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चोट और टूटना दिल का!

जोश मलीहाबादी जी का प्रसिद्ध शेर है, जिसे गुलाम अली साहब ने एक ग़ज़ल के शुरू में गाया है-

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया|

वास्तव में जब सर्दी पड़ती है तब पुरानी चोटें भी कसकती हैं| हम अक्सर देखते हैं कि हमारे खिलाड़ियों को चोट लग जाती है और वे कुछ मैच नहीं खेल पाते| कभी-कभी तो कोई चोट किसी के खेल जीवन पर पूर्ण विराम भी लगा देती है|


जीवन को भी तो एक खेल ही कहा जाता है और इस खेल में भी चोट लगना स्वाभाविक ही है| हाँ जीवन के इस खेल में चोटें शरीर के मुक़ाबले मन पर या कहें कि ‘दिल’ पर अधिक लगती हैं|

फिर ग़ुलाम अली जी की गायी हुई एक ग़ज़ल के शेर याद आ रहे हैं, यह ग़ज़ल मसरूर अनवर जी की लिखी हुई है-


नफ़रतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में,
हमने किस-किसको पुकारा, ये कहानी फिर सही|

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने,
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही|

एक अक्सर सुना हुआ शेर याद आ रहा है-


इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं, किस क़दर चोट खाए हुए हैं,
मौत ने हमको बख्शा है लेकिन, ज़िंदगी के सताए हुए हैं|


और मेरे प्यारे मुकेश जी के गाये हुए गीत तो कई याद आते हैं-


मेरे टूटे हुए दिल से, कोई तो आज ये पूछे
कि तेरा हाल क्या है|

अथवा-

वो तेरे प्यार का ग़म, इक बहाना था सनम,
अपनी क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी
की दिल टूट गया
|

वैसे चोट लगने, और कुछ टूटने (वैसे यहाँ ज़िक्र दिल का है) के बीच काफी फासला हो सकता है, कभी तो इंसान पूरी उम्र चोट खाते-खाते, शेरशाह सूरी बना रह सकता है और कभी पहली चोट में भी धराशायी भी हो सकता है|
अब चोट ही है जो जब दिखाई देती है तो ज़ख्म कहलाती है, एक फिल्मी गीत की पंक्ति याद आ रही है-

इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह,
अबरू की कटारी को दो, आब और जियादा|

ये बात तो चलती ही जा सकती है, अंत में फिर से मुकेश जी के गाये गीत की पंक्तियों के साथ आज की बात समाप्त करूंगा, वैसे मूड बना तो बाद में भी इसी विषय पर बात कर सकता हूँ| तो अंत में प्रस्तुत हैं-

तीर आँखों के जिगर के पार कर दो यार तुम,
जान मांगो या तो जां को निसार कर दो यार तुम|

हम तुम्हारे सामने हैं, फिर तुम्हें डर काहे का,
शौक से अपनी नज़र के वार कर दो यार तुम
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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शाम आई-याद आई!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है, एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-



कविताओं और फिल्मी गीतों में शाम को अक्सर यादों से जोड़ा जाता है। यह खयाल आता है कि ऐसा क्या है, जिसके कारण शाम यादों से जुड़ जाती है! यहाँ दो गीत याद आते हैं जो शाम और यादों का संबंध दर्शाते हैं। एक गीत रफी साहब का गाया हुआ, जिसकी पंक्तियां हैं-

हुई शाम उनका खयाल आ गया,
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया।


अभी तक तो होंठों पे था, तबस्सुम का इक सिलसिला,
बहुत शादमां थे हम उनको भुलाकर, अचानक ये क्या हो गया,
कि चेहरे पे रंज़-ओ-मलाल आ गया।
हुई शाम उनका खयाल आ गया॥


हमें तो यही था गुरूर, गम-ए-यार है हमसे दूर,
वही गम जिसे हमने किस-किस जतन से, निकाला था इस दिल से दूर,
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया।
हुई शाम उनका खयाल आ गया॥


लगता यही है कि दिन होता है गतिविधियों के लिए, जिनमें व्यक्ति व्यस्त रहता है, शाम होती है तो इंसान क्या पशु-पक्षी भी अपने बसेरों की ओर लौटते हैं। यह समय काम का नहीं सोचने का, चिंता का होता है। एक कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है,
बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झांक रहे होंगे,
यह ध्यान परों में पंछी के, भरता कितनी चंचलता है।
हो जाए न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं,
यह सोच थका दिन का पंथी, भी जल्दी-जल्दी चलता है।


