महक उठे गांव गांव!

स्वर्गीय किशन सरोज जी मेरे अत्यंत प्रिय गीतकार थे, मैंने पहले भी उनके बहुत से गीत शेयर किए हैं, उनसे जो स्नेह मुझे प्राप्त करने को सौभाग्य मिला उसका उल्लेख भी मैंने किया है|

अधिकतर मैंने किशन जी के वे गीत शेयर किए हैं जो मंचों पर वे पढ़ते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक नवगीत, जिसमें सावन ऋतु का वर्णन करते हुए बताया गया है कि किस प्रकार विरहिन के मामले में सावन और जेठ एक साथ अपना प्रभाव दिखाते हैं–


महक उठे गांव-गांव
ले पुबांव से पछांव
बहक उठे आज द्वार, देहरी अँगनवा।

बगियन के भाग जगे
झूम उठी अमराई
बौराए बिरवा फिर
डोल उठी पुरवाई
उतराए कूल-कूल
बन-बन मुरिला बोले, गेह में सुअनवा।

घिर आए बदरा फिर
संग लगी बीजुरिया
कजराई रातें फिर
बाज उठी बांसुरिया
अन्धियरिया फैल-फैल
गहराये गैल-गैल
छिन- छिन पै काँप उठत, पौरि में दियनवा।


प्रान दहे सुधि पापिन
गली-गली है सूनी
पाहुना बिदेस गए
पीर और कर दूनी
लहराए हार-हार
मन हिरके बार-बार
जियरा में जेठ तपे, नैन में सवनवा।

(आभार- यहाँ उद्धृत करने के लिए कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध – ‘कविता कोश‘ तथा ‘Rekhta‘ से लेता हूँ)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मंगल विलय!

एक बार फिर से आज मैं श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, सोम ठाकुर जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| मूलतः वे प्रेम के गीतकार हैं और उनके प्रेम का दायरा इतना बड़ा है कि उसमें राष्ट्र प्रेम, भाषा प्रेम सभी शामिल हो जाते हैं और उन्होंने हर क्षेत्र में कुछ अमर गीत दिए हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का यह रूमानी गीत, जिसका निर्वाह सोम जी ने बहुत सुंदर तरीके से किया है-

इस निरभ्रा चाँदनी में
आज फिर गुँथ जाए तेरी छाँह, मेरी छाँह|

नयन – कोरों पर,
लटों के मुक्त छोरों पर
टूटती हैं नीम से छनती किरण
रुक गया हो रूप निर्झर पर, कि जैसे
अमरता का क्षण,
एक तरल उष्णता है —
जो कि राग — रागनाप ठंडे बदनो को खोलती हैं
वारुणी –संज्ञावती हैं,
आत्म –प्लावक मानसर में
आज फिर बुझ जाए तेरा दाह, मेरा दाह ।

जो कछारों में
न बोला नमस्कारों में
अर्थ वह इस प्राण का चंदन,
महकता है, पर नही करता
किसी अभिव्यक्ति का पूजन,
आत्मजा हर लहर मन की
कुछ अनाम ऊर्जामय लय तरंगों में थकूँ मैं,
स्रष्टि को दोहरा सकू मैं,
शब्द गर्वित जो नही वह
आज फिर चुक जाए तेरी चाह में, मेरी चाह ।


दूर के वन में
दिशाओं के समापन में
काँपता है एक सूनापन,
हर प्रहार स्वीकारता जाता
द्रगों में डूबने का प्रन
यह विमुक्ता देह मेरी ,
दो मुझे तुम रूप–क्षण का स्पर्श,
चेतन तक गलूँ मैं
और अनुक्षण जन्म लूँ मैं,

ओ निमग्ने !
एक मंगल–विलय तक मुड़ जाए, तेरी राह, मेरी राह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सारा जग बंजारा होता!

लीजिए आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य जगत में गीतों के राजकुंवर के नाम से विख्यात स्वर्गीय गोपाल दास जी ‘नीरज’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, हिन्दी काव्य साहित्य और हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से अमूल्य योगदान किया है| मैंने पहले भी नीरज जी के अनेक गीत शेयर की हैं और आशा है कि आगे भी करता रहूँगा|

लीजिए आज प्रस्तुत है नीरज जी का यह गीत-

प्यार अगर थामता न पथ में उँगली इस बीमार उमर की
हर पीड़ा वैश्या बन जाती, हर आँसू आवारा होता।


निरवंशी रहता उजियाला
गोद न भरती किसी किरन की,
और ज़िन्दगी लगती जैसे-
डोली कोई बिना दुल्हन की,
दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर फूल झुलसता
करुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर न बुहारा होता।
प्यार अगर…


