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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-10, ज़िंदगी एक अंधा कुआं!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज दसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस दसवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ|

पहली कविता- हमारी राष्ट्रीय प्रगति, जनकल्याण के लिए हुए प्रयासों की पड़ताल, एक कवि के नजरिये से इस गीत में की गई है, निरंतर एक प्रक्रिया सी चलती है जिसमें सारा आशावाद धुल जाता है-

लेकिन दृश्य नहीं बदला है!

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

मीठे सपनों को कडुवाई आंखों को
दिन रात छला है।
कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।

 

बचपन की उन्मुक्त कुलांचे
थकी चाल में रहीं बदलती,
दूध धुली सपनीली आंखें
पीत हो गईं- जलती-जलती,
जब भी छूटी आतिशबाजी-
कोई छप्पर और जला है।

 

कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।।

 

अब अपनी एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जैसी मुझे याद है अभी तक, क्योंकि गीत तो याद रह जाते हैं, स्वच्छंद कविता को याद रखने में दिक्कत होती है, यह कविता वास्तव में अपने देश से दूर रहते हुए उसको याद करने का एक प्रसंग है-

 

काबुलीवाला, खूंखार पठान-
जेब में बच्ची के हाथ का जो छापा लिए घूमता है,
उसमें पैबस्त है उसके वतन की याद।

 

वतन जो कहीं हवाओं की महक,
और कहीं आकाश में उड़ते पंछियों के
सतरंगे हुज़ूम के बहाने याद आता है,
आस्थाओं के न मरने का दस्तावेज है।

 

इसकी मिसाल है कि हम-
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई होने के नाते नहीं
नागरिक होने के नाते बंधु हैं,
सहृदय होने के नाते सखा हैं,

 

वतन हमसे आश्वासन चाहता है-
कि अब किसी ‘होरी’ के घर और खेत-
महाजनी खाते की हेरे-फेर के शिकार नहीं होंगे,

 

कि ‘गोबर’ शहर का होकर भी-
दिल में बसाए रखेगा अपना गांव
और घर से दूर होकर भी
हर इंसान को भरोसा होगा-
कि उसके परिजन सदा सुरक्षित हैं।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और अंत में, एक गीत, आज जो ज़िंदगी हम जी रहे हैं, उसको देखने का एक अलग नज़रिया, जहाँ कोई आस्था, कोई विश्वास हमें सहारा देने के लिए नहीं है, लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

ज़िंदगी आज की एक अंधा कुआं
जिसमें छाया नहीं, जिसमें पानी नहीं
प्यास के इस सफर के मुसाफिर हैं सब,
कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं।

 

अब न रिश्तों मे पहली सी वो आंच है,
आस्था के नगीने फक़त कांच हैं,
अब लखन भी नहीं राम के साथ हैं,
श्याम की कोई मीरा दिवानी नहीं।

 

हमने बरसों तलाशा घनी छांव को,
हम बहुत दूर तक यूं ही भटका किए,
अब कोई आस की डोर बाकी नहीं
अब किसी की कोई मेहरबानी नहीं।

 

कृष्ण गुलशन में क्या सोचकर आए थे,
न हवा में गमक, न फिजां में महक,
हर तरफ नागफनियों का मेला यहाँ,
कोई सूरजमुखी, रातरानी नहीं।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-4 : सन्नाटा शहर में!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौथा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस चौथी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

दिल्ली में रहते हुए, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन की अनेक बैठकों में मैंने भाग लिया था, सामान्यतः ये बैठकें दिल्ली विश्वविद्यालय में कहीं होती थीं और इनमें काफी बहादुरी भरी बातें होती थीं। आपातकाल में ऐसी ही बैठक दिल्ली में मंडी हाउस के पास स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय में हुई और मैंने देखा कि इस बैठक में सभी बहादुरों ने किसी न किसी बहाने से आपातकाल का समर्थन किया।

इस बैठक के अनुभव से प्रभावित होकर मैंने ये कविता लिखी थी-

 

सन्नाटा शहर में

 

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

बेहद ठंडा है शहरी मरुथल
लो अब हम इसको गरमाएंगे,
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

दड़बे में कुछ सुधार होना है,
हमको ही सूत्रधार होना है,
ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,
अपनी सरकार का बिछौना है।
चिंतन सन्नाटा गहराता है,
शब्द वमन से उसको ढाएंगे।
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

परख राजपुत्रों की थाती है,
कविता उस से छनकर आती है,
ऊंची हैं अब जो भी आवाज़ें,
सारी की सारी बाराती हैं,
अपनी प्रतिभा के चकमक टुकड़े
नगर कोतवाल को दिखाएंगे।
तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटा
भौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे।

 

