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मेरी एक और कविता

आज फिर से पुराना लिखा हुआ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ-


गीत जो लिखे गए, लिखे गए।

किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की
आकुल चेष्टाओं की छाप,
भोगीं या केवल अंकित किया-
नाप-नाप कागज पर
रक्त सने पंजों का ग्राफ|

मैं कभी, कहीं नहीं रहा सृष्टा|
सृष्टि नहीं होती ऐसे कोई,
नहीं ही है कोई रचना|


भौचक लखते भर हैं
और क्रमशः करके पहचान आत्म-रूप की,
छाप अपनी, या कि अपने पर,
कहने भर का साहस करते हैं-
यह मेरी कविता है!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’


कभी ये कुछ लिखा था, जैसा भी आज याद आया सोचा कि कच्चा माल ही शेयर कर लेता हूँ|

नमस्कार|
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मटरू का आना और जाना!

मटरू का पता ही नहीं चलता कि कब वो हमारे, मतलब अपने घर में रहेगा और कब बाहर चला जाएगा| एक तरह से देखा जाए तो उसको आवारा कहा जा सकता है, कभी वो रात में अपने स्थान पर सोता है और सुबह होते ही चला जाता है, और कभी रात भर गायब रहता है और सुबह आ जाता है!

अब आपको बता दूँ कि मटरू एक कबूतर है, श्वेत- स्नो व्हाइट नहीं, ऑफ व्हाइट रंग का कबूतर| शुरू में इसके आने पर जब मैंने इसका नाम ‘मटरू’ रखा तब मेरी 6 साल की पोती ने कहा कि ये फ़ीमेल है| मैंने कहा कि अगर फ़ीमेल है तो इसका नाम बहुत पहले ‘चांदनी चौक टू चाइना’ फिल्म में रख दिया गया था- ‘मसक्कली’| लेकिन हम जेंडर के विवाद में नहीं फंसे और उसका नाम ‘मटरू’ ही स्वीकार कर लिया|

चलिए अपने और मटरू के स्थान का भी जिक्र करते हुए आगे बढ़ते हैं| लगभग एक माह पहले जब अन्य स्थानों के साथ-साथ गोवा में भी तूफान आया था, तब मटरू भी उड़ता हुआ हमारे घर आ गया था| हमारा घर या कहें कि फ्लैट, समुद्र के सामने ही छठे फ्लोर पर है| यहाँ हमारी बॉलकनी, जहां से समुद्र का नजारा और सूर्यास्त भी बहुत सुंदर दिखाई देता है, हालांकि मुझे नहीं लगता कि मटरू को इससे कुछ विशेष फर्क पड़ता होगा| हमारी बालकनी में जो स्प्लीट एसी का ब्लोअर है, उसके ऊपर मटरू ने अपना ठिकाना बना लिया|

शुरू में तो हमें लगा कि मटरू आया है, चला जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, शुरू में तो वह हमारे घर के अंदर अपनी बालकनी से दूसरे छोर की बालकनी तक एक-दो बार घूमा| बाद में उसको शायद समझ में आया कि घर के अंदर घूमना उसके लिए उचित नहीं है, वैसे हमारे घर में दो ‘डॉगी’ भी हैं| शुरू में तो हम फर्श पर मटरू के लिए खाना डालने के अलावा, ऊपर ब्लोअर पर भी खाना डालते थे, जहां वह निवास करता है| लेकिन वहाँ खाना डालने से यह खतरा और बढ़ जाता है कि बाहरी कबूतर और कौए उसको वहाँ से भगा देंगे|

लेकिन देखा जाए तो, जीवन में बहुत कठिनाइयाँ हैं, इन छोटे-छोटे प्राणियों के लिए भी| वैसे हमारे घर में पहले से ही बालकनी में कौओं-कबूतरों आदि के लिए दाना डाला जाता रहा है| अब वे जो बाहर के प्राणी हैं, उनको लगने लगा है कि इसके साथ विशेष व्यवहार क्यों किया जा रहा है| कुछ तो इनकी भीड़ में ऐसे भी होते हैं जो हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहते हैं| ऐसे में मटरू को सुरक्षित रखना और यह देखना भी मुश्किल हो जाता है कि वह भरपेट खाना खा ले|

हम लोग हमेशा बालकनी में तो नहीं रहते, हमारे दूर होने पर बाहर के ये योद्धा इसके साथ क्या करेंगे कोई अनुमान नहीं लगा सकता| इसलिए हम देखते हैं कि कभी तो वो सुबह से ही बाहर निकल जाता है और कभी रात में भी घर नहीं आता| जब तक वो यहाँ है, अक्सर शिकायत होती है कि कितनी गंदगी फैलाता है| क्योंकि हमारा काम हम करते हैं, उसको खाना खिलाने का, लेकिन अपना काम तो वो करेगा ही ना! और उसमें गंदगी भी फैलेगी!

