मुसीबतों को मेहमान कर लिया है!

हर बार अपने दिल की बातें ज़बाँ पे लाकर,
हमने मुसीबतों को मेहमान कर लिया है|

राजेश रेड्डी

अहसास का ऐसा घर चाहिए!

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।

कन्हैयालाल नंदन

एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे!

वसीम बरेलवी साहब उर्दू शायरी का एक जाना-माना नाम हैं और अनेक खूबसूरत ग़ज़लें, नज़्में उन्होंने हमे दी हैं| वैसे तो दूरदर्शन आदि पर अनेक मुशायरों और कवि सम्मेलनों में उनको सुना है, एक बार मैंने अपने आयोजन में, ऊंचाहार में आयोजित कवि-सम्मेलन में उनको बुलाया था और जी भरकर उनको सुना था|

लीजिए आज प्रस्तुत है वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल –


अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएं कैसे|

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे|

लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ़,
सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे|

क़हक़हा आंख का बरताव बदल देता है,
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे|

फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं,
अपनी मिट्टी को कहीं छोड़ के जाएं कैसे|

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा,
एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे|

जिस ने दानिश्ता किया हो नज़र-अंदाज़ ‘वसीम’,
उस को कुछ याद दिलाएं तो दिलाएं कैसे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे!

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आज एक बार फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ |



अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,

उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।

(डॉ. बालस्वरूप राही)

और

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,

बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।

(डॉ. सूर्यभानु गुप्त)


सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,

आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,

उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

(नीरज)


वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,
मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,
क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।


आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

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मेरी एक और कविता

आज फिर से पुराना लिखा हुआ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ-


गीत जो लिखे गए, लिखे गए।

किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की
आकुल चेष्टाओं की छाप,
भोगीं या केवल अंकित किया-
नाप-नाप कागज पर
रक्त सने पंजों का ग्राफ|

मैं कभी, कहीं नहीं रहा सृष्टा|
सृष्टि नहीं होती ऐसे कोई,
नहीं ही है कोई रचना|


भौचक लखते भर हैं
और क्रमशः करके पहचान आत्म-रूप की,
छाप अपनी, या कि अपने पर,
कहने भर का साहस करते हैं-
यह मेरी कविता है!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’


कभी ये कुछ लिखा था, जैसा भी आज याद आया सोचा कि कच्चा माल ही शेयर कर लेता हूँ|

नमस्कार|
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मटरू का आना और जाना!

मटरू का पता ही नहीं चलता कि कब वो हमारे, मतलब अपने घर में रहेगा और कब बाहर चला जाएगा| एक तरह से देखा जाए तो उसको आवारा कहा जा सकता है, कभी वो रात में अपने स्थान पर सोता है और सुबह होते ही चला जाता है, और कभी रात भर गायब रहता है और सुबह आ जाता है!

अब आपको बता दूँ कि मटरू एक कबूतर है, श्वेत- स्नो व्हाइट नहीं, ऑफ व्हाइट रंग का कबूतर| शुरू में इसके आने पर जब मैंने इसका नाम ‘मटरू’ रखा तब मेरी 6 साल की पोती ने कहा कि ये फ़ीमेल है| मैंने कहा कि अगर फ़ीमेल है तो इसका नाम बहुत पहले ‘चांदनी चौक टू चाइना’ फिल्म में रख दिया गया था- ‘मसक्कली’| लेकिन हम जेंडर के विवाद में नहीं फंसे और उसका नाम ‘मटरू’ ही स्वीकार कर लिया|

चलिए अपने और मटरू के स्थान का भी जिक्र करते हुए आगे बढ़ते हैं| लगभग एक माह पहले जब अन्य स्थानों के साथ-साथ गोवा में भी तूफान आया था, तब मटरू भी उड़ता हुआ हमारे घर आ गया था| हमारा घर या कहें कि फ्लैट, समुद्र के सामने ही छठे फ्लोर पर है| यहाँ हमारी बॉलकनी, जहां से समुद्र का नजारा और सूर्यास्त भी बहुत सुंदर दिखाई देता है, हालांकि मुझे नहीं लगता कि मटरू को इससे कुछ विशेष फर्क पड़ता होगा| हमारी बालकनी में जो स्प्लीट एसी का ब्लोअर है, उसके ऊपर मटरू ने अपना ठिकाना बना लिया|