अंत में मेरी कुछ पंक्तियां, जो दिल्ली में यमुना पार निवास के दर्द को भी दर्शाती हैं-

हर एक मुक़ाम पर
ठहरा, झुका, सलाम किया,
वो अपना घर था, जिसे रास्ते में छोड़ दिया।

 

उधर हैं पार नदी के बहार-ओ-गुल कितने,
इधर हूँ मैं कि ये जीवन
नदी के पार जिया।

 

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-3, ‘हम शंटिंग ट्रेन हो गए’!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तीसरा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस तीसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

दिल्ली में अपनी प्रारंभिक सेवाओं में से दूसरी प्रायवेट नौकरी अर्थात दिल्ली प्रेस, झंडेवालान में सेवा के दौरान ट्रेन में दैनिक यात्रा के अनुभव भी बहुत रोचक थे, शाहदरा से झंडेवालान तक जाने के लिए, और इस दौरान रचनाएं भी बहुत सी लिखी गईं।

साम्यवाद में ऐसी अवधारणा है कि मेहनतकश मिलकर शोषण के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन मैं देखता हूँ कि ‘दिल्ली प्रेस’ जैसी संस्थाएं तो शोषण के ही महाकेंद्र हैं, महानगरों में ऐसे संस्थानों की भीड़ है, और कर्मचारीगण सुबह से ही बस,ट्रेन और अब मैट्रो भी, की लाइनों में लग जाते हैं, जीवन-यापन की व्यक्तिगत लड़ाई लड़ने के लिए।

उन दिनों लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो काफी लोकप्रिय हुआ था-

 

महानगर का गीत

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष

 

नींदों में जाग-जागकर, कर्ज़ सी चुका रहे उमर,
सड़कों पर भाग-भागकर, लड़ते हैं व्यक्तिगत समर।
छूटी जब हाथ से किताब, सारे संदर्भ खो गए,
सीमाएं बांध दी गईं, हम शंटिंग ट्रेन हो गए,
सूरज तो उगा ही नहीं, लाइन में लग गया शहर,
लड़ने को व्यक्तिगत समर।

 

व्यापारिक-साहित्यिक बोल, मिले-जुले कहवाघर में,
एक फुसफुसाहट धीमी, एक बहस ऊंचे स्वर में,
हाथों में थामकर गिलास, कानों से पी रहे ज़हर।
कर्ज़ सी चुका रहे उमर।

 

मीलों फैले उजाड़ में, हम पीली दूब से पले,
उतने ही दले गए हम, जितने भी काफिले चले,
बरसों के अंतराल से गूंजे कुछ अपने से स्वर,
क्रांति चेतना गई बिखर।

 

 

और यह दूसरी कविता भी दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान की ही है, जब एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था|कम से कम इस गीत के लेखन का वर्ष मुझे याद रहता है, क्योंकि उस समय एशिया-72 प्रदर्शनी लगी थी, इसलिए कह सकता हूँ कि यह 1972 में लिखा गया था। लीजिए प्रस्तुत है आज का यह दूसरा गीत-

 

 

खंडहर गीत

 

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,
इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,
युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,
टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।
था कभी जो महल, बन वही अब गया,
बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए
उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,
भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम
ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,
अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा
मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी
एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,
देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका
अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,
स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,
ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’ 

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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गुनगुनाती रही वेदना!

आज फिर से हिंदी काव्य मंचों के एक पुराने लोकप्रिय हस्ताक्षर- स्व. गोपाल सिंह नेपाली जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। गीत स्वयं अपनी बात कहता है, इसलिए मुझे ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं, लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना।।

 

चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा,
द्वार घर का पवन खटखटाता रहा।
पास आते हुए तुम कहीं छुप गए,
गीत हमको पपीहा रटाता रहा।
तुम कहीं रह गये, हम कहीं रह गए, गुनगुनाती रही वेदना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुस्कुराती रही कामना॥

 

तुम न आए, हमें ही बुलाना पड़ा,
मंदिरों में सुबह-शाम जाना पड़ा।
लाख बातें कहीं मूर्तियाँ चुप रहीं,
बस तुम्हारे लिए सर झुकाता रहा।
प्यार लेकिन वहाँ एकतरफ़ा रहा, लौट आती रही प्रार्थना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना॥

 

शाम को तुम सितारे सजाते चले,
रात को मुँह सुबह का दिखाते चले।
पर दिया प्यार का, काँपता रह गया,
तुम बुझाते चले, हम जलाते चले।
दुख यही है हमें तुम रहे सामने, पर न होता रहा सामना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना॥

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही उसकी सफलता की पहचान है। लीजिए आज के लिए स्व. भारत भूषण जी का यह गीत आपको समर्पित है-

 

जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये,
ओ पाहन! इतना बतला दे, उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं।
अपने अपने चाँद भुजाओं,
में भर भर कर दुनिया सोये।
सारी सारी रात अकेला,
मैं रोऊँ या शबनम रोये।
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे,
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं।

 

गाऊँ कैसा गीत कि जिससे,
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ,
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये,
अपना दुखिया मन बहलाऊँ।
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया,
मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं।

 

टूट गया जिससे मन दर्पण,
किस रूपा की नजर लगी है।
घर घर में खिल रही चाँदनी,
मेरे आँगन धूप जगी है।
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं।
छोटे से जीवन में कितना, दर्द-दाह अब और सहूँ मैं।

 

फटा पड़ रहा है मन मेरा,
पिघली आग बही काया में।
अब न जिया जाता निर्मोही,
गम की जलन भरी छाया में।
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है।
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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याद के चरन पखारते न बीत जाय रात!

लंदन प्रवास इस बार का भी समाप्त होने को है, एक सप्ताहांत और बाकी है इसमें।

इस बीच आज मन हो रहा है कि सुकवि श्री सोम ठाकुर जी का एक प्यारा सा गीत शेयर कर लूं। कविता अपनी बात खुद ही कहती है, उसके बारे में मैं अलग से क्या कहूं, बस आप इस गीत का आनंद लीजिए –

 

जाओ, पर संध्या के संग लौट आना तुम,
चाँद की किरन निहारते न बीत जाय रात।

 

कैसे बतलाऊँ इस अंधियारी कुटिया में
कितना सूनापन है,
कैसे समझाऊँ, इन हल्की सी साँसों का
कितना भारी मन है,
कौन सहारा देगा दर्द -दाह में बोलो
जाओ पर आँसू के संग लौट आना तुम,
याद के चरन पखारते न बीत जाय रात।

 

हर न सकी मेरे हारे तन की तपन कभी
घन की ठंडी छाया,
काँटों के हार मुझे पहना के चली गई
मधुऋतु वाली माया,
जी न सकेगा जीवन बिंंधे-बिंंधे अंगों में,
जाओ पर पतझर के संग लौट आना तुम,
शूल की चुभन दुलारते न बीत जाय रात।

 

धूल भरे मौसम में बज न सकेगी कल तक
गीतों पर शहनाई,
दुपहरिया बीत चली, रह न सकेगी कल तक
बालों में कजराई,
देर नही करना तुम गिनी -चुनी घड़ियाँ हैं,
जाओ पर सपनों के संग लौट आना तुम,
भीगते नयन उघारते न बीत जाय रात।

 

मेरी डगमग नैया डूबते किनारों से
दुख ने ही बाँधी है,
मेरी आशावादी नगरी की सीमा पर
आज चढ़ी आँधी है,
बह न जाए जीवन का आँचल इन लहरों में,
जाओ, पर पुरवा के संग लौट आना तुम,
सेज की शिकन संवारते न बीत जाय रात।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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फिर चाँद उछालेगा पानी, किसकी समुंदरी आँखों में!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। वे एक ऐसे गीत कवि थे जिनको सुनने के लालच के कारण बहुत सी बार किसी कवि सम्मेलन में जाना सार्थक हो जाता था।

भारत भूषण जी ने जहाँ जीवन की विसंगतियों पर अनेक गीत लिखे हैं, वहीं प्रेम और भावुकता से भरा यह गीत भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ था।

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

 

जिस दिन भी बिछड़ गया मीता,
ढूँढती फिरोगी लाखों में।
फिर कौन सामने बैठेगा,
बंगाली भावुकता पहने,
औ दूर दूर से लाएगा,
केशों को गंध भरे गहने।
ये देह अजंता शैली सी
किसके गीतों में सँवरेगी,
किसकी रातें महकाएँगी
जीने के मोड़ों की छुअनें,
फिर चाँद उछालेगा पानी,
किसकी समुंदरी आँखों में।
दो दिन में ही बोझिल होगा
मन का लोहा, तन का सोना,
फैली बाहों सा दीखेगा
सूनेपन में कोना कोना।
किसके कपड़ों में टाँकोगे
अखरेगा किसकी बातों में,
पूरी दिनचर्या ठप होना।
दरकेगी सरोवरी छाती
धूलिया जेठ वैशाखों में।
ये गुँथे गुँथे बतियाते पल
कल तक गूँगे हो जाएँगे,
होंठों से उड़ते भ्रमर गीत
सूरज ढलते सो जाएँगे। 
जितना उड़ती है आयु परी
इकलापन बढ़ता जाता है,
सारा जीवन निर्धन करके
ये पारस पल खो जाएँगे।
गोरा मुख लिये खड़े रहना
खिड़की की स्याह सलाखों में।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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