खैर मटरू के बहाने कबूतरों में से ही कुछ से थोड़ी पहचान हुई, एक तो वह योद्धा जो सबसे लड़ता रहता है, एक और जो बहुत सुंदर है, श्वेत-श्याम रंग का और ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि उसका एक पंजा ही नहीं है| कैसे-कैसे कष्ट हर स्वरूप में प्राणी झेलते हैं, लेकिन उन सबके लिए हम क्या कर सकते हैं?

हाँ तो जैसे मैंने कहा कि कभी मटरू सुबह से ही निकल जाता है और हम सोचते हैं कि शायद अपना नया ठिकाना देखने गया है| लेकिन जो भी हो मटरू अभी भी हमारे साथ है, जब तक उसका मन हो रहेगा या जब तक इस कठिन जीवन को वह संभालकर रख पाए, क्योंकि खतरे तो हर प्राणी के लिए हैं, अलग तरह के|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Film Song

रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ!

आज पुरानी फिल्म- किनारे-किनारे के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है न्याय शर्मा जी ने और इसका संगीत दिया है जयदेव जी ने|

यह जीवन बहुत जटिल है| कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि किस बात पर हंसा जाए और किस बात पर रोया जाए पता ही नहीं चलता| कुछ ऐसी ही स्थिति का गीत है ये|

लीजिए आज प्रस्तुत है, मुकेश जी का गाया यह अमर गीत –

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ,
हादसा याद जब आता है
तो हँस लेता हूँ|

मेरी उजड़ी हुई दुनिया में
तमन्ना का चिराग़,
जब कोई आ के जलाता है
है तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ|


कोई दावा नहीं फ़रियाद नहीं
तंज़ नहीं,
रहम जब अपने पे आता है
तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता
है तो हँस लेता हूँ.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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Poetry

तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या!

आज फिर से एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे लिखा है ‘ओबेदुल्लाह अलीम’ साहब ने और ग़ुलाम अली साहब ने गाया है|

ग़ुलाम अली साहब का एक प्रसंग याद आ रहा है, मेरे बच्चों को मालूम है कि मुझे ग़ुलाम अली जी बहुत पसंद हैं, तो बेटे ने सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में उनके प्रोग्राम के लिए 5000 रु का एक टिकट मेरे लिए खरीदा और मैं वो प्रोग्राम सुनने गया| इस कार्यक्रम में एक श्रोता ने फरमाइश की- ‘इतनी मुद्दत बाद मिले हो’, ग़ुलाम अली जी फरमाइश को समझ गए, लेकिन बोले मैं तो आता ही रहता हूँ, आप ही नहीं आए होंगे|

मैं कहना यह चाहता था कि वो समय अलग था, जब ग़ुलाम अली साहब जैसे पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आते रहते थे, अब तो यह लगभग असंभव हो गया है|


अपने ये कवि-शायर कभी कितने सीधे लगते हैं, जो जितना मिल जाए उसमें संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं| अब जैसे इस ग़ज़ल में ही शायर महोदय कहते हैं कि कुछ दिन मेरी आँखों में बस जाओ, फिर भले ही ख्वाब बनकर क्यों न रह जाओ|


बहुत सुंदर ग़ज़ल है, इसका आनंद लीजिए-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में,
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या|


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को,
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या|


एक आईना था सो टूट गया,
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या|


मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूँ,
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या|


जब हम ही न महके फिर साहिब,
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ क्या|


जब देखने वाला कोई नहीं,
बुझ जाओ तो क्या, जल जाओ तो क्या|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

अपने शहर का रास्ता!

आज फिर से अपने एक पुराने कवि-मित्र को याद कर रहा हूँ| उनके बारे में एक बात यह भी कि मैथिली शरण गुप्त जी शायद उनके नाना थे, या शायद दादा रहे हों, यह ठीक से याद नहीं, वैसे यह रिश्ता महत्वपूर्ण भी नहीं है, ऐसे ही याद आ गया|

हाँ तो मेरे यह मित्र थे स्वर्गीय नवीन सागर जी, कविताओं के अलावा बहुत अच्छी कहानियाँ भी लिखते थे और उनकी कहानियाँ उस समय धर्मयुग, सारिका आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं|


