काँटों से दोस्ती कर ली!

मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली,
इसी तरह से बसर हम ने ज़िंदगी कर ली|

कैफ़ी आज़मी

चिड़ियों को आज़ाद किया!

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से,
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया|

निदा फ़ाज़ली

कौन कहता है ये कड़े हैं पेड़!

कोंपलें फूल पत्तियाँ देखो,
कौन कहता है ये कड़े हैं पेड़|

सूर्यभानु गुप्त

खिलते हैं मगर शाम के बाद!

तेज़ हो जाता है ख़ुशबू का सफ़र शाम के बाद,
फूल शहरों में भी खिलते हैं मगर शाम के बाद|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

कोई भी फूल मुरझाया न था!

सिर्फ़ ख़ुश्बू की कमी थी ग़ौर के क़ाबिल ‘क़तील’,
वर्ना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था|

क़तील शिफ़ाई

रंग तेरी हँसी से मिलता है!

आज क्या बात है कि फूलों का,
रंग तेरी हँसी से मिलता है|

जिगर मुरादाबादी

तमाम ग़ुंचे तो खिला नहीं करते!

हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है,
तमाम ग़ुंचे तो ‘अमजद’ खिला नहीं करते|

अमजद इस्लाम अमजद

मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन!

ख़ुशबू की तरह गुज़रो मिरी दिल की गली से,
फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन|

अमजद इस्लाम अमजद

चढ़ गया ज़हर गुल मसलते ही!

ख़ून सा लग गया है हाथों में,
चढ़ गया ज़हर गुल मसलते ही|

मुनीर नियाज़ी

उसके बदन की तराश ऐसी है!

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है,
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं|

अहमद फ़राज़