Categories
Uncategorized

सर्द है अंगार की भाषा!

हिन्दी काव्य मंचों के अद्भुद हस्ताक्षर माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मंचों के मतलब का कम और पढ़ने और मनन करने का अधिक है| गीत में हमारे भटकाव और लक्ष्यों के ओझल होने की बात है| गीत में हमारे रोशनी से भरे संकल्पों की भी बात की गई है|


लीजिए प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का यह अनूठा गीत –




दिन चढ़े ही भूल बैठे हम
धूप के परिवार की भाषा,
बोलती है रोशनी भी अब
मावसी आँधियार की भाषा|

गालियाँ देगी उन्हे मंज़िल
वक्त उनके नाम रोएगा,
भोर का इतिहास भी उनकी
सिर्फ़ ज़िंदा लाश ढोएगा,
नाव पर चढ़कर करेंगे जो
अनसुनी मझदार की भाषा|

स्वप्न हैं बेशक बहारों के
है ज़रूरत आगमन की भी,
मानते है बेड़ियाँ टूटी
तोड़िए जंजीर मन की भी,
गीत – क्षण से कर सकेंगे हम
प्यास को संसार की भाषा|

तू थकन का नाम मत ले रे
पर्वतों को पार करना है,
मरुथलों को मेघ देने हैं
फागुनो में रंग भरना है,
रंज है इस बात का हमको
सर्द है अंगार की भाषा|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

ऐसा भी तो अंगार नहीं मिलता है – गोपाल दास ‘नीरज’

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी अपने जमाने में कवि सम्मेलनों का मुख्य आकर्षण हुआ करते थे| हिन्दी फिल्मों में भी नीरज जी ने बहुत प्यारे गीत दिए हैं|

लीजिए आज नीरज जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

 

मुझको जीवन आधार नहीं मिलता,
आशाओं का संसार नहीं मिलता।

 

मधु से पीड़ित-मधुशाला से निर्वासित,
जग से, अपनों से निन्दित और उपेक्षित-
जीने के योग्य नहीं मेरा जीवन पर
मरने का भी अधिकार नहीं मिलता।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता..

 

भव-सागर में लहरों के आलोड़न से,
मैं टकराता फ़िरता तट के कण-२ से,
पर क्षण भर भी विश्राम मुझे दे दे जो
ऐसा भी तो मँझधार नहीं मिलता है।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है..

 

अब पीने को खारी मदिरा पीता हूँ,
अन्तर में जल-२ कर ही तो जीता हूँ,
पर मुझे जला कर राख अरे जो कर दे
ऐसा भी तो अंगार नहीं मिलता है।
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है..

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर!

आज एक बार फिर से देश के लोकप्रिय कवि और गीतकार माननीय श्री सोम ठाकुर जी का एक बेहद लोकप्रिय गीत शेयर कर रहा हूँ, मेरा सौभाग्य है कि आयोजनों के सिलसिले में मुझे उनसे कई बार मिलने का और अनेक बार उनका काव्य-पाठ सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है।

 

 

इस गीत की विशेषता यह है कि एक समय था जब आकाशवाणी से प्रातः काल प्रसारित होने वाले ‘ब्रज माधुरी’ कार्यक्रम में नियमित रूप से यह गीत प्रसारित होता है। लीजिए प्रस्तुत है हमारे महान भारतवर्ष का गौरव गान करने वाला यह गीत-

 

सागर चरण पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर,
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

मंगल भवन अमंगलहारी के गुण तुलसी गावे,
सूरदास का श्याम रंगा मन अनत कहाँ सुख पावे।
जहर का प्याला हँस कर पी गई प्रेम दीवानी मीरा,
ज्यों की त्यों रख दीनी चुनरिया, कह गए दास कबीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

फूटे फरे मटर की भुटिया, भुने झरे झर बेरी,
मिले कलेऊ में बजरा की रोटी मठा मठेरी।
बेटा माँगे गुड की डलिया, बिटिया चना चबेना,
भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

फूटे रंग मौर के बन में, खोले बंद किवड़िया,
हरी झील में छप छप तैरें मछरी सी किन्नरिया।
लहर लहर में झेलम झूमे, गावे मीठी लोरी,
पर्वत के पीछे नित सोहे, चंदा सा कश्मीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

चैत चाँदनी हँसे , पूस में पछुवा तन मन परसे,
जेठ तपे धरती गिरजा सी, सावन अमृत बरसे।
फागुन मारे रस की भर भर केसरिया पिचकारी
भीजे आंचल , तन मन भीजे, भीजे पचरंग चीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