नवीन जी से शुरू की मुलाकातें तो अन्य मित्रों की तरह दिल्ली में ही हुईं, जब वे संघर्ष कर रहे थे, एक दो छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने दिल्ली में काम किया, बाद में वे मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी में अच्छे पद पर तैनात हो गए| मेरे कुछ संबंधी भी उस समय भोपाल में थे और उसके बाद मेरा यह प्रयास रहता था कि जब भी भोपाल जाता था, उनसे अवश्य मिलता था|

नवीन सागर जी का बहुत पहले, वर्ष 2000 में लगभग 52 वर्ष की आयु में ही दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था, उस समय बहुत झटका लगा था| आज जब एक-एक करके कई वरिष्ठ साथी विदा हो रहे हैं, अचानक नवीन जी का खयाल आया|

अब और कुछ न कहते हुए, नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो शहर की संवेदनहीनता को रेखांकित करती है-

आधी रात के वक़्त अपने शहर का रास्‍ता
पराए शहर में भूला|


बड़ा भारी शहर और भारी सन्‍नाटा
कोई वहाँ परिचित नहीं,
परिचित सिर्फ़ आसमान
जिसमें तारे नहीं ज़रा-सा चॉंद,
परिचित सिर्फ़ पेड़
चिड़ियों की नींद में ऊँघते हुए,
परिचित सिर्फ़ हवा
रुकी हुई दीवारों के बीच उदासीन|


परिचित सिर्फ़ भिखारी
आसमान से गिरे हुए चीथड़ों से,
जहाँ-तहाँ पड़े हुए
परिचित सिर्फ़ अस्‍पताल क़त्‍लगाह हमारे,
परिचित सिर्फ़ स्‍टेशन
आती-जाती गाड़ियों के मेले में अकेला
छूटा हुआ रोशन|


परिचित सिर्फ़ परछाइयाँ:
चीज़ों के अँधेरे का रंग,
परिचित सिर्फ़ दरवाज़े बंद और मज़बूत।


इनमें से किसी से पूछता रास्‍ता
कि अकस्‍मात एक चीख़
बहुत परिचित जहाँ जिस तरफ़ से
उस तरफ़ को दिखा रास्‍ता|


कि तभी
मज़बूत टायरों वाला ट्रक मिला
जो रास्‍ते पर था,
ट्रक ड्राइवर गाता हुआ चला रहा था
मैं ऊँघता हुआ अपने शहर पहुँचा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आग अब भी कहीं दबी-सी है!

आज बिना किसी भूमिका के जावेद अख्तर साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और फिर कविता अपनी बात स्वयं कहती है|

लीजिए प्रस्तुत है जावेद अख्तर साहब की यह ग़ज़ल-

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,
हँसती आँखों में भी नमी-सी है|

दिन भी चुपचाप सर झुकाये था,
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है|

किसको समझायें किसकी बात नहीं,
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है|


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई,
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है|

कह गए हम ये किससे दिल की बात,
शहर में एक सनसनी-सी है|

हसरतें राख हो गईं लेकिन,
आग अब भी कहीं दबी-सी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चोट और टूटना दिल का!

जोश मलीहाबादी जी का प्रसिद्ध शेर है, जिसे गुलाम अली साहब ने एक ग़ज़ल के शुरू में गाया है-

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया|

वास्तव में जब सर्दी पड़ती है तब पुरानी चोटें भी कसकती हैं| हम अक्सर देखते हैं कि हमारे खिलाड़ियों को चोट लग जाती है और वे कुछ मैच नहीं खेल पाते| कभी-कभी तो कोई चोट किसी के खेल जीवन पर पूर्ण विराम भी लगा देती है|


जीवन को भी तो एक खेल ही कहा जाता है और इस खेल में भी चोट लगना स्वाभाविक ही है| हाँ जीवन के इस खेल में चोटें शरीर के मुक़ाबले मन पर या कहें कि ‘दिल’ पर अधिक लगती हैं|

फिर ग़ुलाम अली जी की गायी हुई एक ग़ज़ल के शेर याद आ रहे हैं, यह ग़ज़ल मसरूर अनवर जी की लिखी हुई है-


नफ़रतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में,
हमने किस-किसको पुकारा, ये कहानी फिर सही|

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने,
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही|

एक अक्सर सुना हुआ शेर याद आ रहा है-


इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं, किस क़दर चोट खाए हुए हैं,
मौत ने हमको बख्शा है लेकिन, ज़िंदगी के सताए हुए हैं|


और मेरे प्यारे मुकेश जी के गाये हुए गीत तो कई याद आते हैं-


मेरे टूटे हुए दिल से, कोई तो आज ये पूछे
कि तेरा हाल क्या है|

अथवा-

वो तेरे प्यार का ग़म, इक बहाना था सनम,
अपनी क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी
की दिल टूट गया
|

