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बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर!

कल मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर किया था, तो आज भी मन हो रहा है| वैसे मुकेश जी के गीत ही ऐसे हैं कि यादों में लिपटे रहते हैं| आज का ये गीत है 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पूर्णिमा’ का, गीत लिखा है- गुलज़ार जी ने और इसका संगीत दिया है- कल्याणजी आनंद जी ने| इस फिल्म के नायक थे सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र जी|


मुकेश जी ऐसे महान गायक थे कि उनके लिए नौशाद जी कहते थे- ‘तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए’| मुकेश जी ने रफी साहब, किशोर कुमार जी और लता जी से कम गीत गाए हैं, लेकिन लोकप्रियता के मामले में वे किसी से कम नहीं हैं| अपने जीवित रहते उन्हें किसी भी पुरूष गायक से अधिक फिल्मफेयर पुरस्कार मिले थे और आज भी लोगों को उनके गीत याद आते हैं|

यह भी बात है कि लाजवाब गीत-संगीत का जो समय पहले था, वो तो अब आना संभव ही नहीं है, किसी को इतनी फुर्सत नहीं है कि वह गीत-संगीत पर इतनी मेहनत करे|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|
तुम्हें पा के हम खुद से दूर हो गए थे,
तुम्हें छोड़कर अपने पास आ गए हैं|



तुम्हारी वफ़ा से शिकायत नहीं है,
निभाना तो कोई रवायत नहीं है|
जहाँ तक कदम आ सके आ गए हैं,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


चमन से चले हैं ये इल्ज़ाम लेकर,
बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर|
मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए थे,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तू खुशी से मेरी जल गया!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-
आज एक पुराना गीत याद आ रहा है, जिसे मुझे मेरे एक पुराने मित्र और सहकर्मी- श्री चुन्नी लाल जी गाया करते थे। ये गीत बहुत पुरानी फिल्म- दिल-ए-नादां का है, जिसे शकील बदायुनी जी ने लिखा है और गुलाम मुहम्मद जी के संगीत निर्देशन में तलत महमूद जी ने गाया है।

कुल मिलाकर फिल्मी गीतों में बहुत ज्यादा कांटेंट नहीं होता, सीमित समय में गीत गाया जाना होता है, दो या तीन अंतरे का! लेकिन जो छाप इन कुछ पुराने गीतों की मन पर पड़ती है, उसका वर्णन करना मुश्किल है। इस गीत को भगवान से एक शिकायत भरी प्रार्थना के रूप में देख सकते हैं। मेरे मित्र भी पूरी तरह डूबकर इस गीत को गाते थे, लीजिए इस गीत को याद कर लेते हैं-

ज़िंदगी देने वाले सुन,
तेरी दुनिया से दिल भर गया,
मैं यहाँ जीते जी मर गया।

रात कटती नहीं, दिन गुज़रता नहीं,
ज़ख्म ऐसा दिया है कि भरता नहीं,
आंख वीरान है,
दिल परेशान है,
ग़म का सामान है,
जैसे जादू कोई कर गया।


बेख़ता तूने मुझ से खुशी छीन ली,
ज़िंदा रखा मगर ज़िंदगी छीन ली,
कर दिया दिल का खूं,
चुप कहाँ तक रहूं,
साफ क्यूं न कहूं,
तू खुशी से मेरी जल गया।
ज़िंदगी देने वाले सुन॥


इतना ही कहूंगा कि अगर आपको भगवान से प्रेम है, उस पर भरोसा है तो आप उससे क्या नहीं कह सकते! और लड़ तो सकते ही हैं।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।

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मेरे अपने, मेरे होने की निशानी माँगें!

आज मैं 1991 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘डैडी’ का एक बहुत भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है सूरज सनीम जी ने और इसके लिए संगीत दिया है राजेश रोशन जी ने| इस गीत को ज़नाब तलत अज़ीज़ जी ने बहुत भावपूर्ण तरीके से निभाया है|


इस फिल्म में अनुपम खेर जी ने एक गायक की भूमिका का निर्वाह बड़े प्रभावी ढंग से किया है, जो अपनी शराब की लत के कारण बर्बाद हो जाता है| इस गायक की लाड़ली बेटी की भूमिका पूजा भट्ट ने निभाई थी|


लीजिए प्रस्तुत है यह मार्मिक गीत –

आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे,
मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगें,
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|