***

Categories
Uncategorized

दोपहर नवंबर की!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

बहुत बार लोग कविता लिखते हैं मौसम पर, कुछ कविताएं बहुत अच्छी भी लिखी जाती हैं। तुलसीदास जी ने, जब रामचंद्र जी, माता सीता की खोज में लगे थे, उस समय ऋतुओं के बदलने का बहुत सुंदर वर्णन किया है। पूरा मनोविज्ञान भरा है उस भाग में, जहाँ वे वर्षा में छोटे नदी-नालों के उफन जाने का वर्णन करते हैं- ‘थोरे में जनु खल इतराहीं’ और वर्षा के बाद ‘वर्षा गई शरद ऋतु आई। वह सब हमारी धरोहर है।

जैसा मैंने कहा, मौसम पर तो बहुत सी कविताएं लिखी गई हैं, डॉ. धर्मवीर भारती की एक कविता है, जो मौसम की कह सकते हैं, परंतु इसमें मौसम को एक महीने के बहाने से व्यक्त किया गया है।  वैसे यह मौसम भी भीतर का है। नवंबर का महीना, जब दोपहर की धूप अच्छी लगने लगती है, हिंदुस्तान में, खासकर उन इलाकों में, जहाँ गर्मी बहुत पड़्ती है।

यह अलग तरह की कविता है, जैसे कोई कविता किसी एक भाव से भरपूर होती है, ये मांसलता से भरपूर है, वैसे वह भी कविता का एक भाग है।

आज यही कविता शेयर करने का मन है, लीजिए प्रस्तुत है-

 

अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है
जार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की !

 

आयी गयी ऋतुएँ पर वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी
जो क्वाँरेपन के कच्चे छल्ले-सी
इस मन की उँगली पर
कस जाये और फिर कसी ही रहे
नित प्रति बसी ही रहे, आँखों, बातों में, गीतों में, 

 

आलिंगन में घायल फूलों की माला-सी
वक्षों के बीच कसमसी ही रहे, 

 

भीगे केशों में उलझे होंगे थके पंख
सोने के हंसों-सी धूप यह नवम्बर की
उस आँगन में भी उतरी होगी
सीपी के ढालों पर केसर की लहरों-सी
गोरे कंधों पर फिसली होगी बन आहट
गदराहट बन-बन ढली होगी अंगों में,

 

आज इस वेला में
दर्द ने मुझको
और दोपहर ने तुमको
तनिक और भी पका दिया
शायद यही तिल-तिल कर पकना रह जायेगा, 

 

साँझ हुए हंसों-सी दोपहर पाँखें फैला
नीले कोहरे की झीलों में उड़ जायेगी
यह है अनजान दूर गाँवों से आयी हुई
रेल के किनारे की पगडण्डी
कुछ क्षण संग दौड़-दौड़
अकस्मात् नीले खेतों में मुड़ जायेगी।

 

एक अलग तरह की कविता है, जिसमें भीतर के और बाहर के मौसम को, एक महीने ‘नवंबर की दोपहर’ के बहाने व्यक्त किया गया है। अब इसके बारे में अलग से तो कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। कविता जितना बोलती है उतना मैं कहाँ बोल पाऊंगा।

नमस्कार।

***************

Categories
Uncategorized

श्रीराम की जलसमाधि – भारत भूषण

आज फिर से मैं अपने प्रिय कवि/गीतकारों में से एक स्व. भारत भूषण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इस रचना में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जलसमाधि का प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। श्रीराम जो शिखर पर हैं, लोगों के प्रभु हैं, अयोध्या के नरेश हैं, जब प्रसंग के अनुसार वे जल-समाधि लेते हैं, वे किसी से कोई शिकायत नहीं कर सकते, शिखर पर व्यक्ति कितना अकेला होता है, वह ईश्वर का अवतार ही क्यों न हो!

श्रीराम की जल समाधि के प्रसंग में, वे जब जल में क्रमशः डूबते जाते हैं, तब उनके मन में क्या-क्या आता है, इसका बहुत सुंदर वर्णन स्व. भारत भूषण जी ने अपनी रचना में किया है। लीजिए प्रस्तुत है यह अति सुंदर रचना-

 

 

पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

 

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथ मन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
मुरझे राजीव नयन बोले, काँपी सरयू, सरयू काँपी,
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम, नीली माटी निष्काम हुई,
इस स्नेहहीन देह के लिए, अब सांस-सांस संग्राम हुई।

 

ये राजमुकुट, ये सिंहासन, ये दिग्विजयी वैभव अपार,
ये प्रियाहीन जीवन मेरा, सामने नदी की अगम धार,
माँग रे भिखारी, लोक माँग, कुछ और माँग अंतिम बेला,
इन अंचलहीन आँसुओं में नहला बूढ़ी मर्यादाएँ,
आदर्शों के जलमहल बना, फिर राम मिलें न मिलें तुझको,
फिर ऐसी शाम ढले न ढले।

