उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है!

अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह,
उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मिरे प्यार ने सुलझाए हैं!

ज़िंदगी ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को,
उसके गेसू तो मिरे प्यार ने सुलझाए हैं|

राही मासूम रज़ा

ज़ुल्फ़ों की घटा छाई भी होती है!

‘क़तील’ उस दम भी रहता है यही एहसास-ए-महरूमी,
जब उन शानों पे ज़ुल्फ़ों की घटा छाई भी होती है|

क़तील शिफ़ाई

लेकिन गुमनाम नहीं हॊता!

जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही,
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊता|

मीना कुमारी