Categories
Uncategorized

दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

Categories
Uncategorized

तुम प्राणों की अगन हरो तो!

 

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक भावुकता और प्रेम से भरा गीत शेयर कर लूँ| भावुकता वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आती है, आजकल बहुत कम मिलते हैं इसको समझने वाले, परंतु कवि-गीतकारों के लिए तो यह बहुत बड़ी पूंजी होती है, अनेक गीत इसके कारण ही जन्म लेते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह खूबसूरत गीत-

 

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ,
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पड़े पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला,
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला|

 

जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी,
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

सपने ताजमहल के हैं!

आज मैं हिन्दी बहुत प्यारे कवि/ गीतकार स्वर्गीय बाल स्वरूप राही जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| राही जी ने बहुत अच्छे गीत और गज़लें हमें दी हैं| आज की ये गजल भी आशा है आपको पसंद आएगी-

 

 

उनके वादे कल के हैं,
हम मेहमाँ दो पल के हैं ।

 

कहने को दो पलकें हैं,
कितने सागर छलके हैं ।

 

मदिरालय की मेज़ों पर,
सौदे गंगा जल के हैं ।

 

नई सुबह के क्या कहने,
ठेकेदार धुँधलके हैं ।

 

जो आधे में छूटी हम,
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं ।

 

बिछे पाँव में क़िस्मत है,
टुकड़े तो मखमल के हैं ।

 

रेत भरी है आँखों में,
सपने ताजमहल के हैं ।

 

क्या दिमाग़ का हाल कहें,
सब आसार खलल के हैं ।

 

सुने आपकी राही कौन,
आप भला किस दल के हैं ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता!

आज फिर से बारी है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की, लीजिए प्रस्तुत है-

एक बार और दिल की बात कर लेते हैं, ऐसे ही कुछ बातें और आ रही हैं दिमाग में, आप इसे दिल पर मत लेना।

कितनी तरह के दिल लिए घूमते हैं दुनिया में लोग, एक गीत में किसी ने बताया था- ‘कोई सोने के दिल वाला, कोई चांदी के दिल वाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल’।

 

 

वैसे हमारा दिल, हमें चैन से रखने के लिए क्या कुछ कोशिशें नहीं करता-

 

दिल ढूंढता है, फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए!

जिगर मुरादाबादी साहब का शेर है-

 

आदमी, आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है।

एक शेर बशीर बद्र साहब का याद आ रहा है-

 

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा,
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

एक और शेर किसी का याद आ रहा है-

 

एक इश्क़ का गम आफत, और उस पे ये दिल आफत,
या गम न दिया होता, या दिल न दिया होता।

एक शेर फैज़ अहमद फैज़ साहब का है-

 

कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएंगे, सुनते थे सहर होगी।

और बहादुर शाह ज़फर साहब का ये शेर तो बहुत प्रसिद्ध है-

 

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।

और अब दाग देहलवी साहब का एक शेर याद कर लेते हैं, क्योंकि वैसे तो यह अनंत कथा है-

 

तुम्हारा दिल, मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,
वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।

चलिए अब एक फिल्मी गीत का मुखड़ा और जोड़ देते हैं-

 

दिल लगाकर हम ये समझे, ज़िंदगी क्या चीज है,
इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज है।

ये विषय ऐसा ही कि जब बंद करने की सोचते हैं, तभी कुछ और याद आ जाता है। फिल्मी गीतों के दो मुखड़े और याद आ रहे हैं, उसके बाद बंद कर दूंगा, सच्ची!

 

ये दिल न होता बेचारा, कदम न होते आवारा
जो खूबसूरत कोई अपना हमसफर होता।

और दूसरा-

 

चल मेरे दिल, लहराके चल, मौसम भी है, वादा भी है,
उसकी गली का फासला, थोड़ा भी है, ज्यादा भी है,
चल मेरे दिल।

 

अब चलते रहिए।
नमस्कार।

==================

Categories
Uncategorized

समय की नंगी सलीबों पर, गले में अटकी हुईं फाँसें!