 

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे, किस ठौर कहां तुझको जोडूँ,
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य, बोलूँ भी तो किससे बोलूँ,
सिमटे अब ये लीला सिमटे, भीतर-भीतर गूँजा भर था,
छप से पानी में पाँव पड़ा, कमलों से लिपट गई सरयू,
फिर लहरों पर वाटिका खिली, रतिमुख सखियाँ, नतमुख सीता,
सम्मोहित मेघबरन तड़पे, पानी घुटनों-घुटनों आया,
आया घुटनों-घुटनों पानी। फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा,
लहरों-लहरों, धारा-धारा, व्याकुलता फिर पारा-पारा।

 

फिर एक हिरन-सी किरन देह, दौड़ती चली आगे-आगे,
आँखों में जैसे बान सधा, दो पाँव उड़े जल में आगे,
पानी लो नाभि-नाभि आया, आया लो नाभि-नाभि पानी,
जल में तम, तम में जल बहता, ठहरो बस और नहीं कहता,
जल में कोई जीवित दहता, फिर एक तपस्विनी शांत सौम्य,
धक धक लपटों में निर्विकार, सशरीर सत्य-सी सम्मुख थी,
उन्माद नीर चीरने लगा, पानी छाती-छाती आया,
आया छाती-छाती पानी।

 

आगे लहरें बाहर लहरें, आगे जल था, पीछे जल था,
केवल जल था, वक्षस्थल था, वक्षस्थल तक केवल जल था।
जल पर तिरता था नीलकमल, बिखरा-बिखरा सा नीलकमल,
कुछ और-और सा नीलकमल, फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर,
धरती से नभ तक जगर-मगर, दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे,
जैसे सूरज के हस्ताक्षर, बांहों के चंदन घेरे से,
दीपित जयमाल उठी ऊपर,

 

सर्वस्व सौंपता शीश झुका, लो शून्य राम लो राम लहर,
फिर लहर-लहर, सरयू-सरयू, लहरें-लहरें, लहरें- लहरें,
केवल तम ही तम, तम ही तम, जल, जल ही जल केवल,
हे राम-राम, हे राम-राम
हे राम-राम, हे राम-राम ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

******

Categories
Uncategorized

रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं – किशन सरोज

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनका हर गीत बेमिसाल है, आज एक और गीत शेयर कर रहा हूँ। किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, अक्सर उन्होंने कवि सम्मेलनों में ईमानदार और सृजनशील कवियों की जो स्थिति होती है, हल्की-फुल्की कविताओं के माहौल में उनको क्या कुछ सहना पड़ता है, इस व्यथा को अभिव्यक्ति दी है, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही गीत आज प्रस्तुत है-

 

 

नागफनी आँचल में बांध सको तो आना
धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं।
हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।

 

हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।

 

झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।

 

आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।

-किशन सरोज

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

******

Categories
Uncategorized

ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र कोई भीड़ से – किशन सरोज

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई।

कल ही मैंने प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत शेयर किया था, आज मन हो रहा है कि उनका एक और गीत शेयर कर लूं। प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह, किशन सरोज जी का एक और गीत प्रस्तुत है-

 

 

बाँह फैलाए खड़े,
निरुपाय, तट के वृक्ष हम
ओ नदी! दो चार पल, ठहरो हमारे पास भी ।

 

चाँद को छाती लगा
फिर सो गया नीलाभ जल
जागता मन के अंधेरों में
घिरा निर्जन महल
और इस निर्जन महल के
एक सूने कक्ष हम
ओ भटकते जुगनुओ ! उतरो हमारे पास भी ।

 

मोह में आकाश के
हम जुड़ न पाए नीड़ से
ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र
कोई भीड़ से
अश्रु की उजड़ी सभा के,
अनसुने अध्यक्ष हम
ओ कमल की पंखुरी! बिखरो हमारे पास भी ।

 

लेखनी को हम बनाए
गीतवंती बाँसुरी
ढूंढते परमाणुओं की
धुंध में अलकापुरी
अग्नि-घाटी में भटकते,
एक शापित यक्ष हम
ओ जलदकेशी प्रिये! सँवरो हमारे पास भी ।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

******

Categories
Uncategorized

जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन!