शुरू में तो हमें लगा कि मटरू आया है, चला जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, शुरू में तो वह हमारे घर के अंदर अपनी बालकनी से दूसरे छोर की बालकनी तक एक-दो बार घूमा| बाद में उसको शायद समझ में आया कि घर के अंदर घूमना उसके लिए उचित नहीं है, वैसे हमारे घर में दो ‘डॉगी’ भी हैं| शुरू में तो हम फर्श पर मटरू के लिए खाना डालने के अलावा, ऊपर ब्लोअर पर भी खाना डालते थे, जहां वह निवास करता है| लेकिन वहाँ खाना डालने से यह खतरा और बढ़ जाता है कि बाहरी कबूतर और कौए उसको वहाँ से भगा देंगे|

लेकिन देखा जाए तो, जीवन में बहुत कठिनाइयाँ हैं, इन छोटे-छोटे प्राणियों के लिए भी| वैसे हमारे घर में पहले से ही बालकनी में कौओं-कबूतरों आदि के लिए दाना डाला जाता रहा है| अब वे जो बाहर के प्राणी हैं, उनको लगने लगा है कि इसके साथ विशेष व्यवहार क्यों किया जा रहा है| कुछ तो इनकी भीड़ में ऐसे भी होते हैं जो हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहते हैं| ऐसे में मटरू को सुरक्षित रखना और यह देखना भी मुश्किल हो जाता है कि वह भरपेट खाना खा ले|

हम लोग हमेशा बालकनी में तो नहीं रहते, हमारे दूर होने पर बाहर के ये योद्धा इसके साथ क्या करेंगे कोई अनुमान नहीं लगा सकता| इसलिए हम देखते हैं कि कभी तो वो सुबह से ही बाहर निकल जाता है और कभी रात में भी घर नहीं आता| जब तक वो यहाँ है, अक्सर शिकायत होती है कि कितनी गंदगी फैलाता है| क्योंकि हमारा काम हम करते हैं, उसको खाना खिलाने का, लेकिन अपना काम तो वो करेगा ही ना! और उसमें गंदगी भी फैलेगी!

खैर मटरू के बहाने कबूतरों में से ही कुछ से थोड़ी पहचान हुई, एक तो वह योद्धा जो सबसे लड़ता रहता है, एक और जो बहुत सुंदर है, श्वेत-श्याम रंग का और ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि उसका एक पंजा ही नहीं है| कैसे-कैसे कष्ट हर स्वरूप में प्राणी झेलते हैं, लेकिन उन सबके लिए हम क्या कर सकते हैं?

हाँ तो जैसे मैंने कहा कि कभी मटरू सुबह से ही निकल जाता है और हम सोचते हैं कि शायद अपना नया ठिकाना देखने गया है| लेकिन जो भी हो मटरू अभी भी हमारे साथ है, जब तक उसका मन हो रहेगा या जब तक इस कठिन जीवन को वह संभालकर रख पाए, क्योंकि खतरे तो हर प्राणी के लिए हैं, अलग तरह के|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ!

आज पुरानी फिल्म- किनारे-किनारे के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है न्याय शर्मा जी ने और इसका संगीत दिया है जयदेव जी ने|

यह जीवन बहुत जटिल है| कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि किस बात पर हंसा जाए और किस बात पर रोया जाए पता ही नहीं चलता| कुछ ऐसी ही स्थिति का गीत है ये|

लीजिए आज प्रस्तुत है, मुकेश जी का गाया यह अमर गीत –

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ,
हादसा याद जब आता है
तो हँस लेता हूँ|

मेरी उजड़ी हुई दुनिया में
तमन्ना का चिराग़,
जब कोई आ के जलाता है
है तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ|


कोई दावा नहीं फ़रियाद नहीं
तंज़ नहीं,
रहम जब अपने पे आता है
तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता
है तो हँस लेता हूँ.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या!

आज फिर से एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे लिखा है ‘ओबेदुल्लाह अलीम’ साहब ने और ग़ुलाम अली साहब ने गाया है|

ग़ुलाम अली साहब का एक प्रसंग याद आ रहा है, मेरे बच्चों को मालूम है कि मुझे ग़ुलाम अली जी बहुत पसंद हैं, तो बेटे ने सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में उनके प्रोग्राम के लिए 5000 रु का एक टिकट मेरे लिए खरीदा और मैं वो प्रोग्राम सुनने गया| इस कार्यक्रम में एक श्रोता ने फरमाइश की- ‘इतनी मुद्दत बाद मिले हो’, ग़ुलाम अली जी फरमाइश को समझ गए, लेकिन बोले मैं तो आता ही रहता हूँ, आप ही नहीं आए होंगे|

मैं कहना यह चाहता था कि वो समय अलग था, जब ग़ुलाम अली साहब जैसे पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आते रहते थे, अब तो यह लगभग असंभव हो गया है|