मैं भटकता ही रहा दर्द के वीराने में,
वक्त लिखता रहा चेहरे पे हर-एक पल का हिसाब|
मेरी शोहरत मेरी दीवानगी की नज़्र हुई,
पी गई मय की ये बोतल मेरे गीतों के किताब|


आज लौटा हूँ तो हँसने की अदा भूल गया,
ये शहर भूला मुझे, मैं भी इसे भूल गया|


मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगें,
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|


मेरा फ़न फिर मुझे बाज़ार में ले आया है,
ये वो शै है कि जहाँ मेहर-ओ-वफ़ा बिकते हैं,
बाप बिकते हैं यहाँ लख्त-ए-जिगर बिकते हैं,
कोख बिकती है, दिल बिकते हैं, सर बिकते हैं|
इस बदलती हुई दुनिया का खुदा कोई नहीं
सस्ते दामो में हर रोज खुदा बिकते हैं |
बिकते हैं, बिकते हैं |


मेरे अपने मेरे होने के निशानी माँगें|
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|

हर खरीदार को बाज़ार में बिकता पाया,
हम क्या पाएँगे किसी ने है यहाँ क्या पाया|
मेरे एहसास मेरे फूल कहीं और चलें,
बोल पूजा मेरी बच्ची कहीं और चलें,
और चलें, और चलें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आवारा, छलिया, अनाड़ी, दीवाना!

हाल ही में मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी की पुण्य तिथि पर उनका एक गीत शेयर किया था| आज मन है कि स्वर्गीय राज कपूर जी के साथ उनके अंतरंग संबंध को याद करूं| राजकपूर जी के अधिकांश गाने मुकेश जी ने गाए थे| राज कपूर जी और मुकेश जी मानो दो जिस्म एक जान थे| जब मुकेश जी की मृत्यु हुई तब राज साहब ने कहा था कि मेरी तो आवाज़ ही चली गई! जिस्म रह गया है और आत्मा जा चुकी है| एक बड़ा ही सुरीला समूह था| राज साहब, मुकेश जी, शैलेंद्र-हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आदि|


मुकेश साहब क्योंकि राज साहब की फिल्मी यात्रा के हमसफर थे, इसीलिए यह गीत जिसमें राज साहब की कुछ भूमिकाओं का ज़िक्र किया गया है, कल्लू-क़व्वाल के बहाने से, इसे भी अभिव्यक्ति मुकेश जी ने दी है| वर्ष 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म- दूल्हा-दुल्हन के लिए, गुलशन बावरा जी का लिखा यह गीत मुकेश जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े सुंदर ढंग से – कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में गाया था| कल्याणजी आनंदजी का भी मुकेश जी के साथ काफी अच्छा साथ रहा है|

एक बात और राज कपूर साहब ने साधारण इन्सानों की भूमिकाएँ बहुत निभाई हैं, जैसे कोई गाँव से आया है नौकरी की तलाश में और कैसे सीधेपन से वह चालाकी की तरफ बढ़ता है| यहाँ तक कि जेबकतरा भी- ‘शहजादे तलवार से खेले, मैं अश्कों से खेलूँ’|


लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

मुझे कहते हैं कल्लू कव्वाल-कल्लू कव्वाल
कि तेरा मेरा तेरा मेरा साथ रहेगा|


मैं हूँ ठुमरी तो तू है ख़याल
तेरा मेरा साथ रहेगा|

मुझे कहते हैं कल्लू क़व्वाल|


-राजा मैं गीतों का तू सुर की रानी
तू सुर की रानी


गा के सुनाएं हम अपनी कहानी,
अपनी कहानी|

-तू मेरे गीतों की है ज़िंदगानी


-तेरे गीतों में
तेरे गीतों में है वो कमाल, ओ कल्लू कव्वाल
तेरा मेरा …


-सूरत से पहचाने, मुझको ज़माना
मुझको ज़माना|


आवारा छलिया अनाड़ी दीवाना
अनाड़ी दीवाना|


कैसा हूँ दिल का किसी ने न जाना|

-नहीं दुनिया में तेरी मिसाल ओ कल्लू कव्वाल
तेरा मेरा मेरा साथ रहेगा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तेरा मेला पीछे छूटा, राही चल अकेला!

