वैसी अदावत नहीं रही!

कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे,
कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही|

दुष्यंत कुमार

यारों ने भी दिल तोड़ दिया है!

अग़्यार का शिकवा नहीं इस अहद-ए-हवस में,
इक उम्र के यारों ने भी दिल तोड़ दिया है|

महेश चंद्र नक़्श

मगर दिल को दुखाने नहीं आते!

अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गए हैं,
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते|

बशीर बद्र

सायों को गले लगा रहा हूँ!

आया न ‘क़तील’ दोस्त कोई,
सायों को गले लगा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

मिल के बिछड़ना ज़रूर था!

दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,
दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था|

आनंद नारायण मुल्ला

घर आओ तो यारों की तरह!

हमसे दरवेशों के घर आओ तो यारों की तरह,
हर जगह ख़स-ख़ाना ओ बर्फ़ाब मत देखा करो|

अहमद फ़राज़

लोगों से याराना चाहिए!

चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं,
कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए|

निदा फ़ाज़ली

वहाँ शैख़-ओ-बरहमन की-

ब-नाम-ए-कुफ्र-ओ-ईमाँ बे-मुरव्वत हैं जहाँ दोनों,
वहाँ शैख़-ओ-बरहमन की शनासाई भी होती है|

क़तील शिफ़ाई

सच बोलकर दुश्मन कमाने चाहिएँ!

दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त,
रोज़ इक सच बोलकर दुश्मन कमाने चाहिएँ|

राजेश रेड्डी

कोई ज़ख़्म लगाते जाते!

अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत करके,
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते|

राहत इन्दौरी