कभी कभी !

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|
आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं-

कभी कभी जब मेरी तबियत
यों ही घबराने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

रात, रात भर को ही मिलती
दिन भी मिलता दिन भर को,
कोई पूरी तरह न मिलता
रमानाथ लौटो घर को|

घर भी बिन दीवारों वाला
जिसकी कोई राह नहीं,
पहुँच सका तो पहुँचूँगा मैं
वैसे कुछ परवाह नहीं|


मंज़िल के दीवाने मन पर
जब दुविधा छाने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

पूरी होने की उम्मीद में
रही सदा हर नींद अधूरी,
तन चाहे जितना सुंदर हो
मरना तो उसकी मज़बूरी|

मज़बूरी की मार सभी को
मज़बूरन सहनी पड़ती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कारवाँ गुज़र गया!

आज बिना किसी भूमिका के, श्रेष्ठ कवि और गीतों के राजकुमार कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ| एक ऐसा गीत जो नीरज जी की पहचान बना और उनसे अक्सर कवि सम्मेलनों में यह गीत प्रस्तुत करने का अनुरोध किया जाता था|

इस गीत का कुछ अंश मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ, लीजिए आज प्रस्तुत है नीरज जी का यह पूरा गीत –

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई,

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा

थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे उठे कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,

हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे, नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।


माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन,

पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार| 

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भाषा वंदना

आदरणीय सोम ठाकुर जी का बहुत प्रसिद्ध गीत है जो हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की वंदना का गीत है| हिन्दी की समृद्ध परंपरा और शक्ति का जो वर्णन इस गीत में बहुत सहज भाव से कर दिया गया है, उसका वर्णन करने में विद्वानों को काफी लंबा विवरण देना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह भाषा वंदना का अमर गीत –

करते है तन मन से वंदन जन -गण -मन की अभिलाषा का
अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधान अपनी भाषा का

यह अपनी शक्ति – सर्जना के
माथे की है चंदन रोली
माँ के आँचल की छाया में
हमने जो सीखी है बोली

यह अपनी बँधी हुई अंजूरी, यह अपने महके शब्द सुमन
यह पूजन अपनी संस्कृति का, यह अर्चन अपनी भाषा का

अपने रत्नाकर के रहते
किसकी धारा के बीच बहें
हम इतने निर्धन नहीं कि
वाणी से औरों के ऋणी रहें

इसमे प्रतिबिंबित है अतीत, आकर ले रहा वर्तमान
यह दर्शन अपनी संस्कृति का, यह दर्पण अपनी भाषा का

यह उँचाई है तुलसी की
यह सूर – सिंध की गहराई
टंकार चंदबरदाई की
यह विद्यापति की पुरवाई

जयशंकर का जयकार, निराला का यह अपराजय ओज
यह गर्जन अपनी संस्कृति का, यह गुंजन अपनी भाषा का|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अब निशा देती निमंत्रण!

आज मैं हिन्दी के अत्यंत प्रसिद्ध गीत कवि और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पूज्य पिताश्री स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी, हां जी किसी जमाने में ‘बच्चन जी’ का मतलब स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी ही होता था| बच्चन जी के गीत श्रोताओं और पाठकों को झूमने पर मज़बूर कर देते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत –

अब निशा देती निमंत्रण!

महल इसका तम-विनिर्मित,
ज्वलित इसमें दीप अगणित!
द्वार निद्रा के सजे हैं स्वप्न से शोभन-अशोभन!
अब निशा देती निमंत्रण!

भूत-भावी इस जगह पर
वर्तमान समाज होकर
सामने है देश-काल-समाज के तज सब नियंत्रण!
अब निशा देती निमंत्रण!

सत्य कर सपने असंभव!–
पर, ठहर, नादान मानव!–
हो रहा है साथ में तेरे बड़ा भारी प्रवंचन!
अब निशा देती निमंत्रण!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गीत-विहग उतरा!

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत रंजक जी की प्रारंभिक प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है और यह उनके एक नवगीत संकलन का शीर्षक गीत था| प्रकृति के कुछ सुंदर चित्र इस गीत में उकेरे गए हैं||

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

हल्दी चढ़ी पहाड़ी देखी
मेंहदी रची धरा
अंधियारे के साथ पाहुना
गीत-विहग उतरा ।

गांव फूल-से गूंथ दिए
सर्पिल पगडंडी ने,
छोर फैलते गए
मसहरी के झीने-झीने,
दिन, जैसे बांसुरी बजाता
बनजारा गुज़रा।

पोंछ पसीना ली अंगड़ाई
थकी क्रियाओं ने,
सौंप दिये मीठे सम्बोधन
खुली भुजाओं ने
जोड़ गया संदर्भ मनचला
मौसम हरा-भरा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इंसान!

