शबनम फूल के प्यालों में!

यूँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम,
जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में|

बशीर बद्र

तितली को न फूलों से उड़ाया जाए!

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं,
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए|

निदा फ़ाज़ली

किरन फूल की पत्तियों में दबी!

किरन फूल की पत्तियों में दबी,
हँसी उस के होंठों पे आई हुई|

बशीर बद्र

गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है!

जो भी गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है,
वो मेरी तंगी-ए-दामाँ का गिला करता है|

क़तील शिफ़ाई

फूल चट्टान पर खिला देखा!

संगदिल को हमारी याद आई,
फूल चट्टान पर खिला देखा।

नक़्श लायलपुरी

इक कली खिल गई एक मुरझा गई!

मौत और ज़िन्दगी क्या हैं इसके सिवा,
इक कली खिल गई एक मुरझा गई।

नक़्श लायलपुरी

वो ख़ंजर लेके आया है!

तबस्सुम उसके होठों पर है उसके हाथ में गुल है,
मगर मालूम है मुझको वो ख़ंजर लेके आया है|

राजेश रेड्डी

न कहा हुआ न सुना हुआ!

कोई फूल धूप की पत्तियों में, हरे रिबन से बंधा हुआ।
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ।

बशीर बद्र