कुछ दिन पहले ही प्रसिद्ध गीत कवि श्री किशन सरोज जी के निधन की खबर आई थी, मैं बाहर था अतः समय पर उनके बारे में नहीं लिख पाया।

स्व. किशन सरोज जी बहुत ही प्यारे गीतकार थे, एनटीपीसी में सेवा के दौरान हमारे कई आयोजनों में मैंने उनको आमंत्रित किया था, श्री सोम ठाकुर जी के साथ भी उनकी घनिष्ठ मित्रता थी, दोनो एक-दूसरे की सृजनशीलता का बहुत सम्मान करते थे।
मुझे विंध्यनगर का एक आयोजन याद आ रहा है, जो सुबह 4 बजे तक चला था और उसमें श्री किशन सरोज जी ने बहुत मन से कई प्यारे गीत सुनाए थे। उस कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए श्री सोम ठाकुर ने कहा था कि यह आपके लिए एक स्मरणीय घटना है कि आप इस आयोजन में श्री किशन सरोज जी के गीत सुन रहे हैं।

उस महान गीत ऋषि का स्मरण करते हुए, आज मैं श्रद्धांजलि स्वरूप उनका एक प्रसिद्ध गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

धर गये मेंहदी रचे
दो हाथ जल में दीप,
जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

 

बांचते हम रह गये अन्तर्कथा,
स्वर्णकेशा गीतवधुओं की व्यथा,
ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज,
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

 

जंगलों का दुख, तटों की त्रासदी
भूल सुख से सो गयी कोई नदी,
थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव,
और झीने पाल सा हिलता रहा मन।

 

तुम गये क्या जग हुआ अंधा कुँआ,
रेल छूटी रह गया केवल धुँआ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा हिलता रहा मन।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

******

Categories
Uncategorized

ऐसे ही मैं सिमटा- सिहरा, बिखरा तेरे वक्षस्थल में!

आज एक बार फिर से मेरे प्रिय कवियों में से एक, स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ। श्री भारत भूषण जी बड़ी नाज़ुक भावनाओं को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त करने में माहिर थे और अपने समय में कवि सम्मेलनों की शान हुआ करते थे।

लीजिए प्रस्तुत हैं स्व. भारत भूषण जी का यह प्यारा सा गीत –

 

 

 

जैसे पूजा में आँख भरे, झर जाय अश्रु गंगाजल में
ऐसे ही मैं सिमटा, सिहरा
बिखरा तेरे वक्षस्थल में!

 

रामायण के पारायण सा, होठों को तेरा नाम मिला,
उड़ते बादल को घाटी के, मंदिर में जा विश्राम मिला,
ले गये तुम्हारे स्पर्श मुझे,
अस्ताचल से उदयाचल में!

 

मैं राग हुआ तेरे मन का, यह देह हुई वंशी तेरी,
जूठी कर दे तो गीत बनूँ, वृंदावन हो दुनिया मेरी,
फिर कोई मनमोहन दीखा,
बादल से भीने आँचल में!

 

अब रोम रोम में तू ही तू , जागे जागूँ सोये सोऊँ,
जादू छूटा किस तांत्रिक का, मोती उपजें आँसू बोऊँ ,
ढाई आखर की ज्योति जगी,
शब्दों के बीहड़ जंगल में!

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

*********

Categories
Uncategorized

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-17 / शारदे मां शारदे

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सत्रहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

आज सरस्वती वंदना के रूप में एक गीत-कविता आज प्रस्तुत है-

 

 

 

शारदे मां शारदे,
अभिव्यक्ति का उपहार दे।
बालक तेरा निरीह, भटके वन-वन,
कर दे इस निर्जन को नंदन कानन,
सुधियों के छंद सभी
मां मुझे उधार दे।
जितना भी अहंकार आज तक संजोया था,
मौन हुई वाणी सब, पत्तों सा झर गया,
जिसने तेरे पुनीत चरणों का ध्यान कर
किंचित भी लिखा, सभी ओर नाम कर गया।
अपने इस पुत्र को, हे वीणापाणि मां,
प्यार दे, दुलार दे।।
गीतों में रच सकूं, अनूठा संसार,
कर सकूं तेरे बच्चों को सच्चा प्यार,
मुझको वह शक्ति दे, अनूठी रचना करूं,
सिरजन की प्यास
मेरे मन में उतार दे।।
मेरी पहचान हो, सच्चे वाणी पुत्र सी,
एक यही कामना मेरी पूरी कर दे।
मुद्दत से झोली, खाली मेरी चल रही,
अपने आशीषों से मां, इसको भर दे।
मन निर्मल-शांत हो, वाणी गूंजे निर्भय,
मन में अनुराग और स्वर में झंकार दे।
शारदे मां शारदे,
अभिव्यक्ति का उपहार दे।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

******