एक बार फिर से आज मैं, अपने समय के प्रमुख गीत कवियों में शामिल और कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में कुछ उदाहरण देकर यह बताया गया है इंसान को कैसा होना चाहिए, वास्तव में हम सीखना चाहें तो जीवन में किसी से भी सीख सकते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-


मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा-
फूल की तरह जियो औ मरो
सदा इंसान ।

भूलकर वसुधा का शृंगार,
सेज पर सोया जब संसार,
दीप कुछ कहे बिना ही जला-
रातभर तम पी-पीकर पला-
दीप को देख, भर गए नयन
उसी क्षण-
बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा
दीप की तरह जलो, तम हरो
सदा इंसान ।

रात से कहने मन की बात,
चँद्रमा जागा सारी रात,
भूमि की सूनी डगर निहार,
डाल आँसू चुपके दो-चार

डूबने लगे नखत बेहाल
उसी क्षण-
छिपा गगन में चाँद, किसी ने कहा-
चाँद की तरह, जलन तुम हरो
सदा इंसान।

साँस-सी दुर्बल लहरें देख,
पवन ने लिखा जलद को लेख,
पपीहा की प्यासी आवाज़,
हिलाने लगी इंद्र का राज,

धरा का कण्ठ सींचने हेतु
उसी क्षण –
बरसे झुक-झुक मेघ, किसी ने कहा-
मेघ की तरह प्यास तुम हरो
सदा इंसान ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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त्रिया–चरित्र हवाओं का!

मेरे अत्यंत प्रिय कवि और हमेशा बड़े भाई की तरह स्नेह से मिलने वाले, श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ|

किशन सरोज जी को सुनना एक अलग ही तरह का दिव्य अनुभव प्रदान करता था, प्रेम के प्रति पूर्णतः समर्पित और अनोखी अनुभूतियों से हमारा साक्षात्कार कराने वाले किशन जी एक महान व्यक्ति और रचनाकार थे|

लीजिए प्रस्तुत है किशन सरोज जी का लिखा यह अलग किस्म का गीत–


बिखरे रंग, तूलिकाओं से
बना न चित्र हवाओं का
इन्द्रधनुष तक उड़कर पहुंचा
सोंधा इत्र हवाओं का|

जितना पास रहा जो, उसको
उतना ही बिखराव मिला
चक्रवात-सा फिरा भटकता
बनकर मित्र हवाओं का|

कभी गर्म लू बनीं जेठ की
कभी श्रावनी पुरवाई
फूल देखते रहे ठगे-से
ढंग विचित्र हवाओं का|

परिक्रमा वेदी की करते
हल्दी लगे पांव कांपे
जल भर आया कहीं दॄगों में
धुँआ पवित्र हवाओं का|


कभी प्यार से माथा चूमा
कभी रूठ कर दूर हटीं
भोला बादल समझ न पाया
त्रिया–चरित्र हवाओं का|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सूरज डूब गया बल्ली भर!

स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी जाने माने साहित्यिक गीतकार थे, उन्होंने जहां अनेक साहित्यिक रचनाएं हमें दी हैं, वहीं फिल्मों के लिए भी उन्होंने अनेक मधुर गीत लिखे हैं| जहां तक मुझे याद है रामायण जैसे सीरियलों की तैयारी में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था| जैसे उनका एक गीत था – ‘ज्योति कलश छलके’, उन्होंने ‘द्रौपदी’,’सुवर्णा’ आदि प्रबंध काव्य भी लिखे थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी’ का यह नवगीत-


सूरज डूब गया बल्ली भर-
सागर के अथाह जल में।
एक बाँस भर उठ आया है-
चांद, ताड के जंगल में।

अगणित उंगली खोल, ताड के पत्र, चांदनी में डोले,
ऐसा लगा, ताड का जंगल सोया रजत-छत्र खोले
कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ
हो आया, आज एक पल में।

बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता,
बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज-गरज कर कुछ कहता,
शशि बनकर मन चढा गगन पर,
रवि बन छिपा सिंधु तल में।


परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चांद और सूरज,
सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू-रज
मन को खेल खिलाता कोई,
निशि दिन के छाया-छल में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पत्र तुम्हारे नाम


आज एक बार फिर से हिन्दी के प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और सुरीले गीतकार श्री सोम ठाकुर जी एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| आदरणीय सोम जी ने देश प्रेम, भाषा प्रेम और शुद्ध प्रेम के भी अनूठे गीत लिखे हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह प्रेम से परिपूर्ण गीत-

White and Green Floral Wall Decor


सुर्ख सुबह
चम्पई दुपहरी
रंग रंग से लिख जाता मन
पत्र तुम्हारे नाम|

बाहों के ख़ालीपन पर यह
बढ़ता हुआ दवाब
चहरे पर थकान के जाले
बुनता हुआ तनाव
बढ़ने लगे देह से लिपटी
यादों के आयाम|

घबराहट भरती चुप्पी ने
नाप लिया है दिन
पत्थर -पत्थर हुए जा रहे
हाथ कटे पलछिन
मिटते नहीं मिटाए अब तो
होंठो लगे विराम|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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संध्या सिंदूर लुटाती है!

एक बार फिर से मैं आज हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में बच्चन जी ने शाम के कुछ बहुत सुंदर चित्र प्रस्तुत किए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत –



संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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