आज मैं हिन्दी कविता और नवगीत के यशस्वी हस्ताक्षर श्री ओम प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वैसे तो मनुष्य को जीवन में आशावादी होना चाहिए, लेकिन एक कवि अपने समय की सभी स्थितियों को अभिव्यक्त करता है, विसंगतियों को उजागर करता है| इन अभिव्यक्तियों का मूल उद्देश्य इंसानियत को जगाना ही होता है|

ओम प्रभाकर जी की इस रचना में भी आज के समय की विसंगतियों को बड़ी कुशलता से उजागर किया गया है| प्रस्तुत है यह रचना-

 

 

बीत गए दिन
फूल खिलने के।

 

होती हैं केवल वनस्पतियाँ
हरी-हरी-सी
हर गली
हर मोड़ पर बैठी
मौत अपनी बाँह फैलाकर।

 

बर्फ़-सा
जमता हुआ हर शख़्स
चुप्पियों में क़ैद हैं साँसें,
समय की नंगी सलीबों पर
गले में अटकी हुईं फाँसें,
लिख रहे हैं
लोग कविताएँ
नींद की ज्यों गोलियाँ खाकर।

 

बीत गए दिन
अब हवाओं में गन्धकेतु हिलने के
फूल खिलने के।

 

ढोती है काले पहाड़ दृष्टियाँ
सूर्य झर गए,
दृश्य घाटी में गहरे उतर गए,
बीत गए दिन
उठी बाँहों से बाँहों के मिलने के
फूल खिलने के।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

अब दो आलम में, उजाले ही उजाले होंगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

 

 

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

 

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,
उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।
(डॉ. बालस्वरूप राही)

 

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।
(डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

 

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

 

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,
मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

 

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,
क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

———–

Categories
Uncategorized

पर अपने सपनों को पंख कब मिले!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं।

कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी थीं। बहुत साल पहले, कब, ये याद नहीं है। पंक्तियां इस तरह हैं-

हम भी अंबर तक, कंदील कुछ उड़ाते
पर अपने जीवन में रंग कब घुले।
हमको तो आकर हर भोर किरण
दिन का संधान दे गई,
अनभीगे रहे और बारिश
एक तापमान दे गई।
आकाशी सतहों पर लोट-लोट जाते,
पर अपने सपनों को पंख कब मिले॥

आज, अचानक ये अधूरा गीत याद आया, तो सोचा कि इसको भी यहाँ, अपनी डिजिटल स्मृतियों में स्थापित कर दूं।

अब अपना ये पुराना, अधूरा गीत साझा करने के बाद, जगजीत सिंह जी की गाई, कैफी साहब की लिखी एक लोकप्रिय गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं, वो भी शेयर कर लेता हूँ-

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।
आंखों में नमी, हंसी लबों पर,
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो।
बन जाएंगे ज़हर पीते-पीते
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो।

शायद ज़िंदगी में ऐसा तो चलता ही रहता है, कोई कैफी साहब जैसा शायर उसको इतनी खूबसूरती से बयां कर देता है।
आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

***************

Categories
Uncategorized

लबों पे तराने अब आ न सकेंगे!

मुंबई मे हूँ, यहाँ जो कुछ देख पाऊंगा उस पर लिखूंगा, इससे पहले आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

आज मुकेश जी की गाई हुई दो प्रायवेट गज़लें शेयर कर रहा हूँ, ऐसी पहचान रही है मुकेश जी की, कि उन्होंने जो कुछ गाया उसको अमर कर दिया। उनके गायन में शास्त्रीयता का अभाव विद्वान लोग बताते हैं। मैं यह मानता हूँ कि मंदिरों में, पूजा में पहले गाया जाता था, उसके बाद गायन के आधार पर शास्त्रीयता के मानक तैयार किए गए। गायन की प्रभाविता के मूल में थी-आस्था।

जो बात सीधे दिल से निकल रही है, वो दिल तक पहुंचेगी और अमर हो जाएगी, आपके शास्त्रीयता के मानक कुछ भी बताते रहें।

तो आज जो पहली गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ, वह है-

 

जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

 

लबों पे तराने अब आ न सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

 

बहारें चमन में जो आया करेंगी,
नज़ारों की महफिल सजाया करेंगी,
नज़ारे भी हमको हंसा ना सकेंगे,
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

 

जवानी जो लाएगी सावन की रातें,
ज़माना करेगा मुहब्बत की बातें,
मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे
कि अब ज़िंदगी में मुहब्बत नहीं है।

 