खैर मैं बात कुछ और कर रहा था, ये पंक्तियां अचानक याद आ गईं, क्योंकि ये भी शाम और चिंता का संबंध जोड़ती हैं। हाँलाकि इसमें याद उन लोगों की आ रही है, जो अभी भी साथ हैं, शायद घर पर इंतज़ार कर रहे हैं।

शाम और याद के संबंध में दूसरा गीत जो याद आ रहा है, वो मुकेश जी का गाया हुआ फिल्म ‘आनंद’ का गीत है-

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
शाम की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए,
मेरे खयालों के आंगन में, कोई सपनों के दीप जलाए।


कभी यूं ही, जब हुईं बोझल सांसें, भर आईं बैठे-बैठे जब यूं ही आंखें।
तभी मचल के, प्यार से चलके, छुए कोई मुझे पर नज़र न आए।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।


कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी ये उलझन, बैरी अपना मन, अपना ही होके सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।


दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे, हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने, मुझसे जुदा न होंगे, इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए॥


वैसे देखें तो शाम का और यादों का संबंध जोड़ने वाले बहुत सारे गीत मिल जाएंगे, और जब ये मर्ज़ बढ़ता है, तब तो पूरी रात भी जागकर गुज़रने लगता है, और इंसान तारों की चिंता करके उनसे कहने लगता कि यार तुम तो सो जाओ!

आज की शाम के लिए इतनी चिंता ही काफी है!
नमस्कार
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तुम जो न सुनते, क्यों गाता मैं!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।



मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया।

शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया।

सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-


तुम जो हमारे मीत न होते
गीत ये मेरे- गीत न होते।


तुम जो न सुनते,
क्यों गाता मैं,
दर्द से घुट कर रह जाता मैं।
सूनी डगर का एक सितारा-
झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।


एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-


मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-
कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम
अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,
कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।


है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।


शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-


याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,
दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!


जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,
हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा!


बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,
क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।


और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-
जीना इसी का नाम है।


रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,
जिंदा है हमीं से नाम प्यार का|


किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,
मर के भी किसी को याद आएंगे,
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है।


या फिर-


इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-
वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-


जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,
ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।


चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।


और अंत में-


तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,
अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।


सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।


ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।


मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।

नमस्कार।

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छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है-

मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो!

अब हर समय व्यावहारिक बना रहे तो कवि-शायर क्या हुआ, सामान्य जीवन में, सभी लोग वैसे भी कहीं न कहीं धोखा खाते ही हैं और कुछ लोग जो ज्यादा भरोसा करने वाले होते हैं, वो खाते ही रहते हैं।

इसीलिए शायद कविवर रवींद्र नाथ ठाकुर ने लिखा था-

जदि तोर डाक सुनि केऊ ना आशे, तबे एकला चलो रे!

इसी बात को एक हिंदी फिल्मी गीत में बड़ी खूबसूरती से दोहराया गया है-

चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला
तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला।

हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का, तूने कहाँ है खेला।

 

जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल है, शायर शायद बहुत मशहूर नहीं हैं- अमजद इस्लाम ‘अमजद’, इस गज़ल में कुछ बहुत अच्छे शेर हैं जिनको जगजीत जी ने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया है-

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले।

फस्ल-ए-गुल आई है फिर आज असीराने वफा
अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले।

दिल ने इक ईंट से तामीर किया ताजमहल
तूने इक बात कही, लाख फसाने निकले।

दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिजरा में खड़ा सोचता हूँ
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले।

आज यही भाव मन पर अचानक छा गया, बड़ा सुंदर कहा गया है इस गज़ल में, खास तौर पर आखिरी शेर में- अकेलेपन के जंगल में खड़ा हुआ मैं सोचता हूँ कि कैसे लोग थे जो मेरा साथ निभाने चले थे!

जीवन में जो बहुत से रंग-बिरंगे भावानुभव होते हैं, उनमें से यह भी एक है और यह काफी बार सामने आने वाला भाव है। और यह ऐसा भाव है जिसे मीना कुमारी जैसी महान कलाकार को भी भरपूर झेलना पड़ा है। उनके ही शब्दों मे आइए पढ़ते हैं-

चांद तन्हा है आस्मां, तन्हा
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा।

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआं तन्हा।

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा।

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे कहाँ तन्हा।

जलती-बुझती सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा।

राह देखा करेगा सदियों तक,
छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा।

तन्हाई, अकेलापन, बेरुखी- ये तो सबको झेलने पड़ते हैं, लेकिन मीना कुमारी जी जैसा कोई महान कलाकार ही यह दावा कर सकता है कि ‘छोड़ जाएंगे ये जहाँ तन्हा’ ।

नमस्कार।

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