Categories
Uncategorized

जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री राजेश जोशी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, रचना अपनी बात स्वयं कहती है, इसलिए मैं अलग से कुछ नहीं कहूँगा, कुल मिलाकर यह विपरीत स्थितियों का सामना स्वाभिमान और खुद्दारी के साथ करने का संदेश देने वाली रचना है|


लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री राजेश जोशी जी की यह रचना –

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे

कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे,
जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे|

बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो
उनकी कमीज से ज्‍यादा सफ़ेद,
कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएँगे

धकेल दिये जाएंगे कला की दुनिया से बाहर,
जो चारण नहीं होंगे
जो गुण नहीं गाएंगे, मारे जाएँगे|


धर्म की ध्‍वजा उठाने जो नहीं जाएँगे जुलूस में,
गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिये जाएँगे|

सबसे बड़ा अपराध है इस समय, निहत्थे और निरपराधी होना,
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Categories
Uncategorized

हमारी आस्थाओं का गणतंत्र !

एक बार हम फिर से लोकतंत्र और सामाजिक विकास में अपनी दृढ़ आस्थाओं को अभिव्यक्त करने का पर्व, गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं| एक बार फिर लोकतंत्र विरोधी ताक़तें राजधानी दिल्ली के आसपास सड़कों को घेरकर बैठी हैं, इस बार उन्होंने किसानों को अपना मोहरा बनाया है| पिछले वर्ष तो कोरोना फैलने के कारण उनको इससे पहले ही आंदोलन खत्म कर देना पड़ा था, इस बार वे अभी तक जमे हैं और अपनी अलग ट्रैक्टर रैली निकाल रहे हैं|

खालिस्तानी संगठन ने उनसे अपील की है कि ट्रैक्टर रैली में राष्ट्रीय तिरंगा लेकर न निकलें| इस पर भी महान लिबरल लोगों को कोई ऐतराज नहीं होगा|


मैं एक मत अपना स्पष्ट रूप से व्यक्त करना चाहता हूँ कि प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव जैसे लोग ‘पाँच सितारा किस्म के देशद्रोही हैं| ऐसे लोगों को शायद भारत में ही बर्दाश्त किया जा सकता है| यह भारत में ही हो सकता है कि हिन्दू आस्थाओं पर चोट करके लोग हीरो बन सकते हैं|

मुझे याद है जब मैं छोटा था किसी ने पैगंबर मुहम्मद साहब की काल्पनिक तस्वीर पुस्तक में छाप दी थी| लोगों ने उसकी विशाल प्रेस में आग लगा दी थी| यहाँ हिन्दू आस्थाओं पर चोट करना तो एक सेक्युलर क्रिया है, बाकी किसी के बारे में ऐसा कुछ करके देखो!


अमेरिका में नए राष्ट्रपति ने बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ ली, क्या किसी लिबरल के मुंह में जमा हुआ दही पिघला! हिंदुस्तान में अगर कोई नेता गीता या रामचरित मानस पर हाथ रखकर शपथ लेगा तो ये ‘लिबरल’ लोग बांस पर चढ़ जाएंगे और कहेंगे कि लोकतंत्र खतरे में आ गया है|


पिछले काफी समय से भारत में ये महान लिबरल लोग ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं| इसके लिए वे योजनाबद्ध तरीके से आस्थाओं पर चोट करते हैं| जैसे वे कहेंगे कि ईश्वर कोई नहीं होता! चलिए ईश्वर में बहुत से लोगों का विश्वास नहीं होता, यद्यपि उनका लक्ष्य सिर्फ हिन्दू आस्था पर चोट करना ही होता है| फिर वे कहते हैं देश कुछ नहीं होता, यह केवल भौगोलिक सीमा मात्र है, संस्कृति कुछ नहीं होती, राष्ट्रभक्ति कुछ नहीं होती| यही काम लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजों की शिक्षा पद्यति विकसित करते हुए किया था ताकि लोगों में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र गौरव की भावना न रहे और वे आराम से गुलामी स्वीकार कर लें|


बातें बहुत सी हो सकती हैं, लेकिन ऐसे ही लोकतंत्र के इस महापर्व के अवसर पर, दुराग्रहपूर्ण तरीके से सड़कों को घेरकर बैठे और एक देशप्रेमी पत्रकार के तथाकथित चैट लीक होने पर, पाकिस्तान के साथ मिलकर खुशी मनाने वाले लोगों का ताली पीटना यही बताता है कि हमारी उदारता का फायदा उठाकर यहाँ लोग देशद्रोह की सीमा तक जाने को तैयार हैं| इन लोगों को उन पत्रकारों से कोई दिक्कत नहीं होती जो ज़िंदगी भर सत्ता की दलाली करके सुविधाएं और पुरस्कार प्राप्त करते हैं और फिर मौका आने पर एवार्ड वापसी का नाटक करते हैं| भारतीय लोकतंत्र के हित में होगा कि ऐसे लोगों को उनकी सीमा ठीक से समझाई जाए|


सभी देशभक्तों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई|

***********

Categories
Uncategorized

स्वतन्त्रता- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Freedom’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

स्वतंत्रता!

