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आग अब भी कहीं दबी-सी है!

आज बिना किसी भूमिका के जावेद अख्तर साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और फिर कविता अपनी बात स्वयं कहती है|

लीजिए प्रस्तुत है जावेद अख्तर साहब की यह ग़ज़ल-

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,
हँसती आँखों में भी नमी-सी है|

दिन भी चुपचाप सर झुकाये था,
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है|

किसको समझायें किसकी बात नहीं,
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है|


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई,
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है|

कह गए हम ये किससे दिल की बात,
शहर में एक सनसनी-सी है|

हसरतें राख हो गईं लेकिन,
आग अब भी कहीं दबी-सी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चोट और टूटना दिल का!

जोश मलीहाबादी जी का प्रसिद्ध शेर है, जिसे गुलाम अली साहब ने एक ग़ज़ल के शुरू में गाया है-

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया|

वास्तव में जब सर्दी पड़ती है तब पुरानी चोटें भी कसकती हैं| हम अक्सर देखते हैं कि हमारे खिलाड़ियों को चोट लग जाती है और वे कुछ मैच नहीं खेल पाते| कभी-कभी तो कोई चोट किसी के खेल जीवन पर पूर्ण विराम भी लगा देती है|


जीवन को भी तो एक खेल ही कहा जाता है और इस खेल में भी चोट लगना स्वाभाविक ही है| हाँ जीवन के इस खेल में चोटें शरीर के मुक़ाबले मन पर या कहें कि ‘दिल’ पर अधिक लगती हैं|

फिर ग़ुलाम अली जी की गायी हुई एक ग़ज़ल के शेर याद आ रहे हैं, यह ग़ज़ल मसरूर अनवर जी की लिखी हुई है-


नफ़रतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में,
हमने किस-किसको पुकारा, ये कहानी फिर सही|

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने,
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही|

एक अक्सर सुना हुआ शेर याद आ रहा है-


इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं, किस क़दर चोट खाए हुए हैं,
मौत ने हमको बख्शा है लेकिन, ज़िंदगी के सताए हुए हैं|


और मेरे प्यारे मुकेश जी के गाये हुए गीत तो कई याद आते हैं-


मेरे टूटे हुए दिल से, कोई तो आज ये पूछे
कि तेरा हाल क्या है|

अथवा-

वो तेरे प्यार का ग़म, इक बहाना था सनम,
अपनी क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी
की दिल टूट गया
|

वैसे चोट लगने, और कुछ टूटने (वैसे यहाँ ज़िक्र दिल का है) के बीच काफी फासला हो सकता है, कभी तो इंसान पूरी उम्र चोट खाते-खाते, शेरशाह सूरी बना रह सकता है और कभी पहली चोट में भी धराशायी भी हो सकता है|
अब चोट ही है जो जब दिखाई देती है तो ज़ख्म कहलाती है, एक फिल्मी गीत की पंक्ति याद आ रही है-

इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह,
अबरू की कटारी को दो, आब और जियादा|

ये बात तो चलती ही जा सकती है, अंत में फिर से मुकेश जी के गाये गीत की पंक्तियों के साथ आज की बात समाप्त करूंगा, वैसे मूड बना तो बाद में भी इसी विषय पर बात कर सकता हूँ| तो अंत में प्रस्तुत हैं-

तीर आँखों के जिगर के पार कर दो यार तुम,
जान मांगो या तो जां को निसार कर दो यार तुम|

हम तुम्हारे सामने हैं, फिर तुम्हें डर काहे का,
शौक से अपनी नज़र के वार कर दो यार तुम
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अक्सर एक व्यथा यात्रा बन जाती है!

