प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं!

दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं,
हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं|

अब्बास ताबिश

कोसों तलक जंगल हरा होता!

बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता,
जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता|

चकबस्त बृज नारायण

कब लोग रिहाई पाएँगे!

परछाईं के इस जंगल में क्या कोई मौजूद नहीं,
इस दश्त-ए-तन्हाई से कब लोग रिहाई पाएँगे|

राही मासूम रज़ा

तिश्नगी तो मुझे ज़िंदगी से प्यारी है!

इसी से जलते हैं सहरा-ए-आरज़ू में चराग़,
ये तिश्नगी तो मुझे ज़िंदगी से प्यारी है|

वसीम बरेलवी

दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की!

ऐ मिरे अब्र-ए-करम देख ये वीराना-ए-जाँ,
क्या किसी दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की|

अहमद फ़राज़

तुमने गुज़ारी रात कहाँ!

ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ,
हमने तो सहरा में बसर की तुमने गुज़ारी रात कहाँ|

राही मासूम रज़ा

खोया हुआ सा कुछ!

होता है यूँ भी, रास्ता खुलता नहीं कहीं,
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ|

निदा फ़ाज़ली

तामीर की हसरत भी थी!

जो हवा में घर बनाया काश कोई देखता,
दश्त में रहते थे पर तामीर की हसरत भी थी|

मुनीर नियाज़ी

इक दश्त बचा है मुझमें!

इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं,
अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें|

राजेश रेड्डी