मन तो मौसम-सा चंचल है
सबका होकर भी न किसी का
अभी सुबह का, अभी शाम का
अभी रुदन का, अभी हँसी का
और इसी भौंरे की ग़लती क्षमा न यदि ममता कर देती
ईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता।
प्यार अगर…


जीवन क्या है एक बात जो
इतनी सिर्फ समझ में आए-
कहे इसे वह भी पछताए
सुने इसे वह भी पछताए
मगर यही अनबूझ पहेली शिशु-सी सरल सहज बन जाती
अगर तर्क को छोड़ भावना के सँग किया गुज़ारा होता।
प्यार अगर…


मेघदूत रचती न ज़िन्दगी
वनवासिन होती हर सीता
सुन्दरता कंकड़ी आँख की
और व्यर्थ लगती सब गीता
पण्डित की आज्ञा ठुकराकर, सकल स्वर्ग पर धूल उड़ाकर
अगर आदमी ने न भोग का पूजन-पात्र जुठारा होता।
प्यार अगर…


जाने कैसा अजब शहर यह
कैसा अजब मुसाफ़िरख़ाना
भीतर से लगता पहचाना
बाहर से दिखता अनजाना
जब भी यहाँ ठहरने आता एक प्रश्न उठता है मन में
कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवाड़ा होता।
प्यार अगर..
.

हर घर-आँगन रंग मंच है
औ’ हर एक साँस कठपुतली
प्यार सिर्फ़ वह डोर कि जिस पर
नाचे बादल, नाचे बिजली,
तुम चाहे विश्वास न लाओ लेकिन मैं तो यही कहूँगा
प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता।
प्यार अगर…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इस पार, प्रिये मधु है तुम हो!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के गीत शिरोमणि स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी के इस गीत की मुख्य पंक्ति को अक्सर उद्धृत किया जाता है, इसलिए मुझे लगता है कि इसके संबंध में अधिक बताने की आवश्यकता नहीं है|

लीजिए प्रस्तुत है बच्चन जी का यह प्रसिद्ध गीत–


इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखा‌एँ कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है!
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जा‌एँगे,
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पा‌एँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दि‌ए धर कंधों पर, जो रोरोकर हमने ढो‌ए,
महलों के सपनों के भीतर जर्जर खँडहर का सत्य भरा!
उर में एसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सो‌ए!
अब तो हम अपने जीवन भर उस क्रूरकठिन को कोस चुके,
उस पार नियति का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

संसृति के जीवन में, सुभगे! ऐसी भी घड़ियाँ आ‌ऐंगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे तम के अन्दर छिप जा‌एँगी,
जब निज प्रियतम का शव रजनी तम की चादर से ढक देगी,
तब रविशशिपोषित यह पृथिवी कितने दिन खैर मना‌एगी!
जब इस लंबेचौड़े जग का अस्तित्व न रहने पा‌एगा,
तब तेरा मेरा नन्हासा संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

ऐसा चिर पतझड़ आ‌एगा, कोयल न कुहुक फिर पा‌एगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा जीवन की ज्योति जगा‌एगी,
अगणित मृदुनव पल्लव के स्वर ‘भरभर’ न सुने जा‌एँगे,
अलि‌अवली कलिदल पर गुंजन करने के हेतु न आ‌एगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का अवसान, प्रिय हो जा‌एगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

सुन काल प्रबल का गुरु गर्जन निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’, सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायकनायक सिन्धु कहीं, चुप हो छिप जाना चाहेगा!
मुँह खोल खड़े रह जा‌एँगे गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण!
संगीत सजीव हु‌आ जिनमें, जब मौन वही हो जा‌एँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का, जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

उतरे इन आखों के आगे जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा देखो माली, सुकुमार लता‌ओं के गहने,
दो दिन में खींची जा‌एगी ऊषा की साड़ी सिन्दूरी
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा पा‌एगा कितने दिन रहने!
जब मूर्तिमती सत्ता‌ओं की शोभाशुषमा लुट जा‌एगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा को‌ई हम सब को खींच बुलाता है!
मैं आज चला तुम आ‌ओगी, कल, परसों, सब संगीसाथी,
दुनिया रोतीधोती रहती, जिसको जाना है, जाता है।
मेरा तो होता मन डगडग मग, तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा, मँझधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है!

