भूलता-सा जा रहा हूँ!

मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है,
तुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

आज तक सुलझा रहा हूँ!

जो उलझी थी कभी आदम के हाथों,
वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

आज क्यों शर्मा रहा हूँ!

भरम तेरे सितम का खुल चुका है,
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ|

फ़िराक़ गोर
खपुरी