मैं वो ख़ार नहीं हूँ!

वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है,
उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ|

अकबर इलाहाबादी

वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू!

वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू,
गाह गुल गाह रात-रानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है!

अगर तबस्सुम-ए-ग़ुंचा की बात उड़ी थी यूँही,
हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है|

राही मासूम रज़ा

ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला!

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत,
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला|

अहमद फ़राज़

सुना भी नहीं देखा भी नहीं!

अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं,
तूने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं|

फ़िराक़ गोरखपुरी

आग बुझा देनी चाहिए!

मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब,
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए|

राहत इंदौरी

शबनम फूल के प्यालों में!

यूँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम,
जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में|

बशीर बद्र

तितली को न फूलों से उड़ाया जाए!

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं,
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए|

निदा फ़ाज़ली

किरन फूल की पत्तियों में दबी!

किरन फूल की पत्तियों में दबी,
हँसी उस के होंठों पे आई हुई|

बशीर बद्र