काफी लंबे अंतराल के बाद मैं आज फिर से स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अपनी तरह के एक अनूठे कवि थे और अपनी कविताओं और प्रस्तुति के अंदाज़ के कारण उन्होंने काव्य मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाई थी|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का यह गीत –

चाहता हूँ मैं तुम्हारी दृष्टि का केवल इशारा,
डूबने को बहुत होता एक तिनके का सहारा,
उर-उदधि में प्यार का तूफ़ान आना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

चाहते थककर दिवाकर-चंद्र नभ का शांत कोना,
सह सकेगी अब न वृद्धा भूमि सब का भार ढोना,
जीर्ण जग फिर से नई दुनिया बसाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

एक योगी चाहता है बाँधना गतिविधि समय की,
एक संयोगी भुलाना चाहता चिंता प्रलय की,
पर वियोगी आग, पानी में लगाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

व्यंग्य करता है मनुजता पर मनुज का क्षुद्र-जीवन,
हँस रहा मुझ पर जवानी की उमंगों का लड़कपन,
किंतु कोई साथ मेरे मुस्कुराना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

स्वर्ग लज्जित हो रहा है नर्क की लखकर विषमता,
आज सुख भी रो रहा है देखकर दुख की विवशता,
इंद्र का आसन तभी तो डगमगाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मन, कितना अभिनय शेष रहा!

कुछ नया लिखने का मन नहीं है आज, इसलिए एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, और एक श्रेष्ठ गीत फिर से आपके सम्मुख रख रहा हूँ|

आज हिंदी कविता, विशेष रूप से गीतों के एक अनूठे हस्ताक्षर- स्व. भारत भूषण जी का एक और गीत शेयर कर रहा हूँ। भारत भूषण जी मेरे प्रिय गीत कवि रहे हैं और अनेक बार उनको मंचों से कविता-पाठ करते सुनने का अवसर मिला है। कुछ बार उनके गीतों को सुनकर या पढ़कर आंखों में आंसू भी आ गए हैं। उनके एक-दो गीतों का उल्लेख करूं तो-

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’,

‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए, परिवार के या प्यार के, या गीत के, या देश के!’,

‘मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’,

‘तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा, धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी’।

इस प्रकार के असंख्य अमर गीत स्व. भारत भूषण जी ने लिखे थे और उनमें से अनेक मैंने पहले शेयर किए हैं और आगे भी मौका मिलेगा तो करूंगा।
इसी क्रम में मैं आज भी उनका एक प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें कवि ने यह संकल्प व्यक्त किया है कि वह तो गीत लिखने के लिए ही बने थे और गीत का संदेश ही वे अपने पाठकों को दे रहे हैं-

मनवंशी
मन!
कितना अभिनय शेष रहा,
सारा जीवन जी लिया, ठीक
जैसा तेरा आदेश रहा!

बेटा, पति, पिता, पितामह सब,
इस मिट्टी के उपनाम रहे,
जितने सूरज उगते देखे
उससे ज्यादा संग्राम रहे,
मित्रों मित्रों रसखान जिया,
कितनी भी चिंता, क्लेश रहा!

हर परिचय शुभकामना हुआ,
दो गीत हुए सांत्वना बना,
बिजली कौंधी, सो आँख लगीं,
अँधियारा फिर से और लगा,
पूरा जीवन आधा–आधा,
तन घर में मन परदेश रहा!

आँसू–आँसू संपत्ति बने,

भावुकता ही भगवान हुई,
भीतर या बाहर से टूटे,
केवल उनकी पहचान हुई,
गीत ही लिखो गीत ही जियो-
मेरा अंतिम संदेश रहा!


आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

वह हवा पहाड़ी!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अपनी तरह के अनूठे गीतकार आदरणीय बुदधिनाथ मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और यह भी दोहराना मुझे अच्छा लगता है कि मैं और डॉक्टर मिश्र जी ने किसी समय एक ही संस्थान हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में कार्यरत रहे थे, वे कलकत्ता स्थित मुख्यालय में पदस्थापित थे और मैं एक परियोजना में| बाद में एक बार मुझे दार्जिलिंग में उनके संचालन में काव्यपाठ का अवसर भी मिला था|

लीजिए प्रस्तुत है बुदधिनाथ मिश्र जी का यह गीत जो पहाड़ी हवा के संबंध में कुछ सुंदर बातें हमारे सम्मुख रखता है –

वह हवा पहाड़ी
नागिन-सी जिस ओर गई
फिर दर्द भरे सागर में
मन को बोर गई ।

चादर कोहरे की ओढ़े
यायावर सोते
लहरों पर बहते फूल
कहीं अपने होते?

देहरी-देहरी पर
धर दूधिया अंजोर गई
चुपके-से चीड़ों के कन्धे झकझोर गई ।

कच्चे पहाड़-से ढहते
रिश्तों के माने
भरमाते पगडण्डी के
ये ताने-बाने ।


क़समों के हर नाज़ुक
रेशे को तोड़ गई
झुरमुट में कस्तूरी यादों की छोड़ गई ।

सीढ़ी-सीढ़ी उतरी
खेतों में किन्नरियाँ
द्रौपदी निहारे बैठ
अशरफ़ी की लड़ियाँ ।

हल्दी हाथों को
भरे दृगों से जोड़ गई
मौसम के सारे पीले पात बटोर गई ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

हर ओर कलियुग के चरण!

