उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से!

हर पुरवा का झोंका तेरा घुँघरू,
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना,,
हर सावन की बूंद तुम्हारी ही व्यथा
हर कोयल की कूक तुम्हारी कल्पना|

जितनी दूर ख़ुशी हर ग़म से,
जितनी दूर साज सरगम से,
जितनी दूर पात पतझर का छाँव से,
उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से|

कुंवर बेचैन

धरती पर आते हैं पंछी!

सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं,
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं,
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं,
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं|


(गीत-अंश) डॉ. कुंवर बेचैन

जिस मृग पर कस्तूरी है!

गीत अंश

जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

डॉ. कुंवर बेचैन

शाखों से फूलों की बिछुड़न!

गीत का अंश



शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की,
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की,
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की,
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की|

डॉ. कुंवर बेचैन

जितनी हममें दूरी है!

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

डॉ. कुंवर बेचैन