आप अगर सिर्फ इस गज़ल को पढ़ रहे हैं, तब भी जो शायर ने कहा है, वह आप तक पहुंच ही रहा है, लेकिन अगर आपने इसको मुकेश जी की आवाज़ में सुना है तो आपको इसका अतिरिक्त आयाम भी महसूस होगा, ऐसी आवाज़ जो गूंगे सुर को गूंज प्रदान करती है, विस्तार देती है। खासकर के उदासी के गानों में तो मुकेश जी कलेजा उंडेल देते हैं, हालांकि मस्ती के गानों में भी उनका कोई जवाब नहीं है।

लगे हाथ एक और प्रायवेट गज़ल मुकेश जी की गाई हुई शेयर कर रहा हूँ-

 

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था,
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था।

 

मुआफ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको,
वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था।

 

शगुफ्ता फूल सिमट के कली बने जैसे,
कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था।

 

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

 

पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुज़री,
मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था।

 

यहाँ शायरी तो शानदार है ही, लेकिन उसको जो प्रभाव मुकेश जी की गायकी देती है, वो लाजवाब है। जहाँ इस गज़ल में खुद्दारी को ज़ुबान मिली है, वहीं वह शेर भी बहुत अच्छा है कि जैसे कोई ऐसे मिला कि जैसे हमारी आंखों के सामने चमककर लुप्त हो जाए और यह भी कि हर कोई जब इस दुनिया से जाता है तब यह खयाल उसके मन में ज़रूर आता होगा कि काश मैंने यह काम और कर लिया होता, बहुत सारे सपने हमारे यहीं छूट जाते हैं।

खैर मेरा ज्ञान देने का कोई इरादा नहीं है, बस इन गज़लों का आनंद लें।

नमस्कार।

***************

Categories
Uncategorized

यह बात किसी से मत कहना!

आज फिर हिंदी कवि सम्मेलनों में काफी लोकप्रिय कवि रहे- स्व. देवराज दिनेश जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। स्व. देवराज दिनेश जी वैसे व्यंग्य कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उन्होंने बहुत से गीत भी लिखे थे और यह उनके प्रिय गीतों में से एक है। यह एक प्रेमगीत है या कहें ऐसे प्रेम से जुड़ा गीत है, जिसे समाज स्वीकार नहीं करता, वह जातिभेद के कारण हो, या जो भी कारण हो।

ऐसा प्रेम जो गुपचुप किया तो जा सकता है परंतु उसे समाज के सामने स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका परिणाम कुछ भी हो सकता है, हत्या भी!
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

मैं तेरे पिंजरे का तोता,
तू मेरे पिंजरे की मैना,
यह बात किसी से मत कहना।

 

मैं तेरी आंखों में बंदी,
तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण,
मैं चलता तेरी सांस–सांस,
तू मेरे मानस की धड़कन,
मैं तेरे तन का रत्नहार,
तू मेरे जीवन का गहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

हम युगल पखेरू हंस लेंगे,
कुछ रो लेंगे कुछ गा लेंगे,
हम बिना बात रूठेंगे भी,
फिर हंस कर तभी मना लेंगे,
अंतर में उगते भावों के,
जलजात किसी से मत कहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

क्या कहा! कि मैं तो कह दूंगी!
कह देगी तो पछताएगी,
पगली इस सारी दुनियां में,
बिन बात सताई जाएगी।
पीकर प्रिये अपने नयनों की बरसात,
विहंसती ही रहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

हम युगों युगों के दो साथी,
अब अलग अलग होने आए,
कहना होगा तुम हो पत्थर,
पर मेरे लोचन भर आए,
पगली इस जग के अतल–सिंधु में,
अलग अलग हमको बहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************

Categories
Uncategorized

कश्ती के मुसाफिर ने समुंदर नहीं देखा!

आज फिर से एक गज़ल शेयर करने का मन है। ये गज़ल है ज़नाब डॉ. बशीर बद्र जी की, जो वर्तमान उर्दू शायरों में एक अलग अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं, गज़ल में बहुत से एक्सपेरीमेंट किए हैं डॉ. बशीर बद्र जी ने। यह गज़ल भी एक अलग तरह की है और कुछ शेर बहुत दमदार हैं।

आइए आज इस गज़ल का आनंद लेते हैं-

 

 

आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा ।

 

बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे,
इक उम्र हुई, दिन में कभी घर नहीं देखा ।

 

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है,
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ।

 

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुम ने मेरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा।

 

यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैंने,
फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा।

 

महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें,
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़कर नहीं देखा।

 

ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं,
वो हाथ कि जिसने कोई ज़ेवर नहीं देखा।

 

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************