Categories
Uncategorized

आना-जाना रहे, रहे ना रहे!

आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग,जो मेरे लिए अविस्मरणीय है।


दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ।
इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे आज तक याद है। प्रश्न शायद‌ था ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’। इस प्रश्न के उत्तर में मैंने एच.जी.वेल्स के विज्ञान आधारित उपन्यास ‘द आइलैंड ऑफ डॉ. मोया’ का उदाहरण देते हुए इसकी व्याख्या की थी। मैंने लिखा था कि जैसे कि यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर थे और विकसित होते-होते आज के मानव का परिष्कृत रूप सामने आया है।

उपर्युक्त उपन्यास के आधार पर मैंने लिखा था कि डॉ. मोया इसमें विभिन्न प्रजातियों के जानवरों को लाकर एक द्वीप पर रखते हैं और उनको इंसान की तरह व्यवहार करना सिखाते हैं। किस तरह उठना-बैठना है, किस तरह खाना-पीना है। इस प्रकार सभी जानवर इंसान जैसा व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती है, उनको अनुशासित रखना मुश्किल होता जाता है, जहाँ मौका मिलता है, कुत्ता जीभ निकालकर उसी तरह पानी पीने लगता है, जैसे पहले पीता था, हिंसक जानवरों की मूल प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और डॉ. मोया वहाँ से अपनी जान बचाकर भागते हैं।


उपर्युक्त उदाहरण देकर मैंने यह लिखा था कि यह माना जाता है कि हम पशु से विकसित होकर मनुष्य बने थे लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जा रही है, हमारे अंदर की पाशविक प्रवृत्ति पुनः पनपने लगी है।

खैर, जो भी हो मैं परीक्षा में सफल हुआ और आकाशवाणी, जयपुर में मेरी हिंदी अनुवादक के पद पर नियुक्ति हुई। उद्योग मंत्रालय तथा संसदीय राजभाषा समिति में 6 वर्ष सेवा करने के बाद 30 सितंबर,1980 की रात में मैंने दिल्ली छोड़ी और 1 अक्तूबर को आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण किया।

जयपुर के साहित्यिक मित्रों और वहाँ के परिदृश्य के संबंध में, मैं शुरू के ही एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ, कुछ और बातें, जो पहले नहीं कह पाया था अब कहूंगा।

आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था और मेरी मित्रता वहाँ कार्यक्रम विभाग के लोगों से अधिक थी।


प्रशासन शाखा में, मेरे सामने बैठते थे- श्री राम चंद्र बैरवा, जो हेड क्लर्क थे, कार्यक्रम विभाग के सभी लोगों की फाइलें, सर्विस-बुक आदि उनके पास ही आती थीं और वो पूरा समय इस बात को लेकर कुढ़ते रहते थे कि कार्यक्रम विभाग के लोगों को कितनी अधिक तनख्वाह मिलती है।


मेरे बगल में श्री राम प्रताप बैरवा थे, जो क्लर्क थे और बाहरी कलाकारों को अन्य केंद्रों पर प्रोग्राम आदि के अनुबंध वही जारी करते थे अतः कलाकार उनके पास आते रहते थे। मुझे याद है कि उनके पास आने पर मैंने ज़नाब अहमद हुसैन, मुहम्मद हुसैन के साथ अनेक बार चाय पी है।

आकाशवाणी के बाहर ही एम. आई. रोड पर एक चाय की दुकान थी और अक्सर ऐसा होता था कि हेड क्लर्क महोदय किसी एक के साथ चाय पीकर वापस लौटते थे और किसी दूसरे के साथ वापस चले जाते थे।

आकाशवाणी में एक उद्घोषक थे, नाम याद नहीं आ रहा है, उन्होंने अपने कमरे में यह शेर लिखकर लगाया हुआ था-

हर दौर में हम हाफिज़-ए-किरदार रहेंगे
खुद्दार थे, खुद्दार हैं, खुद्दार रहेंगे।


वैसे पता नहीं वो खुद्दारी का मतलब क्या समझते थे, क्योंकि उनका सबसे झगड़ा रहता था।
एक और मित्र थे, कार्यक्रम विभाग में- श्री बैजनाथ गौतम, जो ईसुरी के प्रसिद्ध लोकगीत बड़े मन से गाते थे. जैसे-

हम खें जुगनिया बना गए, अपुन जोगी हो गए राजा।
दस दरवाज़ों का महल बना गए,
ताही में पिंजरा टंगा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

पिंजरे में तोता और मैना बिठा गए,
बोली अनेकों रटा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।


शायद ईसुरी के लोकगीत के आधार पर ही राज कपूर जी ने अपनी फिल्म में यह गीत रखा था-

रंगमहल के दस दरवाजे,
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी,
सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी।


