक जैसी शक्तियों में कभी आनंद नहीं आता
तुच्छ किस्म के प्रेम जैसा; – और तब किनारे पर
विशाल विश्व के तट पर मैं अकेला खड़ा हूँ, और सोचता हूँ,
जब तक कि प्रेम और प्रसिद्धि, शून्य में विलीन नहीं हो जाते।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

When I Have Fears



When I have fears that I may cease to be
Before my pen has glean’d my teeming brain,
Before high-piled books, in charactery,
Hold like rich garners the full ripen’d grain;
When I behold, upon the night’s starr’d face,
Huge cloudy symbols of a high romance,
And think that I may never live to trace
Their shadows, with the magic hand of chance;
And when I feel, fair creature of an hour,
That I shall never look upon thee more,
Never have relish in the faery power
Of unreflecting love; – then on the shore
Of the wide world I stand alone, and think
Till love and fame to nothingness do sink.

नमस्कार।

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