अपने ये कवि-शायर कभी कितने सीधे लगते हैं, जो जितना मिल जाए उसमें संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं| अब जैसे इस ग़ज़ल में ही शायर महोदय कहते हैं कि कुछ दिन मेरी आँखों में बस जाओ, फिर भले ही ख्वाब बनकर क्यों न रह जाओ|


बहुत सुंदर ग़ज़ल है, इसका आनंद लीजिए-

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में,
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या|


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को,
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या|


एक आईना था सो टूट गया,
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या|


मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूँ,
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या|


जब हम ही न महके फिर साहिब,
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ क्या|


जब देखने वाला कोई नहीं,
बुझ जाओ तो क्या, जल जाओ तो क्या|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अपने शहर का रास्ता!

आज फिर से अपने एक पुराने कवि-मित्र को याद कर रहा हूँ| उनके बारे में एक बात यह भी कि मैथिली शरण गुप्त जी शायद उनके नाना थे, या शायद दादा रहे हों, यह ठीक से याद नहीं, वैसे यह रिश्ता महत्वपूर्ण भी नहीं है, ऐसे ही याद आ गया|

हाँ तो मेरे यह मित्र थे स्वर्गीय नवीन सागर जी, कविताओं के अलावा बहुत अच्छी कहानियाँ भी लिखते थे और उनकी कहानियाँ उस समय धर्मयुग, सारिका आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं|


नवीन जी से शुरू की मुलाकातें तो अन्य मित्रों की तरह दिल्ली में ही हुईं, जब वे संघर्ष कर रहे थे, एक दो छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने दिल्ली में काम किया, बाद में वे मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी में अच्छे पद पर तैनात हो गए| मेरे कुछ संबंधी भी उस समय भोपाल में थे और उसके बाद मेरा यह प्रयास रहता था कि जब भी भोपाल जाता था, उनसे अवश्य मिलता था|

नवीन सागर जी का बहुत पहले, वर्ष 2000 में लगभग 52 वर्ष की आयु में ही दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था, उस समय बहुत झटका लगा था| आज जब एक-एक करके कई वरिष्ठ साथी विदा हो रहे हैं, अचानक नवीन जी का खयाल आया|

अब और कुछ न कहते हुए, नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो शहर की संवेदनहीनता को रेखांकित करती है-

आधी रात के वक़्त अपने शहर का रास्‍ता
पराए शहर में भूला|


बड़ा भारी शहर और भारी सन्‍नाटा
कोई वहाँ परिचित नहीं,
परिचित सिर्फ़ आसमान
जिसमें तारे नहीं ज़रा-सा चॉंद,
परिचित सिर्फ़ पेड़
चिड़ियों की नींद में ऊँघते हुए,
परिचित सिर्फ़ हवा
रुकी हुई दीवारों के बीच उदासीन|


परिचित सिर्फ़ भिखारी
आसमान से गिरे हुए चीथड़ों से,
जहाँ-तहाँ पड़े हुए
परिचित सिर्फ़ अस्‍पताल क़त्‍लगाह हमारे,
परिचित सिर्फ़ स्‍टेशन
आती-जाती गाड़ियों के मेले में अकेला
छूटा हुआ रोशन|


परिचित सिर्फ़ परछाइयाँ:
चीज़ों के अँधेरे का रंग,
परिचित सिर्फ़ दरवाज़े बंद और मज़बूत।


इनमें से किसी से पूछता रास्‍ता
कि अकस्‍मात एक चीख़
बहुत परिचित जहाँ जिस तरफ़ से
उस तरफ़ को दिखा रास्‍ता|


कि तभी
मज़बूत टायरों वाला ट्रक मिला
जो रास्‍ते पर था,
ट्रक ड्राइवर गाता हुआ चला रहा था
मैं ऊँघता हुआ अपने शहर पहुँचा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आग अब भी कहीं दबी-सी है!

आज बिना किसी भूमिका के जावेद अख्तर साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और फिर कविता अपनी बात स्वयं कहती है|

लीजिए प्रस्तुत है जावेद अख्तर साहब की यह ग़ज़ल-

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,
हँसती आँखों में भी नमी-सी है|

दिन भी चुपचाप सर झुकाये था,
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है|

किसको समझायें किसकी बात नहीं,
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है|


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई,
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है|

कह गए हम ये किससे दिल की बात,
शहर में एक सनसनी-सी है|

हसरतें राख हो गईं लेकिन,
आग अब भी कहीं दबी-सी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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