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सौ बातों की एक बात है !

लीजिए आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़ी भावुकता के साथ यह चित्रण किया है, कि किस प्रकार हमको जीवन के सभी रंगों, सभी प्रकार की परिस्थितियों, कभी साथ और कभी अकेलेपन का सामना करना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-



सौ बातों की एक बात है ।

रोज़ सवेरे रवि आता है।
दुनिया को दिन दे जाता है,
लेकिन जब तम इसे निगलता,
होती जग में किसे विकलता|
सुख के साथी तो अनगिन हैं,
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं|

सौ बातो की एक बात है |


अनगिन फूल नित्य खिलते हैं,
हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं|
लेकिन जब ये मुरझाते हैं,
तब हम इन तक कब जाते हैं|
जब तक हममे साँस रहेगी,
तब तक दुनिया पास रहेगी|

सौ बातों की एक बात है |


सुन्दरता पर सब मरते हैं,
किन्तु असुंदर से डरते हैं|
जग इन दोनों का उत्तर है,
जीवन इस सबके ऊपर है|
सबके जीवन में क्रंदन है,
लेकिन अपना-अपना मन है|

सौ बातों की एक बात है ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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फ़ाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते!


कविताओं के बारे में, एक बात कहना चाहूँगा, मैं यहाँ जो कविताएं शेयर करता हूँ, अधिकतर वे हमारे जमाने के कवियों की होती हैं, जो कवि सम्मेलनों में अपनी गीत-कविताओं के माध्यम से धूम मचाते थे| अब तो कवि सम्मेलनों का वैसा वातावरण नहीं रहा और मैं भी गोवा में हूँ, जहां ऐसी गतिविधियां देख-सुन पाना और भी मुश्किल है|

हाँ तो आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय बालस्वरूप राही जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने जीवन की, विशेष रूप से नौकरी-पेशा लोगों के जीवन की विसंगतियों का चित्रण किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय डॉ बालस्वरूप राही जी का यह गीत-


जो काम किया, वह काम नहीं आएगा,
इतिहास हमारा नाम नहीं दोहराएगा|
जब से सुरों को बेच ख़रीदी सुविधा,
तब से ही मन में बनी हुई है दुविधा|
हम भी कुछ अनगढा तराश सकते थे,
दो-चार साल अगर समझौता न करते ।


पहले तो हम को लगा कि हम भी कुछ हैं,
अस्तित्व नहीं है मिथ्या, हम सचमुच हैं|
पर अकस्मात ही टूट गया वह संभ्रम,
ज्यों बस आ जाने पर भीड़ों का संयम|
हम उन काग़जी गुलाबों से शाश्वत हैं,
जो खिलते कभी नहीं हैं, कभी न झरते ।


हम हो न सके जो हमें होना था,
रह गए संजोते वही कि जो खोना था|
यह निरुद्देश्य, यह निरानन्द जीवन-क्रम,
यह स्वादहीन दिनचर्या, विफल परिश्रम|
पिस गए सभी मंसूबे इस जीवन के,
दफ़्तर की सीढ़ी चढ़ते और उतरते ।


चेहरे का सारा तेज निचुड़ जाता है,
फ़ाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते|
हर शाम सोचते नियम तोड़ देंगे हम,
यह काम आज के बाद छोड़ देंगे हम|
लेकिन वह जाने कैसी है मजबूरी,
जो कर देती है आना यहाँ ज़रूरी|

खाली दिमाग़ में भर जाता है कूड़ा,
हम नहीं भूख से, खालीपन से डरते ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|


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इंसान कहाँ तक पहुँचे!

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी को ‘गीतों का राजकुंवर’ भी कहा जाता है और हमारी फिल्मों को भी उन्होंने अनेक यादगार गीत दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ उनका यह गीत-

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे ।
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख,
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे ।

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे ।


चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,
देखना ये है कि इंसान कहाँ तक पहुँचे ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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तुम्हारा मन नहीं छूते!

आज एक बार फिर से मैंने अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर करना चाहा और किया भी, लेकिन मालूम हुआ की मैं कुछ महीने पहले ही उसे शेयर कर चुका था|


लीजिए अब प्रस्तुत कर रहा हूँ उनका यह गीत-

नीम तरू से फूल झरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|

रीझ, सुरभित हरित -वसना
घाटियों पर
व्यँग्य से हँसते हुए
परिपाटियों पर
इँद्रधनु सजते- सँवरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|


गहन काली रात
बरखा की झड़ी में
याद डूबी ,नींद से
रूठी घड़ी में
दूर वँशी -स्वर उभरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है|


वॄक्ष, पर्वत, नदी,
बादल, चाँद-तारे
दीप, जुगनू , देव–दुर्लभ
अश्रु खारे
गीत कितने रूप धरते हैँ
तुम्हारा मन नहीँ छूते
बड़ा आश्चर्य है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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नैन में तिरता हुआ जल !