तीन साल के जयपुर प्रवास में जहाँ मैंने हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, वहीं केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के तीन माह के प्रशिक्षण में प्रथम स्थान प्राप्त करके, डा. कर्ण सिंह जी के कर कमलों से सिल्वर मैडल भी प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण के प्रतिभागियों में मैं बहुत जूनियर था तथा यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और यह मैडल बाद में मेरे काफी काम आया।

जयपुर प्रवास के दौरान हम तीन मकानों में बहुत थोड़ी अवधि के लिए और एक मकान में लंबे समय रहे, जिसमें टीन की छत थी, लेकिन हमारे मकान मालिक का प्रेम ऐसा था कि हम उसे छोड़ ही नहीं पाते थे। इस मकान में जाने की कहानी भी विशेष थी, हम यह मकान देख चुके थे लेकिन टीन की छत होने के कारण जाना नहीं चाहते थे। हमने एक मकान पसंद करके, पहला मकान छोड़ दिया और हम अपना घर का सामान, जो कि उस समय एक ठेले पर ही आ गया था, साथ लेकर नए मकान की ओर चल दिए, जिसके बारे में एक दिन पहले ही बात हो चुकी थी। लेकिन उस लालची आदमी को हमारे बाद शायद किसी ने ज्यादा पैसे ऑफर कर दिए और उसने वह मकान उसको दे दिया।


अब हम, ठेले पर अपने सामान के साथ सड़क पर थे, तब हम अचानक टीन की छत वाले इस मकान पर गए और उन्होंने हमारा भरपूर स्वागत किया। मेरे मकान मालिक मुझे भाई साहब कहते थे और मेरी पत्नी को बेटी कहते थे। जयपुर प्रवास का अधिकतम समय हमने इसी घर में बिताया।

अब अंत में श्री बलबीर सिंह रंग जी के एक दो शेर याद आ रहे हैं –

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।


फिलहाल इतना ही, नमस्कार।
=============

Categories
Uncategorized

मोह मोह के धागे!

आज अपने एक मित्र और सहकर्मी के प्रसंग में बात करना चाहूँगा| ये मेरे साथी मेरे बॉस थे, परंतु उनसे बात करते हुए मुझे कभी यह लगा ही नहीं कि वो मेरे बॉस थे| वैसे इस तरह का अनुभव मेरा बहुत से लोगों के साथ रहा है, परंतु उन सबमें शायद ये सबसे सज्जन व्यक्ति थे|

लीजिए मैं उनका सरनेम बता देता हूँ- मिस्टर मूर्ति, हैदराबाद के रहने वाले थे, इतना जान लेने के बाद ही हम अक्सर किसी व्यक्ति को दक्षिण भारतीय अथवा यहाँ तक कि ‘मद्रासी’ भी कह देते हैं|

मूर्ति जी को इस पर सख्त आपत्ति थी, उनको अपनी अलग पहचान बहुत प्यारी थी, वे कहते थे कि वे मध्य भारत से हैं| एक-दो बार तो हमारी कंपनी के उच्च पदाधिकारियों ने उन पर एहसान जताते हुए उनका चेन्नई अथवा केरल स्थानांतरण करने का प्रस्ताव किया| उनका कहना था कि जहां वे मेरे साथ तैनात थे, उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में, वहाँ से अपने घर जाना उनके लिए ज्यादा आसान है, बनिस्बत केरल अथवा चेन्नई के अनेक इलाकों से वहाँ जाने के!

खैर मैं और मूर्ति जी हमउम्र भी थे और मैनेजमेंट द्वारा समान रूप से सताए गए भी| हम अक्सर अपने मन की बात खुलकर किया करते थे| हाँ मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम दोनों समान रूप से संवेदनशील भी थे| एक प्रसंग उनका बताया हुआ याद आ रहा है, कुल मिलाकर एक दृश्य है इस घटना में!

मूर्ति जी विशुद्ध रूप से शाकाहारी थे, मेरी ही तरह और उनके घर में उन्होंने किसी समय एक श्वान अथवा ‘डॉगी’ भी पाला हुआ था, दूसरा नाम लेने पर मुझे घर में डांट पड़ सकती है, वो तो बेचारे सड़क पर हुआ करते हैं| हाँ तो उनका यह डॉगी, नस्ल मुझे याद नहीं, उन्होंने बताई तो थी, ऐसे आकार का था, जैसा कोई घोड़े का बच्चा होता है| वे उसको घर पर सब्जियाँ आदि ही खिलाते थे, और वह उनको ही खाता था|

अब यह पता नहीं कि मूर्ति जी ने कब और कैसे यह डॉगी रख लिया था क्योंकि उनकी धर्मपत्नी को इस प्रजाति से बिल्कुल प्रेम नहीं था| जैसे-तैसे मूर्ति जी का प्रेम उसके प्रवास को खींचता रहा लेकिन अंत में संभवतः डॉगी को दूर करने की अपनी मांग के लिए उनकी धर्मपत्नी को, ऐसा मजबूत आधार मिल गया कि डॉगी को अब विदा किया ही  जाए, और अंततः मूर्ति जी उसको शायद उसी तरह जंगल में छोड़कर आ गए, जैसे शायद लक्ष्मण जी सीता-माता को वन में छोड़कर आए होंगे|

