सच बोलकर दुश्मन कमाने चाहिएँ!

दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त,
रोज़ इक सच बोलकर दुश्मन कमाने चाहिएँ|

राजेश रेड्डी

कोई ज़ख़्म लगाते जाते!

अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत करके,
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते|

राहत इन्दौरी

कल रात की तौबा!

एक पुरानी घटना याद आ गई और उसके साथ ही ये खयाल आया कि दुनिया कितनी बदल गई है| कला की सारी सौगातें, गीत-संगीत तो सब वही हैं लेकिन टेक्नोलॉजी और उसका आम आदमी द्वारा उपयोग कितना बदल गया है, बस यही खयाल आया इस घटना को याद करके|



मैं एनटीपीसी में राजभाषा के क्षेत्र में काम करता था| वैसे तो सरकारी संस्थानों में राजभाषा का क्षेत्र ऐसा है कि यहाँ कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता, आंकड़ों में दिखाने की महारत हो तो रिपोर्ट आप, अपनी झूठ बोलने की क्षमता के अनुसार तैयार कर सकते हैं, क्योंकि यहाँ आपके हाथ में कुछ भी नहीं है, आप सिर्फ निवेदन कर सकते हैं और ये उम्मीद आपसे की जाती है कि आप रिपोर्ट में बढ़िया स्थिति दर्शाएं|

अब याद आ गई है उस जमाने की तो यह संतोष होता है कि मैं पत्रिका आदि प्रकाशित करके, कवि सम्मेलनों का आयोजन करके अपनी पसंद के कुछ काम कर सकता था और यह दर्द भी झलकता है कि अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले मानो मुंबई की ‘फास्ट लोकल’ थे जो तेजी से आगे निकल जाते थे और आप हर जगह रुकते हुए ‘स्लो लोकल’ की तरह ही आगे बढ़ते थे|

एक बात और कि अन्य क्षेत्र में काम करने वालों के लिए प्रशिक्षण आदि के नाम पर विदेश दौरे भी उपलब्ध थे, वहीं राजभाषा अधिकारियों के लिए कंपनी की ही विभिन्न परियोजनाओं में आयोजित होने वाले राजभाषा सम्मेलन ही विभिन्न परियोजनाओं में जाने का साधन थे जो सामान्यतः बड़े शहरों से दूर होते हैं और हाँ कुछ निजी संस्थानों द्वारा कुछ पर्यटन स्थलों पर राजभाषा सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, जिनमें अगर राजभाषा अधिकारियों को भाग लेने की अनुमति मिल जाए तो वह एक दुर्लभ अवसर होता था| ऐसे कुछ अवसरों का लाभ मैंने भी उठाया था और आज एक ऐसे ही अवसर के बहाने से बात कर रहा हूँ, जो अचानक याद आ गया|

हाँ तो प्रसंग कुछ ऐसा है कि पांडिचेरी में एक राजभाषा सम्मेलन का आयोजन था जिसमें भाग लेने के लिए मेरी परियोजना की ओर से मैंने अपना नामांकन करा लिया था| ऐसे आयोजनों का उद्देश्य भी वैसे राजभाषा के बहाने पैसा कमाना ही होता है, जिसे एक बड़े उद्देश्य के साथ जोड़कर प्रचारित किया जाता है| हाँ तो मैं शायद दिल्ली से चेन्नई की ट्रेन में बैठा था, एसी टू टियर में सोता हुआ जा रहा था तभी भोपाल से एक सज्जन बगल की बर्थ पर आए दाढ़ी काफी बढ़ी हुई थी जिसके कारण शुरू में यह पहचानना मुश्किल था कि वह मेरे साथ एनटीपीसी में काम कर चुके अखिलेश जैन थे, जो अब भोपाल की एक कंपनी में कार्य कर रहे थे और अपनी कंपनी में अन्य कामों के साथ वो राजभाषा का काम भी देख रहे थे और उनकी मंजिल भी वह राजभाषा सम्मेलन ही था, जिसमें मैं जा रहा था|