फिल्म-संबंध, जो 1969 में रिलीज़ हुई थी, उसका एक गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत कविताएं लिखते थे, जैसे ‘आओ बच्चे तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की’ आदि-आदि| आज के इस गीत के लिए संगीत दिया है ओ पी नैयर जी का और इसे गाया है मेरे प्रिय गायक- मुकेश जी ने|


इस गीत में एक जीवन जीने का महत्वपूर्ण सिद्धान्त दर्शाया गया है, जैसा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ने भी लिखा था, ‘जदि तोर डाक सुनी केऊ न आशे, तबे एकला चलो रे’| इस गीत में भी यही कहा गया है की हजारों मील लंबे रास्ते हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं और हमें अकेले ही इन पर चलाने का साहस करना होगा|


लीजिए इस गीत का स्मरण कराते हैं-


चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा, राही चल अकेला|

हजारों मील लम्बे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुःख ना झेला|
चल अकेला…

तेरा कोई साथ ना दे तो खुद से प्रीत जोड़ ले,
बिछौना धरती का कर ले अरे आकाश ओढ़ ले,
यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला|

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अगर तू पास आ जाए तो हर गम दूर हो जाए!

आज मैं फिल्मी दुनिया के बहुत सृजनशील गीतकार स्वर्गीय आनंद बख्शी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बख्शी जी ने बहुत सारे हल्के-फुल्के गीत भी लिखे हैं लेकिन कुछ गीत बहुत सुंदर लिखे हैं|


आज का उनका यह गीत फिल्म- खिलौना में फिल्माया गया था, इसको लता मंगेशकर जी ने लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में बड़े खूबसूरत अंदाज़ में गाया था| इस फिल्म में संजीव कुमार जी, मुमताज़ जी, जितेंद्र जी आदि ने यादगार अभिनय किया था|


लीजिए प्रस्तुत है यह हृदयस्पर्शी गीत-


अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंजूर हो जाए,
सनम तू बेवफा के नाम से मशहूर हो जाए|

हमें फुरसत नहीं मिलती कभी आँसू बहाने से,
कई गम पास आ बैठे तेरे एक दूर जाने से,
अगर तू पास आ जाए तो हर गम दूर हो जाए|

वफ़ा का वास्ता देकर मोहब्बत आज रोती है,
ना ऐसे खेल इस दिल से, ये नाज़ुक चीज़ होती है,
ज़रा सी ठेस लग जाए तो शीशा चूर हो जाए|

तेरे रंगीन होठों को कंवल कहने से डरते हैं,
तेरी इस बेरूख़ी पे हम ग़ज़ल कहने से डरते हैं,
कहीं ऐसा ना हो तू और भी मग़रूर हो जाए|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ

आज फिर से मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का एक गीत याद आ रहा है| जिस प्रकार हमारे मन में अनेक भावनाएँ आती हैं, तब कभी हम उनको सीधे अपने शब्दों में व्यक्त कर देते हैं और कभी कुछ उपमाओं, उपमानों आदि का सहारा लेते हैं अपनी बात कहने के लिए और यह काम कविता में अधिक होता है|

आज मुकेश जी का एक ऐसा ही गीत याद आ रहा है, जिसमें आकाश में उड़ते पक्षियों के माध्यम से कवि ने प्रेमियों के मन की बात कही है| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘प्यासे पंछी’ से है और इसे महमूद जी पर फिल्माया गया है| इस गीत के लेखक हैं- कमर जलालाबादी जी और इसका संगीत दिया है कल्याणजी आनंदजी ने|

लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

प्यासे पंछी नील गगन में, गीत मिलन के गाएँ,
ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

ओ मतवाले राही तुझको मंज़िल तेरी बुलाए,
किसको ख़बर है इन राहों में कौन कहाँ मिल जाए|
जैसे सागर की दो लहरें चुपके से मिल जाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

छुपी हैं आहें किस प्रेमी की, बादल की आहों में,
बिखरी हुई है ख़ुश्बू कैसी, अलबेली राहों में|
किसकी ज़ुल्फ़ें छू कर आईं, महकी हुई हवाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ,

ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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हमको दिवाना तुमको, काली घटा कहेंगे!