भय से मुक्ति ही वह स्वतंत्रता है
जिसकी मैं अपनी मातृभूमि के लिए मैं मांग करता हूँ!
युगों-युगों के उस भार से मुक्ति, जो आपके शीश को झुकाता है,
आपकी कमर तोड़ता है, आपकी आँखों को भविष्य की मांग दर्शाते संकेत
देखने में असफल बना देता है;
निद्रा के बंधनों से मुक्ति, जहां आप स्वयं को रात्रि की
निश्‍चलता के बंधनों को सौंप देते हो,
उस सितारे पर अविश्वास करते हुए, जो सत्य के साहसिक पथ और
प्रारब्ध की अराजकता से मुक्ति के बारे मे बताता है,
सभी नौकाएँ कमजोर होकर दिशाहीन अनिश्चित हवाओं के हवाले हो जाती हैं,
और ऐसे हाथ में पड़ जाती हैं जो सदा मृत्यु की तरह कठोर और ठंडे रहते हैं|
कठपुतलियों की दुनिया में रहने के अपमान से मुक्ति,
जहां सभी गतिविधियां मस्तिष्कहीन तारों के माध्यम से प्रारंभ होती हैं,
और फिर जड़बुद्धि आदतों के माध्यम से दोहराई जाती हैं,
जहां आकृतियाँ धैर्य और आज्ञाकारिता के साथ,
प्रदर्शन के स्वामी की प्रतीक्षा करते हैं,
कि वह उनको हिला-डुलाकर जीवन स्वांग प्रस्तुत करे|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Freedom

Freedom from fear is the freedom
I claim for you my motherland!
Freedom from the burden of the ages, bending your head,
breaking your back, blinding your eyes to the beckoning
call of the future;
Freedom from the shackles of slumber wherewith
you fasten yourself in night’s stillness,
mistrusting the star that speaks of truth’s adventurous paths;
freedom from the anarchy of destiny
whole sails are weakly yielded to the blind uncertain winds,
and the helm to a hand ever rigid and cold as death.
Freedom from the insult of dwelling in a puppet’s world,
where movements are started through brainless wires,
repeated through mindless habits,
where figures wait with patience and obedience for the
master of show,
to be stirred into a mimicry of life.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

Categories
Poetry Uncategorized

जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं!

आज फिर से दुष्यंत कुमार जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के एक प्रतिनिधि कवि थे लेकिन उनको सामान्य जनता के बीच विशेष ख्याति आपातकाल में लिखी गई गज़लों के कारण मिली थी, जिनको बाद में एक संकलन – ‘साये में धूप’ के रूप में प्रकाशित किया गया|


प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी के इसी संकलन से यह गजल-


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं|

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं|

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने,
उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं|

मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं|

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भूल कर खाने लगे हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है!

दुष्यंत कुमार जी हिंदी के एक श्रेष्ठ रचनाकार रहे हैं, हिंदी कविता में उनका अच्छा-खासा योगदान है लेकिन आम जनता के बीच उनको विशेष ख्याति उस समय मिली जब उन्होंने आपात्काल में विद्रोह का स्वर गुंजाने वाली गज़लें लिखीं, बाद में इन गज़लों को एक संग्रह में सम्मिलित किया गया, जिसका शीर्षक है- ‘साये में धूप’। इस संग्रह में एक से एक बेहतरीन गज़लें थीं।

मैंने पहले भी उनकी कुछ श्रेष्ठ गज़लों को अपने ब्लॉग में शामिल किया है, आज प्रस्तुत है दुष्यंत जी की यह गज़ल-

 

 

ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं है,
एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है।

 

राम जाने किस जगह होंगे क़बूतर,
इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है।

 

आपसे मिल कर हमें अक्सर लगा है,
हुस्न में अब जज़्बा—ए—अमज़द नहीं है।

 

पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे,
रास्तों में एक भी बरगद नहीं है।

 

मैकदे का रास्ता अब भी खुला है,
सिर्फ़ आमद—रफ़्त ही ज़ायद नहीं।

 

इस चमन को देख कर किसने कहा था,
एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है।

 

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

*****