ब्लॉग लेखन हो या जो भी गतिविधि हो, अक्सर हम वह चीज़ें, वे रचनाएँ अधिक शेयर करते हैं, जो ‘हमारे समय’ की होती हैं| जैसे फिल्मों की बात होती है तो मुझे वो ज़माना अधिक याद आता है जिसमें दिलीप कुमार जी, देव आनंद और मेरे प्रिय राज कपूर जी थे, गायकों में मुकेश जी, रफी साहब और किशोर कुमार आदि-आदि होते थे, गायिकाओं में तो लता जी और आशा जी थी हीं|

कविता के मामले में तो वह कवि सम्मेलनों का ज़माना याद आता है, जब दिल्ली में प्रतिवर्ष दो बार लाल किले पर विराट कवि सम्मेलन होते थे, राष्ट्रीय पर्वों- स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस के अवसर पर| अधिकांश कवि जिनकी रचनाएँ मैं शेयर करता हूँ, वे कवि सम्मेलनों के माध्यम से लोकप्रिय हुए थे|

लेकिन कुछ कवि मंच पर कम ही आते थे और अपनी रचनाएँ पढ़े जाने से लोगों तक पहुँचते थे| आज के कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी भी ऐसे ही थे| लीजिए प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की एक कविता-



अक्सर एक गन्ध
मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीं पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है ।


अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटर का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है ।


अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एहसास का मारा दिल ही तो है!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

कल एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर की थी| एक ही विषय पर लिखी ब्लॉग पोस्ट्स में से वह दूसरी थी| सोचता हूँ कि इस विषय पर साथ की अन्य पोस्ट भी शेयर कर लूँ| आज प्रस्तुत है उससे पहले लिखी गई पोस्ट|



अगर यह पूछा जाए कि रसोई में कौन सी वस्तु, कौन सा पदार्थ सबसे महत्वपूर्ण है तो पाक कला में निपुण कोई व्यक्ति, अब महिला कहने से बच रहा हूँ, क्योंकि बड़े‌-बड़े ‘शेफ’ आज की तारीख में पुरुष हैं, हाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति बता देगा कि यह वस्तु सबसे ज्यादा उपयोग में आती है अथवा यह वस्तु सर्वाधिक गुणकारी है।

अब यही सवाल अगर कविता, शायरी, विशेष रूप से फिल्मी गीतों के बारे में पूछा जाए, तो मुझे लगता है कि जो शब्द प्रतियोगिता में सबसे आगे आएंगे, उनमें से एक प्रमुख शब्द है-‘दिल’।

मुकेश जी के एक गीत के बोल याद आ रहे हैं-

दिल से तुझको बेदिली है, मुझको है दिल का गुरूर,
तू ये माने के न माने, लोग मानेंगे ज़ुरूर
!

आगे बढ़ने से पहले, दो शेर याद आ रहे हैं जो गुलाम अली जी ने एक गज़ल के प्रारंभ में गाए हैं-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।
इसका रोना नहीं, क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।


कुछ बार ऐसे लोगों की बात होती है, जो चावल के एक दाने पर काफी बड़ा आलेख, श्लोक, यहाँ तक कि पूरी गीता भी लिख देते हैं। उन चमत्कारों का तो पता नहीं, परंतु ‘दिल’, जिसको शरीर विज्ञानी, आकार-प्रकार के लिहाज़ से पता नहीं कितना छोटा या बड़ा मानते हैं, परंतु उस पर कितना कुछ अंकित हो पाता है, उसकी कोई सीमा नहीं है।

फिल्म ‘दिल ही तो है’ में मुकेश जी ने, साहिर लुधियानवी जी के लिखे दो गीत गाए हैं, जिनका मुखड़ा लगभग एक ही जैसा है, एक उल्लास से भरा है और दूसरा उदासी से, मन हो रहा है दोनों को पूरा ही शेयर करने का-

दिल जो भी कहेगा मानेंगे,
दुनिया में हमारा दिल ही तो है।

हार मानी नहीं ज़िंदगी से,
हंस के मिलते रहे हर किसी से,
क्यों न इस दिल पे क़ुर्बान जाएं,
सह लिए कितने गम किस खुशी से,
सुख में जो न खेले हम ही तो हैं,
दुख से जो न हारा दिल ही तो है।।