आज एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो गीतों के ऐसे सर्जक थे कि उनको बस सुनते ही जाने का मन होता था|

लीजिए प्रस्तुत है आंसुओं की मारक शक्ति से भरा हुआ यह गीत-

नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर


रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार|

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राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई!

कल मैंने कैफी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर की थी जो एक महान शायर होने के अलावा शबाना आज़मी के पिता भी थे| आज मैं ज़नाब अली सरदार जाफ़री साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, वे भी एक महान शायर थे और उनकी ही पीढ़ी के थे, फिल्मों में भी उनके बहुत से गीत लोकप्रिय हुए हैं

आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ उसको जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है| लीजिए आज प्रस्तुत है ये प्यारा सा गीत, अकेलेपन अर्थात तन्हाई के बारे में-  


आवारा हैं गलियों के, मैं और मेरी तन्हाई,
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुसवाई|

ये फूल से चहरे हैं, हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते,
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई|

मैं और मेरी तन्हाई|


अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे,
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई|

मैं और मेरी तन्हाई|


आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे, जख्मों का गुलिस्तां है,
आंखों से लहू टपका, दामन में बहार आई|

मैं और मेरी तन्हाई|


हर रंग में ये दुनिया, सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है, हंस कर कभी गाती है,
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई|

मैं और मेरी तन्हाई|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरी थकन उतर जाती है!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रामावतार त्यागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात थे|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का यह गीत- –

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी थकन उतर जाती है।

कोई ठोकर लगी अचानक, जब-जब चला सावधानी से,
पर बेहोशी में मंजिल तक, जा पहुँचा हूँ आसानी से,
रोने वाले के अधरों पर, अपनी मुरली धर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥


प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को,
याचक का आशीष लिये बिन, स्वर्ग नहीं मिलता दानी को,
खाली पात्र किसी का अपनी, प्यास बुझा कर भर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी गागर भर जाती है॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने, वह ईश्वर पूजना नहीं है,
बन कर वेदमंत्र-सा मुझको, मंदिर में गूँजना नहीं है,
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है ,मेरी नौका तर जाती है॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल!

एक बार फिर मैं आज बहुत ही प्यारे और भावुक गीतकार, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे यह स्मरण करके अच्छा लगता है कि मुझे कई बार उनसे गले मिलने का अवसर मिला था| बहुत ही सरल हृदय व्यक्ति, सृजनशील रचनाकार थे| आज के इस गीत में भी उन्होंने प्रेयसी की आँखों में आए आंसुओं के बहाने क्या-क्या बातें कह दीं, भावुकता की उड़ान में कहाँ-कहाँ पहुँच गए|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह प्यारा सा गीत- –



नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा-
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ|


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर|

रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की,
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ|


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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सर्द है अंगार की भाषा!

हिन्दी काव्य मंचों के अद्भुद हस्ताक्षर माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मंचों के मतलब का कम और पढ़ने और मनन करने का अधिक है| गीत में हमारे भटकाव और लक्ष्यों के ओझल होने की बात है| गीत में हमारे रोशनी से भरे संकल्पों की भी बात की गई है|


लीजिए प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का यह अनूठा गीत –




दिन चढ़े ही भूल बैठे हम
धूप के परिवार की भाषा,
बोलती है रोशनी भी अब
मावसी आँधियार की भाषा|

गालियाँ देगी उन्हे मंज़िल
वक्त उनके नाम रोएगा,
भोर का इतिहास भी उनकी
सिर्फ़ ज़िंदा लाश ढोएगा,
नाव पर चढ़कर करेंगे जो
अनसुनी मझदार की भाषा|

स्वप्न हैं बेशक बहारों के
है ज़रूरत आगमन की भी,
मानते है बेड़ियाँ टूटी
तोड़िए जंजीर मन की भी,
गीत – क्षण से कर सकेंगे हम
प्यास को संसार की भाषा|

तू थकन का नाम मत ले रे
पर्वतों को पार करना है,
मरुथलों को मेघ देने हैं
फागुनो में रंग भरना है,
रंज है इस बात का हमको
सर्द है अंगार की भाषा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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