मैं यहाँ इस राजभाषा सम्मेलन के बारे में कुछ बताने नहीं जा रहा, छोटी सी बात जो याद आई थी बस अब वही बताकर बात पूरी करूंगा| चेन्नई से हमको पांडिचेरी जाना था, वहाँ जिस होटल में हमारे रुकने की व्यवस्था आयोजकों द्वारा की गई थी, दोनों ने वहाँ जाने के लिए टैक्सी भाड़े पर ली, अखिलेश जानते थे कि मुझे मुकेश जी के फिल्मी गीत गाने का शौक था तो रास्ते में मैंने कई गीत गए, उनमें से ही एक गीत जो मुझे अत्यंत प्रिय है वह था ‘याद आई आधी रात को कल रात की तौबा, दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा’| बहुत प्यारा गीत है ये जिसमें ये दिखाया गया है कि कैसे कोई शराबी रोज न पीने की कसम खाता है और रोज भूल जाता है|

खैर प्रसंग मात्र इतना सा है कि अखिलेश बोले कि यह गीत फिल्म- ‘तीसरी कसम’ का है, मैंने यह फिल्म देखी है और मुझे पूरा भरोसा था कि यह इस फिल्म का गीत नहीं था, लेकिन किस फिल्म का था ये मुझे याद नहीं था| अखिलेश शर्त लगाने को तैयार थे कि यह गीत उसी फिल्म का है और मुझे पूरा विश्वास था कि उस फिल्म के देहाती नायक के साथ इस गीत का कोई तालमेल ही नहीं है, लेकिन उस समय इसका कोई फैसला हम नहीं कर पाए|

मैं कहना क्या चाह रहा था इस आलेख में! मुझे याद नहीं आ रहा कि उस समय हम लोग मोबाइल फोन रखते थे या नहीं, ये वर्ष 2000 से पहले की बात है, हम फोन रखते भी हों तो शायद सिर्फ बात करने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते होंगे| आज इस गीत का जिक्र आया तो तुरंत गूगल पर देखकर मैं बता सकता हूँ कि ये गीत फिल्म- ‘कन्हैया’ का गीत है| यही नहीं दुनिया की लगभग हर जानकारी आज के बच्चे आज गूगल पर तुरंत प्राप्त कर सकते हैं, हम भले ही आज भी इस मामले में कुछ पिछड़े रह जाएं!

ऐसे ही याद आया कि साहित्य, कला, संगीत आदि में शायद हम यह गर्व कर सकते हैं कि पूर्व में बहुत महान उपलब्धियां हुई हैं लेकिन टेक्नोलॉजी तो आज की ही चीज़ है और इस क्षेत्र में नित्य नई उपलबधियां हो रही हैं|

ऐसे ही आज इस प्रसंग के बहाने कुछ बात कहने का मन हुआ जी और वह बात अब पूरी हो गई है|

नमस्कार|
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अपनी भी तबियत नहीं मिलती!

कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी खफा हैं,
हर एक से अपनी भी तबियत नहीं मिलती|

निदा फ़ाज़ली

दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे!

जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे,
दुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करूँ|

राजेश रेड्डी

दिन दिवंगत हुए!

मेरे लिए बड़े भाई और गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी ने बहुत सुंदर गीत लिखे हैं और हम युवावस्था में उनके गीत गुनगुनाते रहते थे, जैसे- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह रचना –

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए!

हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए
दिन दिवंगत हुए!

शीश पर सूर्य को जो सँभाले रहे
नैन में ज्योति का दीप बाले रहे
और जिनके दिलों में उजाले रहे
अब वही दिन किसी रात की भूमि पर
एक गिरती हुई शाम की छत हुए!
दिन दिवंगत हुए!


जो अभी साथ थे, हाँ अभी, हाँ अभी
वे गए तो गए, फिर न लौटे कभी
है प्रतीक्षा उन्हीं की हमें आज भी
दिन कि जो प्राण के मोह में बंद थे
आज चोरी गई वो ही दौलत हुए।
दिन दिवंगत हुए!

चाँदनी भी हमें धूप बनकर मिली
रह गई जिंन्दगी की कली अधखिली
हम जहाँ हैं वहाँ रोज़ धरती हिली
हर तरफ़ शोर था और इस शोर में
ये सदा के लिए मौन का व्रत हुए।
दिन दिवंगत हुए!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बचकर निकलने लगते हैं!

बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला,
क़रीबी दोस्त भी बचकर निकलने लगते हैं|

राहत इन्दौरी

यारों का है मौला खैर!

दुश्मन से तो टक्कर ली है सौ-सौ बार,
सामना अबके यारों का है मौला खैर|

राहत इन्दौरी