वैसे चोट लगने, और कुछ टूटने (वैसे यहाँ ज़िक्र दिल का है) के बीच काफी फासला हो सकता है, कभी तो इंसान पूरी उम्र चोट खाते-खाते, शेरशाह सूरी बना रह सकता है और कभी पहली चोट में भी धराशायी भी हो सकता है|
अब चोट ही है जो जब दिखाई देती है तो ज़ख्म कहलाती है, एक फिल्मी गीत की पंक्ति याद आ रही है-

इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह,
अबरू की कटारी को दो, आब और जियादा|

ये बात तो चलती ही जा सकती है, अंत में फिर से मुकेश जी के गाये गीत की पंक्तियों के साथ आज की बात समाप्त करूंगा, वैसे मूड बना तो बाद में भी इसी विषय पर बात कर सकता हूँ| तो अंत में प्रस्तुत हैं-

तीर आँखों के जिगर के पार कर दो यार तुम,
जान मांगो या तो जां को निसार कर दो यार तुम|

हम तुम्हारे सामने हैं, फिर तुम्हें डर काहे का,
शौक से अपनी नज़र के वार कर दो यार तुम
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अक्सर एक व्यथा यात्रा बन जाती है!

ब्लॉग लेखन हो या जो भी गतिविधि हो, अक्सर हम वह चीज़ें, वे रचनाएँ अधिक शेयर करते हैं, जो ‘हमारे समय’ की होती हैं| जैसे फिल्मों की बात होती है तो मुझे वो ज़माना अधिक याद आता है जिसमें दिलीप कुमार जी, देव आनंद और मेरे प्रिय राज कपूर जी थे, गायकों में मुकेश जी, रफी साहब और किशोर कुमार आदि-आदि होते थे, गायिकाओं में तो लता जी और आशा जी थी हीं|

कविता के मामले में तो वह कवि सम्मेलनों का ज़माना याद आता है, जब दिल्ली में प्रतिवर्ष दो बार लाल किले पर विराट कवि सम्मेलन होते थे, राष्ट्रीय पर्वों- स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस के अवसर पर| अधिकांश कवि जिनकी रचनाएँ मैं शेयर करता हूँ, वे कवि सम्मेलनों के माध्यम से लोकप्रिय हुए थे|

लेकिन कुछ कवि मंच पर कम ही आते थे और अपनी रचनाएँ पढ़े जाने से लोगों तक पहुँचते थे| आज के कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी भी ऐसे ही थे| लीजिए प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की एक कविता-



अक्सर एक गन्ध
मेरे पास से गुज़र जाती है,
अक्सर एक नदी
मेरे सामने भर जाती है,
अक्सर एक नाव
आकर तट से टकराती है,
अक्सर एक लीक
दूर पार से बुलाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहीं पर बैठ जाता हूँ,
अक्सर एक प्रतिमा
धूल में बन जाती है ।


अक्सर चाँद जेब में
पड़ा हुआ मिलता है,
सूरज को गिलहरी
पेड़ पर बैठी खाती है,
अक्सर दुनिया
मटर का दाना हो जाती है,
एक हथेली पर
पूरी बस जाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से उठ जाता हूँ,
अक्सर रात चींटी-सी
रेंगती हुई आती है ।


अक्सर एक हँसी
ठंडी हवा-सी चलती है,
अक्सर एक दृष्टि
कनटोप-सा लगाती है,
अक्सर एक बात
पर्वत-सी खड़ी होती है,
अक्सर एक ख़ामोशी
मुझे कपड़े पहनाती है ।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एहसास का मारा दिल ही तो है!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

कल एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर की थी| एक ही विषय पर लिखी ब्लॉग पोस्ट्स में से वह दूसरी थी| सोचता हूँ कि इस विषय पर साथ की अन्य पोस्ट भी शेयर कर लूँ| आज प्रस्तुत है उससे पहले लिखी गई पोस्ट|



अगर यह पूछा जाए कि रसोई में कौन सी वस्तु, कौन सा पदार्थ सबसे महत्वपूर्ण है तो पाक कला में निपुण कोई व्यक्ति, अब महिला कहने से बच रहा हूँ, क्योंकि बड़े‌-बड़े ‘शेफ’ आज की तारीख में पुरुष हैं, हाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति बता देगा कि यह वस्तु सबसे ज्यादा उपयोग में आती है अथवा यह वस्तु सर्वाधिक गुणकारी है।

अब यही सवाल अगर कविता, शायरी, विशेष रूप से फिल्मी गीतों के बारे में पूछा जाए, तो मुझे लगता है कि जो शब्द प्रतियोगिता में सबसे आगे आएंगे, उनमें से एक प्रमुख शब्द है-‘दिल’।

मुकेश जी के एक गीत के बोल याद आ रहे हैं-

दिल से तुझको बेदिली है, मुझको है दिल का गुरूर,
तू ये माने के न माने, लोग मानेंगे ज़ुरूर
!