कोई साथी न कोई सहारा,

कोई मंज़िल न कोई किनारा,
रुक गए हम जहाँ दिल ने रोका,
चल दिए जिस तरफ दिल पुकारा।
हम प्यार के प्यासे लोगों की,
मंज़िल का इशारा दिल ही तो है॥

अपनी जिंदादिली के सहारे,
हमने दिन ज़िंदगी के गुज़ारे,
वर्ना इस बेमुरव्वत जहाँ में,
और कब्ज़े में क्या था हमारे,
हर चीज है दौलत वालों की,
मुफलिस का बेचारा दिल ही तो है॥


अब दूसरा गीत-

भूले से मुहब्बत कर बैठा,
नादां था बिचारा दिल ही तो है।
हर दिल से खता हो जाती है,
बिगड़ो न खुदारा दिल ही तो है।

इस तरह निगाहें मत फेरो,
ऐसा न हो धड़कन रुक जाए,
सीने में कोई पत्थर तो नहीं,
एहसास का मारा दिल ही तो है।

बेदादगरों की ठोकर से,
सब ख्वाब सुहाने चूर हुए,
अब दिल का सहारा गम ही तो है,
अब गम का सहारा दिल ही तो है।


जब इतना अधिक स्थान ‘दिल’ ने कविता-शायरी में घेरा है, एक ब्लॉग में तो इसका समाना मुश्किल है। ‘मेरा नाम जोकर’ में नायक इस बात पर खुश होता है कि उसके दिल में पूरी दुनिया समा जाएगी और फिर उसका दिल टूटकर बिखर जाता है।

बहुत सारी बातें याद आ रही हैं, दिल को लेकर, कुछ बातें आगे भी तो करेंगे!

नमस्कार
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कच्चे रंगों से तसवीर बना डाली!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी के हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं| वे बच्चों की पत्रिका पराग के संपादक भी रहे थे और अपने साहित्य सृजन के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए|

आज मैं नंदन जी की यह रचना शेयर कर रहा हूँ-


रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
गर अंगारे
याचक बन पाँखुरियाँ माँग गए

कच्चे रंगों से
तसवीर बना डाली,
हल्की बौछार पड़ी
रंग हुए खाली।
कितनी है दूरी,
पर, जाने क्या मजबूरी
कि
टीस के सफ़र की

कई सीढ़ियाँ,
फलाँग गए।

खंड-खंड अपनापन
टुकड़ों में
जीना।

फटे हुए कुर्ते-सा
रोज़-रोज़ सीना।
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टाँग गए!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल है-


तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे।

यह गज़ल पहले भी शायद मैंने शेयर की है, आज इस गज़ल का एक शेर खास तौर पर याद आ रहा था-


बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढकर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।


ऐसे ही खयाल आया कि आखिर कैसे हो जाते हैं, या हो गए हैं हम चार किताबें पढ़ने के बाद, पढ़-लिख लेने के बाद!


इस पर धर्मवीर भारती जी के गीत की पंक्तियां याद आती हैं-


सूनी सड़कों पर ये आवारा पांव,

माथे पर टूटे नक्षत्रों की छांव,
कब तक, आखिर कब तक!
चिंतित पेशानी पर अस्त-व्यस्त बाल,
पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण भूचाल,
कब तक आखिर कब तक!


और फिर लगे हाथ भारत भूषण जी के गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, जो शायद पहले भी शेयर की होंगी, लेकिन फिर उनको शेयर करने का मन हो रहा है-


चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा,
क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई।


कंधे पर चढ़ अगली पीढ़ी, ज़िद करती है गुब्बारों की,
यत्नों से कई गुना ऊंची, डाली है लाल अनारों की,
हर भोर किरन पल भर बहला, काले कंबल में सुला गई।


लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना-पत्र लिखते बीती,
जर्जर उदासियों के कपड़े, थक गई हंसी सींती-सींती,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई।


गीतों की जन्म-कुंडली में, संभावित थी यह अनहोनी,
मोमिया मूर्ति को पैदल ही, मरुथल की दोपहरी ढोनी,
खंडित भी जाना पड़ा वहाँ, ज़िंदगी जहाँ भी बुला गई!


