कलम सरकंडे की!

श्री रामदरश मिश्र जी हिन्दी के उन श्रेष्ठ श्रेष्ठ रचनाकारों में से एक हैं, जिन्होंने कविता, कहानी और उपन्यास सभी क्षेत्रों में अपनी रचनाओं के माध्यम से उल्लेखनीय योगदान किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता जो कविधर्म की ओर बड़े सधे और शालीन ढंग से स्पष्ट संकेत करती है –

हमारे हाथ में सोने की नहीं
सरकंडे की कलम है।

सरकंडे की कलम
खूबसूरत नहीं, सही लिखती है
वह विरोध के मंच लिखती है
प्रशस्ति-पत्र नहीं लिखती है

हम कठघरे में खड़े हैं, खड़े रहेंगे
और कठघरे में खड़े हर उठे हुए हाथ को
अपने हाथ में ले लेंगे

राजा कौरव हों या पांडव—
हम तो सदा वनवास ही झेलेंगे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चेतावनी!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ कवि, गीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो पटना निवासी हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र हैं और मुझको, उनको अपना मित्र कहने में गर्व का अनुभव होता है| यद्यपि 11 साल पहले एनटीपीसी से सेवानिवृत्त होने के और गोवा में आकर बस जाने के बाद, अब किसी से मेरा संपर्क नहीं रहा है|

लीजिए आज श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत प्रस्तुत है, जिसका कथ्य स्वतः स्पष्ट है –

ख़बरदार
‘राजा नंगा है‘…
मत कहना

राजा नंगा है तो है
इससे तुमको क्या
सच को सच कहने पर
होगी घोर समस्या
सभी सयाने चुप हैं
तुम भी चुप रहना

राजा दिन को रात कहे तो
रात कहो तुम
राजा को जो भाये
वैसी बात करो तुम
जैसे राखे राजा
वैसे ही रहना
राजा जो बोले
समझो कानून वही है
राजा उल्टी चाल चले
तो वही सही है
इस उल्टी गंगा में
तुम उल्टा बहना

राजा की तुम अगर
खिलाफ़त कभी करोगे
चौराहे पर सरेआम
बेमौत मरोगे
अब तक सहते आये हो
अब भी सहना ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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