हमारी फिल्में हों अथवा कहानी हो, उपन्यास हो, इन सबमें जीवन को ही तो चित्रित किया जाता है| और जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं| जैसे दर्द भरे नगमे भी हमारी फिल्मों में बहुत सारे हैं, देशभक्ति के भी हैं, किसी भी भाव के लिए, जो हमारे मन में आ सकता है, उससे जुड़े हुए गीत हमारी फिल्मों में मिल जाएंगे|


आज रोमांस और मस्ती से जुड़ा एक युगल गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा है और ‘गंगा की लहरें’ फिल्म के लिए किशोर कुमार जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े मस्ती भरे अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



-छेड़ो न मेरी जुल्फें,
सब लोग क्या कहेंगे|

-हमको दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-आती है शर्म हमको
रोको ये प्यारी बातें|

-जो तुम को जानते हैं,
वो जानते है तुम्हारी बातें|

तुम कह लो शर्म इसको
हम तो अदा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||


-मैं प्यार हूँ तुम्हारा
मेरा सलाम ले लो|


-तुम इस को प्यार समझो
तुम इसको
चाहत का नाम दे लो,
लेकिन ज़माने वाले
इस को खता कहेंगे|

-हम को दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-तौबा तेरी नज़र के
मस्ती भरे इशारे|


-देखेंगे हमको तुमको
जो मुस्करा के सारे,
उल्फत में दो दिलों को
बहका हुआ कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तुझको चलना होगा!

आज मैं 1970 में रिलीज़ हुई फिल्म- सफर का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस फिल्म में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर प्रमुख भूमिकाओं में थे और बहुत ही प्रभावशाली कहानी और अभिनय इस फिल्म की विशेषता थी|

जहां तक मुझे याद है यह फिल्म प्रेम त्रिकोण पर आधारित है, नायिका शर्मिला टैगोर अपने प्रेमी राजेश खन्ना को छोड़कर मजबूरी में फिरोज खान से शादी कर लेती है, परंतु जब उसको नायिका के राजेश खन्ना से सच्चे प्रेम की जानकारी मिलती है, तब वह आत्महत्या कर लेता है| बाद में राजेश खन्ना नायिका से मिलता भी है तो एक कैंसर मरीज के रूप में! नायिका एक चिकित्सक के रूप में, जी भरकर उसको बचाने के लिए मेहनत करती है, इस बीच वे बहुत निकट आ जाते हैं लेकिन अंततः नायक की मृत्यु हो जाती है| इस परिवेश में यह गीत अत्यंत प्रभाव छोड़ता है|

यह गीत लिखा हई इंदीवर जी ने और कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में इसे मन्ना डे जी ने बड़े प्रभावी ढंग से गाया है और ऐसा लगता है कि यह गीत उनके लिए ही बना था|

लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

 

 

नदिया चले, चले रे धारा,
चंदा चले, चले रे तारा,
तुझको चलना होगा|
तुझको चलना होगा|
ओहोहो …

 

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है,
आँधी से तूफां से डरता नहीं है,
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें,
हई रे हई रे
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें,
मंज़िल को तरसेंगी तेरी निगाहें,
तुझको चलना होगा|
तुझको चलना होगा|

 

पार हुआ वो, रहा वो सफ़र में,
जो भी रुका फिर गया वो भंवर में,
नाव तो क्या बह जाये किनारा
ओ … नाव तो क्या बह जाये किनारा,
बड़ी ही तेज़ समय की है धारा|
तुझको चलना होगा|
तुझको चलना होगा|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये!

एक बार फिर से मैं आज अपने सर्वाधिक प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुकेश जी दर्द भरे गीतों के सरताज माने जाते हैं लेकिन रोमांटिक गीत भी उन्होंने एक से एक अच्छे गाये हैं|

 

 

आज का यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘हॉलिडे इन बॉम्बे’ के लिए अंजान जी ने लिखा था और एन दत्ता के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज में इसे गाया था|

प्रस्तुत है उस अमर गायक की याद में यह गीत-

 

आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये,
आँख का काजल क्यूँ शरमाये,
आखिर क्या है बात हंसी क्यूँ
होठों तक आ कर रुक जाये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

बदली नजर, बदली अदा, आज है हर अंदाज़ नया|
दिल की लगी छुप न सकी,
राज़ ये आखिर खुल ही गया|
रंग बदल कर किधर चली हो,
बदन समेटे, नजर चुराये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये||

 

महकी हवा, बहकी घटा,
ये आलम, ये मदहोशी|
चुप न रहो, कुछ तो कहो,
तोड़ भी दो ये ख़ामोशी|
ये मौसम, ये घडी मिलन की,
रोज कहा जीवन में आये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

दिल को मेरे मिल ही गया,
साथी प्यार की राहों का|
साथ कभी छूटे ना, इन लहराती बाँहों का|
अब न जुदा हों दिल से तेरी,
बलखाती जुल्फों के साये|
आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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