बड़ा होने के बाद क्या-क्या झेलना पड़ता है इंसान को, और बच्चा कहता है मुझे तो ये चाहिए बस! और परिस्थिति जो भी हो, उसको वह वस्तु अक्सर मिल जाती है!


ये भी कहा जाता है कि जो आप पूरे मन से चाहोगे, वह आपको मिल जाएगा। उस परम पिता परमात्मा के सामने हम भी तो बच्चे ही हैं, और हाँ हमारा वह परम पिता, हमारी तरह मज़बूर भी नहीं है, अगर हमको पूरे मन से ऐसा मानना मंज़ूर हो!


खैर ज्यादा बड़ी बातें नहीं करूंगा, अंत में रमेश रंजक जी की ये पंक्तियां-


फैली है दूर तक परेशानी,
तिनके सा तिरता हूँ तो क्या है,
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!


मैं दूंगा भाग्य की लकीरों को,
रोशनी सवेरे की,
देखूंगा कितने दिन चलती है,
दुश्मनी अंधेरे की,


मकड़ी के जाले सी पेशानी,
साथ लिए फिरता हूँ तो क्या है,
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं!


आखिर में यही दुआ है कि उम्र बढ़ते जाने के बावज़ूद, हमारे भीतर एक बच्चे जैसी आस्था, विश्वास और थोड़ी ज़िद भी बनी रहे!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है!

आज मैं प्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब असद भोपाली जी की एक खूबसूरत सी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी ग़ज़ल में कुछ असरदार शेरों के माध्यम से शायर ने मुहब्बत के जज़्बे और हौसले को अभिव्यक्त किया है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

न साथी है न मंज़िल का पता है,
मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है|

वफ़ा के नाम पर बर्बाद होकर,
वफ़ा के नाम से दिल काँपता है|

मैं अब तेरे सिवा किसको पुकारूँ,
मुक़द्दर सो गया ग़म जागता है|

वो सब कुछ जानकर अनजान क्यूँ हैं,
सुना है दिल को दिल पहचानता है|


ये आँसू ढूँढता है तेरा दामन,
मुसाफ़िर अपनी मंज़िल जानता है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की!

हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं- ज़नाब बशीर बद्र जी| वे शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| मुशायरों को लूटने वाले बशीर जी की गज़लें अक्सर लोग गुनगुनाते हैं|

उनका यह शेर –‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’, यह शेर एक मुहावरा बन गया है| एक और शेर मुझे अभी याद आ रहा है- ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो’|


बशीर जी की अनेक गज़लें बहुत लोकप्रिय हैं और अनेक गायकों ने उनको गाया है|
आज की यह ग़ज़ल भी बहुत खूबसूरत है, आइए आज इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं –

न जी भर के देखा न कुछ बात की,
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की|

उजालों की परियाँ नहाने लगीं,
नदी गुनगुनाई ख़यालात की|


मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,
ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की|


मुक़द्दर मेरी चश्म-ए-पुर-आब का,
बरसती हुई रात बरसात की|


कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तुम प्राणों की अगन हरो तो!

 

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक भावुकता और प्रेम से भरा गीत शेयर कर लूँ| भावुकता वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आती है, आजकल बहुत कम मिलते हैं इसको समझने वाले, परंतु कवि-गीतकारों के लिए तो यह बहुत बड़ी पूंजी होती है, अनेक गीत इसके कारण ही जन्म लेते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह खूबसूरत गीत-

 

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ,
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पड़े पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला,
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला|

 

जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी,
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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