अहसास कहीं कुछ कम है!

ज़िंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है,
हर घड़ी होता है अहसास कहीं कुछ कम है|

शहरयार

उलझा हुआ सा कुछ!

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ,
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ|

निदा फ़ाज़ली

नज़र आना ज़रूरी है!

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का,
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है|

वसीम बरेलवी

कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे!

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे।

क़तील शिफाई

जाने कौन आस-पास होता है!

आज गुलज़ार साहब का एक गीत शेयर करने का मन हो रहा है। इस गीत को फिल्म – सीमा के लिए रफी साहब ने शंकर जयकिशन जी के संगीत निर्देशन में गाया है । गुलज़ार साहब तो भाषा में प्रयोग करने के लिए प्रसिद्ध हैं और हमारी फिल्मों को अनेक खूबसूरत गीत उन्होंने दिए हैं।

लीजिए प्रस्तुत है गुलज़ार साहब का यह खूबसूरत गीत-

 

 

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है।

 

होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो,
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो।

 

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए,
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए।

 

कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है,
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है।

 

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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