Categories
Uncategorized

वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ!

आज उर्दू के उस्ताद शायर रहे ज़नाब फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| एक खास बात ये है की हिन्दी के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी भी अंग्रेजी के प्रोफेसर थे और ज़नाब फ़िराक़ गोरखपुरी साहब भी|


लीजिए आज प्रस्तुत है, फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की ये खूबसूरत ग़ज़ल-



सितारों से उलझता जा रहा हूँ,
शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ|

तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ,
जहाँ को भी मैं समझा रहा हूँ|

यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है,
गुमाँ ये है कि धोखे खा रहा हूँ|

अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट,
ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूँ|

हदें हुस्न-ओ-इश्क़ की मिलाकर,
क़यामत पर क़यामत ढा रहा हूँ|


ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत,
तेरे हाथों मैं लुटता जा रहा हूँ|

असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का,
तुझे कायल भी करता जा रहा हूँ|

भरम तेरे सितम का खुल चुका है,
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ|

तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस,
कि तुझसे दूर होता जा रहा हूँ|

जो उलझी थी कभी आदम के हाथों,
वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ|


मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है,
तुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँ|

ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप,
“फ़िराक़” अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********