आगे बढ़ने से पहले, दो शेर याद आ रहे हैं जो गुलाम अली जी ने एक गज़ल के प्रारंभ में गाए हैं-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।
इसका रोना नहीं, क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इसका गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।


कुछ बार ऐसे लोगों की बात होती है, जो चावल के एक दाने पर काफी बड़ा आलेख, श्लोक, यहाँ तक कि पूरी गीता भी लिख देते हैं। उन चमत्कारों का तो पता नहीं, परंतु ‘दिल’, जिसको शरीर विज्ञानी, आकार-प्रकार के लिहाज़ से पता नहीं कितना छोटा या बड़ा मानते हैं, परंतु उस पर कितना कुछ अंकित हो पाता है, उसकी कोई सीमा नहीं है।

फिल्म ‘दिल ही तो है’ में मुकेश जी ने, साहिर लुधियानवी जी के लिखे दो गीत गाए हैं, जिनका मुखड़ा लगभग एक ही जैसा है, एक उल्लास से भरा है और दूसरा उदासी से, मन हो रहा है दोनों को पूरा ही शेयर करने का-

दिल जो भी कहेगा मानेंगे,
दुनिया में हमारा दिल ही तो है।

हार मानी नहीं ज़िंदगी से,
हंस के मिलते रहे हर किसी से,
क्यों न इस दिल पे क़ुर्बान जाएं,
सह लिए कितने गम किस खुशी से,
सुख में जो न खेले हम ही तो हैं,
दुख से जो न हारा दिल ही तो है।।


कोई साथी न कोई सहारा,

कोई मंज़िल न कोई किनारा,
रुक गए हम जहाँ दिल ने रोका,
चल दिए जिस तरफ दिल पुकारा।
हम प्यार के प्यासे लोगों की,
मंज़िल का इशारा दिल ही तो है॥

अपनी जिंदादिली के सहारे,
हमने दिन ज़िंदगी के गुज़ारे,
वर्ना इस बेमुरव्वत जहाँ में,
और कब्ज़े में क्या था हमारे,
हर चीज है दौलत वालों की,
मुफलिस का बेचारा दिल ही तो है॥


अब दूसरा गीत-

भूले से मुहब्बत कर बैठा,
नादां था बिचारा दिल ही तो है।
हर दिल से खता हो जाती है,
बिगड़ो न खुदारा दिल ही तो है।

इस तरह निगाहें मत फेरो,
ऐसा न हो धड़कन रुक जाए,
सीने में कोई पत्थर तो नहीं,
एहसास का मारा दिल ही तो है।

बेदादगरों की ठोकर से,
सब ख्वाब सुहाने चूर हुए,
अब दिल का सहारा गम ही तो है,
अब गम का सहारा दिल ही तो है।


जब इतना अधिक स्थान ‘दिल’ ने कविता-शायरी में घेरा है, एक ब्लॉग में तो इसका समाना मुश्किल है। ‘मेरा नाम जोकर’ में नायक इस बात पर खुश होता है कि उसके दिल में पूरी दुनिया समा जाएगी और फिर उसका दिल टूटकर बिखर जाता है।

बहुत सारी बातें याद आ रही हैं, दिल को लेकर, कुछ बातें आगे भी तो करेंगे!

नमस्कार
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कच्चे रंगों से तसवीर बना डाली!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी के हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं| वे बच्चों की पत्रिका पराग के संपादक भी रहे थे और अपने साहित्य सृजन के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए|

आज मैं नंदन जी की यह रचना शेयर कर रहा हूँ-


रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
गर अंगारे
याचक बन पाँखुरियाँ माँग गए

कच्चे रंगों से
तसवीर बना डाली,
हल्की बौछार पड़ी
रंग हुए खाली।
कितनी है दूरी,
पर, जाने क्या मजबूरी
कि
टीस के सफ़र की

कई सीढ़ियाँ,
फलाँग गए।

खंड-खंड अपनापन
टुकड़ों में
जीना।

फटे हुए कुर्ते-सा
रोज़-रोज़ सीना।
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टाँग गए!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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