स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी एक ऐसे गीतकार थे जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे अपने समय से काफी आगे की बात कहते थे| कवि सम्मेलनों में उनका काव्य पाठ सुनना एक विलक्षण अनुभव होता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत –

हर ओर कलियुग के चरण
मन स्मरण कर अशरण शरण।


धरती रंभाती गाय सी
अन्तोन्मुखी की हाय सी
संवेदना असहाय सी
आतंकमय वातावरण।

प्रत्येक क्षण विष दंश है
हर दिवस अधिक नृशंस है
व्याकुल परम् मनु वंश है
जीवन हुआ जाता मरण।

सब धर्म गंधक हो गये
सब लक्ष्य तन तक हो गये
सद्भाव बन्धक हो गये
असमाप्त तम का अवतरण।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम रहे हो द्वीप जैसे!

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे गर्व है कि मैंने अपने कई आयोजनों में सोम जी को आमंत्रित किया था और जी भरकर उनके मधुर गीतों और मंच संचालन का आनंद लिया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह गीत –

तुम रहे हो द्वीप जैसे, मैं किनारे सा रहा,
पर हमारे बीच में है सिंधु लहराता हुआ|

शीशे काटे शब्द रहते हैं तुम्हारे होंठ पर
लाख चेहरे हैं मगर मेरी अकेली बात के
दिन सुनहले हैं तुम्हारे स्वप्न तक उड़ते हुए
पंख हैं नोंचे हुए मेरी अंधेरी रात के
,
सिर्फ़ मेरी बात में शाकुंतलों की गंध है
तुम रहे खामोश, मैं हर बात दोहराता हुआ
|

छेड़कर एकांत मेरा शक्ल कैसी ले रही है
लाल -पीली सब्ज़ यादों से तराशी कतरनें,
ला रही कैसी घुटन का ज्वर ये पुरवाइयाँ
तेज़ खट्टापन लिए हैं दोपहर की फिसलनें,
भीगता हूँ गर्म तेजाबी लहर में दृष्टि तक
वक्त गलता है तपी बौछार छहराता हुआ|

शोर कैसा है, न जिसको नाम मैं दे पा रहा
है अजब आकाश, ऋतुएं हो गई हैं अनमनी
झनझनाती हैं ज़ेहन मेरा लपकती बिजलियाँ
एक आँचल है मगर, बाँधे हुए संजीवनी
थरथराती भूमि है पाँवों-तले, पर शीश पर
टूटता आकाश है घनघोर घहराता हुआ
|

चाँदनी तुमने सुला दी विस्मरण की गोद में
बात हम कैसे रूपहली यादगारों की करें
एक दहशत खोजती रहती मुझे आठों प्रहर
किस लहकते रंग से गमगीन रांगोली भरे
तुम रहे हर एक सिहरन को विदा करते हुए
मैं दबे तूफान अपने पास ठहराता हुआ|

मैं न पढ़ पाया कभी सायं नियम की संहिता
मैं जिया कमज़ोरियों से आसुओं से, प्यार से
साथ मेरे चल रहा है काल का बहरा बधिक
चीरता है जो मुझे हर क्षण अदेखी धार से
देवता बनकर रहे तुम वेदना से बेख़बर
मैं लिए हूँ घाव पर हर घाव घहराता हुआ
|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                             ********

दिन दिवंगत हुए!

मेरे लिए बड़े भाई और गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी ने बहुत सुंदर गीत लिखे हैं और हम युवावस्था में उनके गीत गुनगुनाते रहते थे, जैसे- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की यह रचना –

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए!

हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए
दिन दिवंगत हुए!

शीश पर सूर्य को जो सँभाले रहे
नैन में ज्योति का दीप बाले रहे
और जिनके दिलों में उजाले रहे
अब वही दिन किसी रात की भूमि पर
एक गिरती हुई शाम की छत हुए!
दिन दिवंगत हुए!


जो अभी साथ थे, हाँ अभी, हाँ अभी
वे गए तो गए, फिर न लौटे कभी
है प्रतीक्षा उन्हीं की हमें आज भी
दिन कि जो प्राण के मोह में बंद थे
आज चोरी गई वो ही दौलत हुए।
दिन दिवंगत हुए!

चाँदनी भी हमें धूप बनकर मिली
रह गई जिंन्दगी की कली अधखिली
हम जहाँ हैं वहाँ रोज़ धरती हिली
हर तरफ़ शोर था और इस शोर में
ये सदा के लिए मौन का व्रत हुए।
दिन दिवंगत हुए!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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