मैंने बताया था कि यह प्रसंग एक क्षण का, अथवा कहें कि एक दृश्य का है| जैसा अभी तक हुआ वह तो बहुत बार हो चुका होगा शायद! मूर्ति जी भी धीरे-धीरे इसको भूल रहे थे| तभी की बात है कि कार द्वारा कहीं जाते समय वे एक सिग्नल पर रुके और कुछ सोच रहे थे, तभी उनको अपने गाल पर कुछ गीला स्पर्श महसूस हुआ, देखा तो उनका वही पुराना डॉगी, उसकी ऊंचाई तो अच्छी थी ही, उसने कार की विंडो में मुंह डालकर उनका मुंह चूम लिया था|

इस प्रसंग में, वास्तव में मुझे याद करते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन यह संतोष की बात है कि वह डॉगी अपने नए परिवेश में ठीक से एडजस्ट हो गया था, हम ऐसे ही सोचते हैं, ऊपर वाला भी तो है ना सभी प्राणियों की रक्षा करने के लिए|  

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

*******

Categories
Uncategorized

ट्वेंटी-ट्वेंटी (2020) की शुरूआत!

लो जी नया साल शुरू हो गया। ऐसे मौकों के लिए लोग अपनी पोस्ट तैयार रखते हैं, जिससे घड़ी का कांटा सही जगह पहुंचते ही तुरंत ‘चेप’ दें। लेकिन मैं थोड़ा सुस्त बंदा हूँ।

 

 

वैसे इस साल का शीर्षक भी जोरदार है ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’, जैसे 20-20 का क्रिकेट मैच रोमांचक और उत्साह से भरा होता है, वैसे ही यह वर्ष भी रोमांच और उत्साह से भरा रहे, और सबसे जरूरी है कि यह प्यार से भरा रहे, यह मेरी दुआ है।

इस वर्ष के साथ ही नया दशक भी शुरू हो रहा है। इसके साथ ही मुझे अपने जन्म का वर्ष भी याद आता है 1950, तब भी नया दशक प्रारंभ हुआ था। सात दशक इस धरती पर बिता दिए, बहुत ज्यादा लोगों को नहीं मिलता इतने समय इस ग्रह पर मनुष्य के रूप में जीवन जीने का अवसर!

इसके साथ ही पिछले वर्ष का एक अलग अनुभव याद आ रहा है। जी हाँ मैंने कम से कम तीन मित्रों से उनके जन्म-दिन के अवसर पर मित्रता तोड़ ली! वैसे ये अच्छी बात नहीं है ना! लेकिन ये अनुभव भी शायद इस उम्र में और आज के आधुनिक समय में ही ज्यादा होता है!

जैसा मैंने कहा मेरे मित्र और सहकर्मी, जो ‘फेसबुक’ पर भी मेरे मित्र समूह में शामिल थे, उनके जन्मदिन का नोटिफिकेशन फेसबुक पर आया, अब जबकि हम रिटायर होने के बाद काफी दूर-दूर अलग शहरों में रहते थे। मुझे यह जानकारी तो मिल चुकी थी कि मेरे वे मित्र अब परलोक सिधार चुके हैं, लेकिन फेसबुक पर उनकी प्रोफाइल अभी भी बनी हुई थी, शायद उनको पता होता कि अब जाने वाले हैं तो वे खुद ही इसे समाप्त कर देते, लेकिन ऐसा तो होता नहीं ना!

हाँ तो मेरे पास एक विकल्प तो यह था कि ऐसे अपने मित्रों को जन्म दिन की बधाई दूं, लेकिन इस बात की संभावना तो नहीं है न कि जहाँ वे अब है, वहाँ फेसबुक भी होगा! खैर मुझे बेहतर विकल्प यही लगा कि मैं उनको अपने मित्रों की सूची से हटा दूं, वरना हर वर्ष जन्मदिन की यह सूचना बिना कारण परेशान करती। यह अनुभव विशेष रूप से पिछले वर्ष ही हुआ क्योंकि मेरी उम्र के लोग ऊपर की फ्लाइट के लिए लाइन में लगे होते हैं ना!

खैर नववर्ष पर यह प्रसंग अचानक याद आ गया। हाँ तो 1950 में जन्म लेने के बाद, मै पूरे उत्साह और जीवंतता के साथ जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर रहा हूँ, जो बिछड़ उनको सादर नमन और नए मित्रों का हार्दिक स्वागत-

आने वाले स्वागत, जाने वाले विदा,
अगले चौराहे पर इंतजार, शुक्रिया!

 

आज के लिए इतना ही, नववर्ष 2020 के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।
ईश्वर करे कि यह वर्ष हम सभी के और समूची मानव जाति के लिए सुख-समृद्धि लाने वाला हो।

नमस्कार।

*****